बिहार में बाल श्रम के खिलाफ बड़ी कार्रवाई: 68 जगह छापे, 34 बच्चे मुक्त, 15 FIR दर्ज
सारांश
मुख्य बातें
बिहार श्रम संसाधन एवं प्रवासी श्रमिक कल्याण विभाग ने 20 और 21 मई 2025 को राज्यभर में बाल श्रम उन्मूलन के लिए चलाए गए विमुक्ति अभियान के तहत 68 प्रतिष्ठानों पर छापेमारी की, जिसमें 34 बाल एवं किशोर श्रमिकों को मुक्त कराया गया और 15 प्राथमिकियाँ दर्ज की गईं। यह अभियान गोपालगंज, बेगूसराय, औरंगाबाद, सिवान, गया और बेतिया सहित कई जिलों में एक साथ संचालित किया गया।
मुख्य घटनाक्रम
विभाग के निर्देश पर धावा दलों ने दुकानों, ढाबों और अन्य प्रतिष्ठानों में जाँच की। बेतिया में श्रम अधीक्षक विजय कुमार ठाकुर के नेतृत्व में चनपटिया प्रखंड के विभिन्न प्रतिष्ठानों पर छापा मारकर दो बाल श्रमिकों को मुक्त कराया गया। इसी तरह गोपालपुर थाना क्षेत्र के लौकरिया चौक स्थित एक दुकान से भी दो बच्चों को बचाया गया।
मुक्त कराए गए बच्चों को बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जहाँ उन्हें निर्देशानुसार बाल गृह में रखा गया है। संबंधित प्रतिष्ठान मालिकों के विरुद्ध बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 के तहत प्राथमिकी दर्ज करने की प्रक्रिया आरंभ कर दी गई है।
अभियान का नेतृत्व और टीम
इस पूरे अभियान का नेतृत्व श्रम प्रवर्तन पदाधिकारी लौकेश कुमार झा ने किया। उनके साथ श्रम प्रवर्तन पदाधिकारी विभेश कुमार सिंह, भीम कुमार, प्रयास संस्था के कन्हैया कुमार, चाइल्ड लाइन, ग्राम नियोजन केंद्र तथा गोपालपुर थाना की टीम भी शामिल रही। यह बहु-विभागीय समन्वय इस अभियान की व्यापकता को दर्शाता है।
कानूनी प्रावधान और दंड
श्रम अधीक्षक विजय कुमार ठाकुर ने स्पष्ट किया कि किसी भी दुकान या प्रतिष्ठान में बाल श्रमिकों से काम कराना कानूनन अपराध है। दोषी नियोजकों पर ₹20,000 से ₹50,000 तक का जुर्माना और दो वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है। गौरतलब है कि यह कानून 1986 से लागू है, फिर भी बिहार के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बाल श्रम की समस्या बनी हुई है।
आम जनता पर असर और आगे की राह
श्रम विभाग ने स्पष्ट किया है कि विमुक्ति अभियान आगे भी निरंतर जारी रहेगा और बाल श्रमिक रखने वालों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह ऐसे समय में आया है जब देश में बाल श्रम उन्मूलन की दिशा में केंद्र और राज्य सरकारें दोनों दबाव में हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि छापेमारी के साथ-साथ मुक्त बच्चों के पुनर्वास और शिक्षा सुनिश्चित करना उतना ही ज़रूरी है जितना दोषियों पर कार्रवाई।