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झारखंड के 11 पारंपरिक उत्पादों को जीआई टैग, केसरिया कलाकंद और भगैया साड़ी को मिली वैश्विक पहचान

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झारखंड के 11 पारंपरिक उत्पादों को जीआई टैग, केसरिया कलाकंद और भगैया साड़ी को मिली वैश्विक पहचान

सारांश

झारखंड को एक साथ 11 जीआई टैग मिले — केसरिया कलाकंद से लेकर जादोपटिया पेंटिंग तक। 2019 में सिर्फ एक उत्पाद से आज 12 तक का सफर राज्य की सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा मोड़ है।

मुख्य बातें

झारखंड के 11 पारंपरिक उत्पादों को 17 जून 2025 को एक साथ जीआई टैग प्रदान किया गया।
इसके साथ राज्य के जीआई-पंजीकृत उत्पादों की कुल संख्या 1 (2019) से बढ़कर 12 हो गई।
टैग पाने वाले उत्पादों में केसरिया कलाकंद (झुमरीतिलैया) , भगैया साड़ी (गोड्डा) , जादोपटिया पेंटिंग , डोकरा शिल्प और तसर सिल्क शामिल हैं।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसे कारीगरों, बुनकरों और आदिवासी समुदायों के परिश्रम की पहचान बताया।
नाबार्ड ने जीआई पंजीकरण प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मांदर, देवघर पेड़ा, धुस्का सहित अन्य उत्पादों को भी जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया जारी है।

झारखंड की पारंपरिक कला, हस्तशिल्प, वस्त्र और खाद्य उत्पादों को 17 जून 2025 को बड़ी अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली, जब राज्य के 11 उत्पादों को एक साथ जीआई (भौगोलिक संकेत) टैग प्रदान किया गया। इस उपलब्धि के साथ झारखंड के जीआई-पंजीकृत उत्पादों की कुल संख्या बढ़कर 12 हो गई है। इसे राज्य की आदिवासी परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय कारीगरों की शिल्पकला को राष्ट्रीय एवं वैश्विक मंच पर स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

किन 11 उत्पादों को मिला जीआई टैग

जीआई टैग पाने वाले उत्पादों में कुचाई सिल्क साड़ी एवं फैब्रिक्स, गोड्डा की भगैया साड़ी एवं फैब्रिक्स, दुमका चादर, पंछी परहन-पंछी साड़ी एवं फैब्रिक्स, झारखंड तसर सिल्क साड़ी एवं फैब्रिक्स, झारखंड डोकरा शिल्प, झारखंड जनजातीय आभूषण, झारखंड बांस शिल्प, कोडरमा (झुमरीतिलैया) का केसरिया कलाकंद, झारखंड बेनम तथा जादोपटिया पेंटिंग शामिल हैं। ये उत्पाद राज्य के विभिन्न जिलों की सदियों पुरानी परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की प्रतिक्रिया

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसे झारखंड के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि यह सम्मान राज्य के कारीगरों, बुनकरों, किसानों और आदिवासी समुदायों के वर्षों के परिश्रम, कौशल और पारंपरिक ज्ञान की पहचान है। उन्होंने रेखांकित किया कि वर्ष 2019 में झारखंड का केवल एक उत्पाद जीआई सूची में था, जो अब बढ़कर 12 हो गया है — यानी छह वर्षों में बारह गुना वृद्धि।

सोरेन ने यह भी कहा कि जीआई टैग मिलने से इन उत्पादों को कानूनी सुरक्षा के साथ-साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में नई पहचान मिलेगी तथा स्थानीय समुदायों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी।

आगे और उत्पादों को जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया जारी

मुख्यमंत्री ने बताया कि झारखंड के वाद्ययंत्र मांदर, पायतकर पेंटिंग, निमुचा शॉल, देवघर पेड़ा, कुसुमी लाह, लाह की चूड़ियाँ, साल बीज, महुआ फूल, करंज बीज, रागी, रुगड़ा और धुस्का सहित अनेक अन्य उत्पादों को भी जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया सक्रिय रूप से जारी है। यह इस बात का संकेत है कि राज्य सरकार अपनी सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था को व्यवस्थित ढंग से मज़बूत करने की दिशा में काम कर रही है।

नाबार्ड की भूमिका और आर्थिक असर

इस पूरी प्रक्रिया में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग मिलने से झारखंड के कारीगरों, बुनकरों, शिल्पकारों और किसानों को बेहतर मूल्य मिलने के साथ-साथ निर्यात के नए अवसर भी खुलेंगे। राज्य सरकार के अनुसार इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूती मिलेगी और पारंपरिक ज्ञान तथा शिल्पकला का संरक्षण भी सुनिश्चित होगा।

जीआई टैग क्या है और यह क्यों ज़रूरी है

भारत में जीआई टैग का प्रावधान 'भौगोलिक संकेत वस्तु (पंजीकरण एवं संरक्षण) अधिनियम, 1999' के तहत किया गया है। यह टैग किसी उत्पाद को उसकी विशिष्ट भौगोलिक पहचान के आधार पर कानूनी संरक्षण प्रदान करता है और नकली उत्पादों पर रोक लगाता है। इसकी वैधता 10 वर्षों तक होती है, जिसे बाद में नवीनीकृत कराया जा सकता है। गौरतलब है कि जीआई टैग बाज़ार में उत्पाद की अलग पहचान स्थापित करता है और उपभोक्ताओं को प्रामाणिकता का भरोसा देता है। आने वाले वर्षों में इन उत्पादों की वैश्विक माँग बढ़ने की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है — क्या इन टैग्स को बाज़ार से जोड़ने का ढाँचा तैयार है? देश के कई राज्यों में जीआई-पंजीकृत उत्पाद टैग मिलने के बाद भी निर्यात या आय में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं दिखा पाए, क्योंकि ब्रांडिंग, पैकेजिंग और वितरण नेटवर्क की कमी रही। झारखंड के आदिवासी शिल्पकारों और बुनकरों को वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब जीआई पंजीकरण के साथ-साथ ई-कॉमर्स एकीकरण, निर्यात प्रोत्साहन और उचित मूल्य सुनिश्चित करने वाले तंत्र भी सक्रिय हों।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड के किन 11 उत्पादों को जीआई टैग मिला है?
17 जून 2025 को कुचाई सिल्क साड़ी, भगैया साड़ी, दुमका चादर, पंछी परहन-पंछी साड़ी, झारखंड तसर सिल्क साड़ी, डोकरा शिल्प, जनजातीय आभूषण, बांस शिल्प, केसरिया कलाकंद (झुमरीतिलैया), झारखंड बेनम और जादोपटिया पेंटिंग को जीआई टैग प्रदान किया गया।
जीआई टैग मिलने से झारखंड के कारीगरों को क्या फायदा होगा?
जीआई टैग मिलने से इन उत्पादों को कानूनी सुरक्षा मिलती है और नकली उत्पादों पर रोक लगती है। विशेषज्ञों के अनुसार इससे कारीगरों को बेहतर मूल्य, निर्यात के नए अवसर और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में अलग पहचान मिलेगी।
2019 से अब तक झारखंड में जीआई टैग की संख्या कितनी बढ़ी?
2019 में झारखंड के केवल एक उत्पाद के पास जीआई टैग था। 11 नए उत्पादों को टैग मिलने के बाद यह संख्या बढ़कर 12 हो गई है, जो छह वर्षों में बारह गुना वृद्धि है।
जीआई टैग क्या होता है और यह कितने समय के लिए वैध होता है?
'भौगोलिक संकेत वस्तु (पंजीकरण एवं संरक्षण) अधिनियम, 1999' के तहत जीआई टैग किसी उत्पाद को उसकी विशिष्ट भौगोलिक पहचान के आधार पर कानूनी संरक्षण देता है। इसकी वैधता 10 वर्षों की होती है और इसे बाद में नवीनीकृत कराया जा सकता है।
झारखंड के और कौन-से उत्पाद जीआई टैग की प्रक्रिया में हैं?
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के अनुसार मांदर, पायतकर पेंटिंग, निमुचा शॉल, देवघर पेड़ा, कुसुमी लाह, लाह की चूड़ियाँ, साल बीज, महुआ फूल, करंज बीज, रागी, रुगड़ा और धुस्का सहित कई उत्पादों को जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया सक्रिय रूप से जारी है।
राष्ट्र प्रेस
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