क्या बाना सिंह सियाचिन का शेर हैं जो पाकिस्तानी सेना पर मौत बनकर बरसे? परमवीर चक्र विजेता की कहानी
सारांश
Key Takeaways
- बाना सिंह ने सियाचिन पर अद्वितीय साहस का प्रदर्शन किया।
- उनकी टीम ने पाकिस्तान के कमांडो के खिलाफ जीत हासिल की।
- उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
- बाना सिंह ने कठिनाइयों का सामना करते हुए अपने राज्य के प्रति निष्ठा दिखाई।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी वीरता को अमर किया।
नई दिल्ली, 5 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। जून 1987 में, सियाचिन ग्लेशियर की ऊंचाई 21,153 फीट पर तापमान शून्य से 50 डिग्री नीचे था। इस बर्फीली हवाओं में पांच सैनिक धीरे-धीरे बर्फ की एक सीधी दीवार पर रेंग रहे थे। इनमें सबसे आगे थे नायब सूबेदार बाना सिंह।
सियाचिन पर कब्जा करना पाकिस्तान के लिए एक रणनीतिक सपना था। उन्होंने साल्टोरो रिज की सबसे ऊंची चोटी पर 'कायद पोस्ट' बना ली थी। वहां बैठकर पाकिस्तानी कमांडो हर भारतीय पर नजर रख रहे थे। उनके पास अत्याधुनिक हथियार और ऊंचाई की बढ़त थी। भारत ने इस पोस्ट को पुनः प्राप्त करने के लिए 'ऑपरेशन राजीव' शुरू किया, लेकिन प्रारंभिक प्रयास असफल रहे। सेकेंड लेफ्टिनेंट राजीव पांडे और उनके साथी इस पोस्ट को जीतने के प्रयास में शहीद हो गए।
बाना सिंह का जन्म 6 जनवरी 1949 को जम्मू के आरएस पुरा के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। 1969 में वह सेना में भर्ती हुए।
26 जून 1987 को, जब बाना सिंह की टीम को अंतिम हमले का जिम्मा मिला, तो उन्होंने वह मार्ग चुना जिस पर दुश्मन ने कभी सोचा भी नहीं था। उन्होंने 90 डिग्रीचुनी लाल, लक्ष्मण दास, ओम राज और कश्मीर चंद) जब चोटी पर पहुंचे, तो उनके हाथ-पैर जम चुके थे।
चोटी पर पहुंचते ही, अत्यधिक ठंड के कारण उनकी राइफलें 'जाम' हो गईं। एक ओर आधुनिक हथियारों से लैस पाकिस्तानी एसएसजी कमांडो थे और दूसरी ओर बाना सिंह की टीम, जिनके पास केवल साहस और हथगोले थे।
बाना सिंह ने बिना किसी संकोच के दुश्मन के बंकर की ओर रेंगना शुरू किया। उन्होंने बंकर के छोटे से झरोखे में ग्रेनेड अंदर फेंका और बंकर के दरवाजे को बाहर से पकड़ लिया ताकि धमाका अंदर ही हो जाए। देखते ही देखते बंकर तबाह हो गया। इसके बाद जो हुआ, वह सैन्य इतिहास की सबसे भीषण 'हैंड-टू-हैंड' लड़ाई थी। भारतीय सैनिकों ने संगीनों से हमला किया। कुछ पाकिस्तानी सैनिक डर के मारे चोटी से कूद गए। शाम चार बजे तक 'कायद पोस्ट' पर तिरंगा लहरा रहा था। भारत सरकार ने इस अदम्य साहस को सम्मानित करते हुए इस चोटी का नाम हमेशा के लिए 'बाना टॉप' रख दिया।
26 जनवरी 1988 को, बाना सिंह को सेना के सर्वोच्च सम्मान 'परमवीर चक्र' से नवाजा गया। लेकिन एक असली हीरो की परीक्षा युद्ध के मैदान के बाद भी जारी रही। रिटायरमेंट के बाद जब वह अपने गांव काद्याल लौटे, तो उन्हें आर्थिक तंगी और प्रशासनिक उपेक्षा का सामना करना पड़ा। जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा दी जाने वाली पेंशन पड़ोसी राज्यों (जैसे पंजाब) की तुलना में बेहद कम थी।
2006 में पंजाब सरकार ने उन्हें लाखों रुपए और जमीन देने की पेशकश की थी, लेकिन बाना सिंह ने कहा, "मैं जम्मू-कश्मीर का बेटा हूं और अपनी मिट्टी नहीं छोड़ूंगा, चाहे मुझे कितनी भी तंगी क्यों न झेलनी पड़े।"
2023 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंडमान के एक द्वीप का नाम 'बाना आइलैंड' रखकर उनकी वीरता को अमर कर दिया।