जीआई टैग से वैश्विक मंच पर भारतीय उत्पाद: मोदी ने 600+ उत्पादों की विरासत को दिलाई अंतरराष्ट्रीय पहचान
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इटली, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और नीदरलैंड सहित अन्य देशों की हालिया विदेश यात्रा केवल कूटनीतिक और आर्थिक एजेंडे तक सीमित नहीं रही — इस दौरे ने भारत के जीआई टैग (भौगोलिक संकेतक) प्राप्त उत्पादों को वैश्विक मंच पर एक नई पहचान दिलाई। उन्होंने विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को असम का मूगा रेशम शॉल, गुजरात की रोगन पेंटिंग, बिहार की मिथिला पेंटिंग और आगरा की पच्चीकारी जैसे अनमोल तोहफे भेंट किए, जो 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' (ODOP) योजना के तहत स्थानीय कारीगरों और किसानों की मेहनत के प्रतीक हैं।
जीआई टैग क्या है और यह क्यों अहम है
जीआई टैग यानी भौगोलिक संकेतक किसी उत्पाद को उसके भौगोलिक मूल स्थान की कानूनी पहचान देता है। यह सुनिश्चित करता है कि उस उत्पाद का नाम केवल उसी क्षेत्र के प्रामाणिक उत्पादक ही उपयोग कर सकें। इस संरक्षण से किसानों और स्थानीय कारीगरों की आय बढ़ती है, नकली उत्पादों पर अंकुश लगता है, सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित होती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में अब तक 600 से अधिक उत्पादों को जीआई टैग प्राप्त हो चुका है, जिनमें कृषि उत्पाद, हस्तशिल्प, खाद्य पदार्थ और हस्तकला शामिल हैं।
विदेशी नेताओं को भेंट किए गए प्रमुख उत्पाद
इटली की प्रधानमंत्री को आगरा की पच्चीकारी से सजी संगमरमर पेटी, मूगा रेशम (गोल्डन सिल्क) और शिरुई लिली रेशम का शॉल भेंट किया गया। नीदरलैंड में जयपुर की ब्लू पॉटरी, मीनाकारी-कुंदन की बालियाँ और मिथिला पेंटिंग उपहार में दी गईं। UAE में रोगन पेंटिंग (जीवन वृक्ष), कोफ्तगरी कटार और मिथिला मखाना भेंट किए गए। गौरतलब है कि इन सभी उपहारों में एक समान सूत्र था — ये सभी ODOP योजना के अंतर्गत जीआई प्रमाणित उत्पाद थे।
राज्यवार जीआई टैग उत्पादों की विविधता
उत्तर प्रदेश के जीआई उत्पादों में मलिहाबाद का दशहरी आम, वाराणसी का लंगड़ा आम, बनारसी पान, प्रयागराज का अमरूद, लखनवी चिकनकारी, कानपुर चमड़ा, आगरा पच्चीकारी, मथुरा पेड़ा और आजमगढ़ कालीन शामिल हैं। बिहार से नालंदा का सिलाव खाजा (52 परतों वाली खस्ता मिठाई), मुजफ्फरपुर की शाही लीची, मिथिला मखाना, मगही पान, भागलपुर का जरदालू आम, कतरनी चावल और पश्चिम चंपारण का मार्चा चावल को जीआई टैग मिला है।
कर्नाटक में मैसूर सिल्क, कूर्ग कॉफी, ब्याडगी मिर्च, धारवाड़ पेड़ा और इल्कल साड़ी प्रमुख हैं। केरल से पलक्कड़ मट्टा चावल, पोक्काली चावल, कूर्ग संतरा, मरयूर गुड़ और नीलांबुर सागौन जीआई सूची में हैं। तमिलनाडु के कांचीपुरम सिल्क, मदुरै मल्लि, इरोड हल्दी, नीलगिरि चाय और तंजावुर पेंटिंग के साथ आंध्र प्रदेश का तिरुपति लड्डू, गंटूर मिर्च, बंगनपल्ले आम और कोंडापल्ली खिलौने भी इस सूची में हैं।
तेलंगाना का हैदराबादी हलीम, पोचमपल्ली इकत, वारंगल दरी और चेरियल स्क्रॉल पेंटिंग; झारखंड की सोहराय-कोहबर पेंटिंग, डोकरा कला और तसर सिल्क; असम का मूगा सिल्क और जोहा चावल; राजस्थान की ब्लू पॉटरी और कोफ्तगरी; जम्मू-कश्मीर का केसर और पश्मीना शॉल; पश्चिम बंगाल की दार्जिलिंग चाय और बंगाल रसगुल्ला; तथा महाराष्ट्र का अल्फांसो आम और कोल्हापुरी चप्पल इस विशाल जीआई परिवार का हिस्सा हैं।
भारत की विविधता का सांस्कृतिक राजदूत
यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी 'सॉफ्ट पावर' को कूटनीति का हथियार बना रहा है। कश्मीर का केसर, बिहार का मखाना, बनारस की साड़ी और कच्छ की रोगन कला — ये उत्पाद केवल वस्तुएँ नहीं, बल्कि भारत की मिट्टी, मेहनत और परंपरा की अमिट पहचान हैं। जीआई टैग इन उत्पादों को वैश्विक बाज़ार में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दिलाने का सबसे प्रभावी माध्यम बन चुका है। आने वाले समय में और अधिक उत्पादों को जीआई दर्जा दिलाने की प्रक्रिया जारी है, जो स्थानीय उत्पादकों के लिए नए आर्थिक अवसर खोलेगी।