मिथिला मखाना से कटक की चांदी तरकाशी तक: पूर्वी-मध्य भारत के जीआई उत्पाद बन रहे वैश्विक पहचान का प्रतीक
सारांश
मुख्य बातें
भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाने में जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग की भूमिका तेज़ी से बढ़ रही है। बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के पारंपरिक उत्पाद आज न केवल देश में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में भी अपनी अमिट छाप छोड़ रहे हैं। अब तक भारत में 600 से अधिक उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है, जिनमें पूर्वी और मध्य भारत के राज्यों का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
जीआई टैग: पहचान से परे ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार
जीआई टैग किसी उत्पाद को महज़ एक कानूनी पहचान नहीं देता — यह उस उत्पाद के पीछे खड़े किसानों, बुनकरों और कारीगरों की पीढ़ियों की मेहनत को संरक्षण और बाज़ार दोनों प्रदान करता है। इससे नकली उत्पादों पर अंकुश लगता है और प्रामाणिक उत्पादकों को उचित मूल्य मिलने की संभावना बढ़ती है। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक हो गया है जब वैश्विक बाज़ार में पारंपरिक, प्राकृतिक और हस्तनिर्मित उत्पादों की माँग तेज़ी से बढ़ रही है।
गौरतलब है कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेश यात्राओं के दौरान कई भारतीय पारंपरिक उत्पाद विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को उपहार में भेंट किए। इनमें जयपुर की ब्लू पॉटरी, मीनाकारी-कुंदन कला, मिथिला मखाना और ओडिशा की रूपा तारकासी (चांदी की फिलिग्री कला) शामिल थे — जिससे इन उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय साख और मज़बूत हुई।
बिहार: सुपरफूड से रेशम तक
मिथिला मखाना आज वैश्विक बाज़ार में सुपरफूड के रूप में स्थापित हो चुका है। मुज़फ्फरपुर की शाही लीची अपनी असाधारण मिठास और सुगंध के कारण देश-विदेश में पसंद की जाती है। नालंदा का सिलाव खाजा अपनी कुरकुरी परतों के लिए मशहूर है, जबकि मगही पान और भागलपुर का कतरनी चावल अपनी विशेष सुगंध के कारण विशिष्ट पहचान रखते हैं।
खाद्य उत्पादों के अलावा, भागलपुरी सिल्क, सिक्की घास शिल्प, सुजनी कला और मंजूषा कला बिहार की सांस्कृतिक समृद्धि को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करती हैं।
झारखंड और ओडिशा: आदिवासी कला से विश्वस्तरीय पहचान
झारखंड में सरायकेला-खरसावां का टसर सिल्क और कुचाई हल्दी विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। जनजातीय आभूषण और बांस शिल्प स्थानीय कला की जीवंत परंपरा के प्रमाण हैं। देवघर का अट्ठे मटन और सिमडेगा की मीठी इमली भी क्षेत्रीय पहचान को पुष्ट करते हैं।
ओडिशा में पुरी की पट्टाचित्र कला विश्वभर में पारंपरिक चित्रकारी की मिसाल मानी जाती है। कटक की रूपा तारकासी — चांदी की बारीक नक्काशी — राज्य की ऐतिहासिक शिल्पकला का जीवंत प्रतीक है। संबलपुरी बंधा साड़ी और बोमकाई साड़ी अपनी उत्कृष्ट बुनाई के लिए जानी जाती हैं। कृषि उत्पादों में कंधमाल की हल्दी अपने औषधीय गुणों के लिए और कोरापुट का काला जीरा चावल — जिसे 'चावल का राजकुमार' कहा जाता है — अपनी सुगंध के लिए प्रसिद्ध है। ओडिशा रसगुल्ला, रसबली और ढेंकनाल मगजी जैसी मिठाइयाँ भी देशभर में पहचानी जाती हैं।
पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश: चाय से साड़ी तक
दार्जिलिंग चाय भारतीय चाय की वैश्विक पहचान का पर्याय है। शांतिपुरी साड़ी, नक्शी कांथा और बंगाल पटचित्र राज्य की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखते हैं। मिठाइयों में जॉयनगर मोआ, नोलेन गुरेर संदेश, मिहिदाना और सीताभोग लोकप्रिय हैं। मालदा के फजली, हिमसागर और लक्ष्मणभोग आम अपनी मिठास के लिए विशेष स्थान रखते हैं।
मध्य प्रदेश में महेश्वरी और चंदेरी साड़ियाँ देश की सर्वाधिक प्रसिद्ध हथकरघा साड़ियों में गिनी जाती हैं। बाघ प्रिंट की प्राकृतिक रंगाई और ब्लॉक प्रिंटिंग तकनीक इसे अनूठा बनाती है। मुरैना की गजक, रतलामी सेव, शरबती गेहूं, रीवा का सुंदरजा आम और बालाघाट का चिन्नौर चावल खाद्य श्रेणी में उल्लेखनीय हैं। डिंडोरी की गोंड पेंटिंग और लौह शिल्प आदिवासी कला की अनमोल धरोहर माने जाते हैं।
छत्तीसगढ़: बस्तर की कला से जीराफूल चावल तक
बस्तर ढोकरा कला छत्तीसगढ़ का पहला जीआई टैग प्राप्त उत्पाद था — यह धातु से तैयार प्राचीन कलाकृति देश-विदेश में सराही जाती है। बस्तर आयरन क्राफ्ट और वुडन क्राफ्ट आदिवासी शिल्पकला के सशक्त उदाहरण हैं। जीराफूल चावल अपनी सुगंध और महीन दानों के लिए और चांपा सिल्क साड़ी अपनी चमक और बुनाई के लिए अलग पहचान रखती है।
गाँवों की गलियों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुँचे ये उत्पाद भारत की विरासत और कारीगरों की कला के जीवंत प्रमाण हैं — और जीआई टैग की बढ़ती स्वीकार्यता के साथ आने वाले वर्षों में इनकी वैश्विक पहुँच और व्यापक होने की संभावना है।