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पूर्वोत्तर भारत के जीआई उत्पाद विश्व मंच पर: मूगा सिल्क से नागा मिर्च तक, मोदी की इटली यात्रा में मिली नई पहचान

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पूर्वोत्तर भारत के जीआई उत्पाद विश्व मंच पर: मूगा सिल्क से नागा मिर्च तक, मोदी की इटली यात्रा में मिली नई पहचान

सारांश

मोदी की इटली यात्रा में असम के मूगा सिल्क से लेकर नागालैंड की भूत जोलोकिया तक — पूर्वोत्तर भारत के जीआई उत्पाद दुनिया के नेताओं की मेज़ पर पहुँचे। 600 से अधिक जीआई टैग वाले भारत के लिए यह कूटनीति और सांस्कृतिक विरासत का अनोखा संगम है।

मुख्य बातें

PM नरेंद्र मोदी ने इटली यात्रा में विश्व नेताओं को असम का मूगा रेशम शॉल सहित भारत के जीआई टैग उत्पाद उपहार में दिए।
भारत में अब तक 600 से अधिक उत्पादों को जीआई (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) टैग मिल चुका है।
पूर्वोत्तर के 8 राज्यों — असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश — के जीआई उत्पाद वैश्विक बाज़ार में पहचान बना रहे हैं।
नागा किंग चिली (भूत जोलोकिया) दुनिया की सबसे तीखी मिर्चों में गिनी जाती है; असम का मूगा सिल्क प्राकृतिक सुनहरे रंग के लिए विश्वविख्यात है।
जीआई टैग से स्थानीय किसानों, बुनकरों और कारीगरों की आय और माँग दोनों में वृद्धि हो रही है, ग्रामीण रोज़गार के नए अवसर बन रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इटली यात्रा ने भारत के जीआई (भौगोलिक संकेत) टैग प्राप्त उत्पादों को वैश्विक मंच पर एक नई पहचान दिलाई — विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों के उन उत्पादों को, जो सदियों पुरानी परंपरा, कारीगरी और जैविक खेती की विरासत को समेटे हुए हैं। विश्व के प्रमुख नेताओं को असम के मूगा रेशम शॉल सहित भारत के विभिन्न क्षेत्रों से चुने गए विशेष उपहार भेंट कर प्रधानमंत्री ने यह रेखांकित किया कि भारत की वास्तविक शक्ति उसके गाँवों, बुनकरों और किसानों की मेहनत में निहित है।

जीआई टैग: स्थानीय पहचान का वैश्विक पासपोर्ट

जीआई यानी जियोग्राफिकल इंडिकेशन वह कानूनी मान्यता है जो किसी उत्पाद को उसकी भौगोलिक उत्पत्ति — मिट्टी, जलवायु, परंपरा या विशेष कारीगरी — के आधार पर दी जाती है। आज भारत के 600 से अधिक उत्पादों को यह टैग मिल चुका है, और पूर्वोत्तर भारत इस सूची में देश के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में से एक के रूप में उभरा है। यह टैग न केवल नकल से सुरक्षा देता है, बल्कि स्थानीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुँचाने का प्रभावी माध्यम भी बन चुका है।

असम और मणिपुर: रेशम, चावल और खट्टे फलों की धरोहर

असम का मूगा सिल्क — अपने सुनहरे रंग, प्राकृतिक चमक और असाधारण मजबूती के लिए दुनियाभर में विख्यात — जीआई टैग प्राप्त उत्पादों में सबसे प्रतिष्ठित है। इसके अलावा, जोहा राइस, काजी नेमू, बोका चाऊल, तेजपुर लीची और पारंपरिक गमोसा भी असम की जीआई पहचान का हिस्सा हैं।

मणिपुर की बुनाई परंपरा में शाफी लानफी, वांगखेई फी और मोइरांग-फी वस्त्र विशेष अवसरों की शान हैं। वहीं, चक-हाओ काला चावल अपने औषधीय गुणों के कारण वैश्विक स्वास्थ्य बाज़ार में तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है। कचाई नींबू और तामेंगलोंग संतरा भी राज्य की विशिष्ट कृषि पहचान को मज़बूत करते हैं।

नागालैंड, मेघालय और मिजोरम: तीखे स्वाद और रंगीन परंपराएँ

नागालैंड का नागा किंग चिली — जिसे भूत जोलोकिया भी कहा जाता है — दुनिया की सबसे तीखी मिर्चों में गिनी जाती है और वैश्विक खाद्य उद्योग में इसकी विशेष माँग है। नागा ट्री टमाटर, नागा खीरा और पारंपरिक चाखेसांग शॉल भी राज्य की अनूठी पहचान को रेखांकित करते हैं।

मेघालय की खासी मैंड्रिन संतरा और मेमोंग नारंग अपनी मिठास और रसदार बनावट के लिए प्रसिद्ध हैं। मिजोरम की पारंपरिक शॉलें — मिजो पुआनचेई, पवांडम और तावल्लोहपुआन — राज्य की सांस्कृतिक आत्मा को अभिव्यक्त करती हैं। मिजो मिर्च और मिजो अदरक भी अपनी विशिष्ट गुणवत्ता के कारण अलग स्थान रखते हैं।

त्रिपुरा, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश: पहाड़ों की सौगात

त्रिपुरा का क्वीन पाइन एप्पल अपनी असाधारण मिठास और सुगंध के लिए जाना जाता है, जबकि रीसा और रिग्नाई-पचरा वस्त्र राज्य की पारंपरिक सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक हैं। सिक्किम की बड़ी इलायची और डल्ले मिर्च अंतरराष्ट्रीय मसाला बाज़ार में अपनी गुणवत्ता के लिए माँग में हैं।

अरुणाचल प्रदेश के जीआई उत्पाद राज्य की आदिवासी संस्कृति और जैव-विविधता की झलक देते हैं। वाक्रो संतरा अपने मीठे-खट्टे स्वाद के लिए प्रसिद्ध है। इदु मिश्मी टेक्सटाइल में ज्यामितीय डिज़ाइन और प्राकृतिक रंगों का समन्वय इसे हथकरघा कला का उत्कृष्ट नमूना बनाता है। खाव ताई (खामती चावल) की सुगंध और याक चुरपी की पहाड़ी विशिष्टता, तथा तांगसा टेक्सटाइल की बुनाई परंपरा — ये सभी अरुणाचल की समृद्ध विरासत के प्रमाण हैं।

आर्थिक प्रभाव और आगे की राह

जीआई टैग पूर्वोत्तर राज्यों की अर्थव्यवस्था को ठोस आधार दे रहे हैं। स्थानीय किसानों, बुनकरों और कारीगरों को न केवल नई पहचान मिल रही है, बल्कि उनके उत्पादों की कीमत और माँग दोनों में वृद्धि हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार के नए अवसर उभर रहे हैं और विदेशी बाज़ारों में भारतीय उत्पादों की पहुँच मज़बूत हो रही है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार 'वोकल फॉर लोकल' और 'एक ज़िला एक उत्पाद' जैसी नीतियों के ज़रिये स्थानीय उत्पादों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी की इटली यात्रा ने इस दिशा में एक सशक्त कूटनीतिक संदेश दिया है — पूर्वोत्तर भारत का जीआई गौरव अब केवल देश की सीमाओं तक नहीं, दुनिया के मंच पर भी चमक रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह प्रतीकात्मक पहचान ज़मीन पर आर्थिक बदलाव में तब्दील हो रही है। पूर्वोत्तर के बुनकर और किसान वर्षों से जीआई टैग के बावजूद मध्यस्थों की लंबी श्रृंखला और निर्यात अवसंरचना की कमी से जूझते रहे हैं। 600 से अधिक जीआई उत्पादों का आँकड़ा प्रभावशाली है, पर उनमें से कितने उत्पाद वास्तव में अंतरराष्ट्रीय शेल्फ तक पहुँचते हैं — यह डेटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। बिना निर्यात लिंकेज, ब्रांडिंग सहायता और उत्पादक-स्तरीय मूल्य निर्धारण के, जीआई टैग महज़ एक प्रमाणपत्र बनकर रह जाता है — कारीगर की आय का गारंटर नहीं।
RashtraPress
9 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जीआई टैग क्या होता है और पूर्वोत्तर भारत के उत्पादों को यह क्यों मिलता है?
जीआई यानी जियोग्राफिकल इंडिकेशन वह कानूनी मान्यता है जो किसी उत्पाद को उसकी भौगोलिक उत्पत्ति — विशेष मिट्टी, जलवायु, परंपरा या कारीगरी — के आधार पर दी जाती है। पूर्वोत्तर भारत की अनूठी जैव-विविधता और सदियों पुरानी बुनाई-कृषि परंपराओं के कारण यहाँ के अनेक उत्पाद इस श्रेणी में आते हैं।
PM मोदी ने इटली यात्रा में कौन-से जीआई उत्पाद उपहार में दिए?
रिपोर्टों के अनुसार, PM मोदी ने इटली सहित कई देशों के नेताओं को भारत के विभिन्न राज्यों से जुड़े जीआई टैग उत्पाद भेंट किए, जिनमें असम का प्रसिद्ध मूगा रेशम शॉल प्रमुख रूप से शामिल था। इन उपहारों का उद्देश्य भारत की सांस्कृतिक विविधता और स्थानीय कारीगरी को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करना था।
नागा किंग चिली (भूत जोलोकिया) इतनी खास क्यों है?
नागालैंड की नागा किंग चिली, जिसे भूत जोलोकिया भी कहा जाता है, दुनिया की सबसे तीखी मिर्चों में गिनी जाती है और इसे जीआई टैग प्राप्त है। वैश्विक खाद्य और मसाला उद्योग में इसकी विशेष माँग है, और यह नागालैंड की पारंपरिक कृषि पहचान का प्रतीक बन चुकी है।
जीआई टैग से पूर्वोत्तर भारत के किसानों और कारीगरों को क्या फायदा होता है?
जीआई टैग मिलने से स्थानीय उत्पादों की कीमत और माँग दोनों बढ़ती हैं, नकल से सुरक्षा मिलती है और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुँच आसान होती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार के नए अवसर पैदा होते हैं और किसानों व बुनकरों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिलने की संभावना बढ़ती है।
पूर्वोत्तर भारत के प्रमुख जीआई टैग उत्पाद कौन-से हैं?
पूर्वोत्तर के प्रमुख जीआई उत्पादों में असम का मूगा सिल्क, जोहा राइस और गमोसा; मणिपुर का चक-हाओ काला चावल; नागालैंड की भूत जोलोकिया; त्रिपुरा का क्वीन पाइन एप्पल; सिक्किम की बड़ी इलायची; और अरुणाचल प्रदेश का इदु मिश्मी टेक्सटाइल एवं खामती चावल शामिल हैं।
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