पूर्व सेना प्रमुख नरवणे का बड़ा खुलासा: चीन को LAC पर पीछे हटाया, भारतीय सेना की ताकत साबित
सारांश
Key Takeaways
- पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने कहा कि भारतीय सेना ने चीन की PLA को LAC पर पीछे हटने पर मजबूर किया।
- जून 2020 की गलवान झड़प के बाद भारत ने सीमा पर सैन्य बुनियादी ढांचा तेजी से मजबूत किया।
- ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने पहली बार आतंकी ठिकानों के साथ-साथ आतंकी नेतृत्व को भी सीधे निशाना बनाया।
- नरवणे ने विपक्ष के दावों को सीधे खारिज करते हुए कहा कि दुश्मन को पीछे हटाना ही जीत है।
- भारत की नई रणनीति रक्षात्मक नहीं बल्कि आक्रामक और निर्णायक है — यह पाकिस्तान और चीन दोनों को स्पष्ट संदेश।
- आने वाले समय में SCO और BRICS मंचों पर भारत-चीन की भागीदारी सीमा पर शांति की दिशा तय करेगी।
नई दिल्ली, 25 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारत-चीन सीमा विवाद पर देश के पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने एक ऐतिहासिक बयान दिया है — भारतीय सेना की दृढ़ और रणनीतिक कार्रवाई के कारण चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) को वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। यह बयान न केवल विपक्ष के उन आरोपों को खारिज करता है जिनमें कहा गया था कि सरकार ने सच्चाई छिपाई, बल्कि यह देश की सैन्य क्षमता का प्रत्यक्ष प्रमाण भी है।
नरवणे का बयान: जीत की परिभाषा क्या होती है?
जनरल नरवणे ने राष्ट्र प्रेस को दिए इंटरव्यू में साफ शब्दों में कहा कि सीमा पर जो कुछ भी हुआ वह भारतीय सेना, सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के बेहतरीन तालमेल का परिणाम था। उन्होंने सवाल उठाने वालों को दो टूक जवाब देते हुए कहा कि अगर दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर करना जीत नहीं है, तो फिर जीत की परिभाषा क्या होगी?
यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सेना के सर्वोच्च नेतृत्व की ओर से आया है, जो जमीनी हकीकत से सीधे परिचित था। 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद से ही भारत-चीन सीमा पर तनाव चरम पर था और विपक्ष लगातार यह दावा करता रहा कि सरकार ने वास्तविक स्थिति को जनता से छिपाया।
विपक्ष के आरोप और सैन्य वास्तविकता
विपक्षी दलों ने बार-बार आरोप लगाया कि चीन ने भारतीय भूमि पर अतिक्रमण किया और सरकार ने पारदर्शिता नहीं दिखाई। लेकिन जनरल नरवणे का यह बयान इन दावों को सीधे चुनौती देता है। उनके अनुसार LAC पर भारतीय सेना की तैनाती और रणनीतिक दबाव ने ही PLA को पीछे हटने पर विवश किया।
गौरतलब है कि 2021-2022 के दौरान पैंगोंग त्सो, गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स और देपसांग जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भारत और चीन के बीच बफर जोन बनाए गए और दोनों देशों की सेनाएं पीछे हटीं। भारतीय सेना ने इस पूरी प्रक्रिया में अपनी रणनीतिक स्थिति को कमजोर नहीं होने दिया।
ऑपरेशन सिंदूर: भारत की बदली रणनीति का संकेत
जनरल नरवणे ने ऑपरेशन सिंदूर का विशेष उल्लेख करते हुए बताया कि भारत की सैन्य रणनीति अब पहले से कहीं अधिक आक्रामक और निर्णायक हो गई है। पहले जहां केवल आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया जाता था, वहीं इस ऑपरेशन में आतंकी नेतृत्व को भी सीधे निशाने पर लिया गया।
यह बदलाव भारत की जीरो टॉलरेंस नीति का व्यावहारिक रूप है। अब भारत केवल प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि जरूरत पड़ने पर दुश्मन के घर में घुसकर जवाब देने की क्षमता और इच्छाशक्ति दोनों रखता है। यह रणनीतिक बदलाव पाकिस्तान और चीन दोनों को एक स्पष्ट संदेश है।
भारत की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं
नरवणे ने स्पष्ट किया कि यदि कोई भी देश भारत के खिलाफ साजिश रचेगा या सीमा पर तनाव बढ़ाने की कोशिश करेगा, तो उसे इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के साथ किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं है।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब ऑपरेशन सिंदूर के बाद पूरे क्षेत्र में भारत की सैन्य छवि और भी मजबूत हुई है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह बदली हुई रणनीति आने वाले वर्षों में दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा देगी।
ऐतिहासिक संदर्भ और आगे की राह
जून 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प में 20 भारतीय जवान शहीद हुए थे और चीनी सेना को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा था। उसके बाद से भारत ने LAC पर अपनी सैन्य उपस्थिति और बुनियादी ढांचे को तेजी से मजबूत किया। अरुणाचल प्रदेश से लेकर लद्दाख तक सड़कें, सुरंगें और सैन्य अड्डे बनाए गए जिन्होंने भारत की त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया।
आने वाले समय में भारत-चीन के बीच कूटनीतिक वार्ता का अगला दौर और SCO तथा BRICS जैसे मंचों पर दोनों देशों की भागीदारी यह तय करेगी कि सीमा पर शांति कितनी टिकाऊ है।