12वें ब्रिक्स संसदीय फोरम की नई दिल्ली में शुरुआत, भाजपा सांसदों ने कहा — वैश्विक चुनौतियों पर होगा सार्थक मंथन
सारांश
मुख्य बातें
भारत की अध्यक्षता में 12वाँ ब्रिक्स संसदीय फोरम 26 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में शुरू हुआ, जिसमें ब्रिक्स के 11 सदस्य देशों और उनके 10 साझेदार देशों के वक्ता व प्रतिनिधिमंडल भाग ले रहे हैं। दो दिवसीय इस सम्मेलन में आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण और द्विपक्षीय व्यापार जैसे वैश्विक मुद्दों पर विचार-विमर्श होगा। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसदों ने इसे ग्लोबल साउथ की आवाज़ को मज़बूत करने का ऐतिहासिक अवसर बताया।
भाजपा सांसदों की प्रतिक्रिया
भाजपा सांसद नरेश बंसल ने कहा, 'भारत की अध्यक्षता में आज यह 12वें ब्रिक्स पार्लियामेंट्री फोरम की दो दिन की बैठकें हो रही हैं, जिसमें अनेक द्विपक्षीय वार्ताएं नेताओं के बीच होंगी। विश्व के सामने जो समस्याएं हैं — आतंकवाद की होगी, पर्यावरण की होगी, जलवायु की होगी, आपस में ट्रेड करने के तरीकों की होगी — तो सब का समाधान आपस में संवाद से, वार्ता से निकलेगा। मैं मानता हूं कि बैठक बहुत सफल बैठक होगी।'
भाजपा सांसद शशांक मणि त्रिपाठी ने कहा, 'विश्व का सबसे बड़ी संसद सभी पार्लियामेंट्री फोरम के लोगों की मेजबानी कर रही है। हमारे ग्लोबल साउथ का प्रतिनिधित्व और भी सुदृढ़ होगा और यहाँ पर जो सार्थक चर्चा होगी, उसमें पीपल्स-सेंट्रिक गवर्नेंस और पीपल्स-सेंट्रिक डेवलपमेंट के बारे में काफी बात होगी।'
भाजपा सांसद जगदम्बिका पाल ने फोरम की व्यापकता का उल्लेख करते हुए कहा, '21 देशों के स्पीकर और प्रतिनिधिमंडल इसमें हिस्सा ले रहे हैं, जो इसे बेहद महत्वपूर्ण बनाता है।'
राहुल गांधी की अनुपस्थिति पर विवाद
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के इस सम्मेलन में शामिल न होने को लेकर भाजपा सांसदों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। सांसद नरेश बंसल ने कहा कि 'अब उनको देश की समस्याओं से कुछ लेना-देना नहीं है।' उन्होंने गांधी को 'हताश और निराश पार्ट-टाइम पॉलिटिशियन' करार दिया।
सांसद जगदम्बिका पाल ने गांधी की अनुपस्थिति को 'लोकतंत्र का मजाक उड़ाने' जैसा बताया और कहा कि यह न केवल संसदीय परंपराओं का बल्कि देश का भी अपमान है। हालांकि, सांसद शशांक मणि त्रिपाठी ने अपेक्षाकृत संयमित रुख अपनाते हुए कहा कि गांधी को नेता प्रतिपक्ष के नाते इस सम्मेलन में शामिल होना चाहिए था।
सम्मेलन का महत्व और पृष्ठभूमि
यह ऐसे समय में आया है जब भारत वैश्विक मंचों पर ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधि के रूप में अपनी भूमिका मज़बूत करने की कोशिश में है। गौरतलब है कि भारत पहले भी G20 की अध्यक्षता के दौरान विकासशील देशों के हितों को प्राथमिकता देने का संकल्प ले चुका है। इस फोरम में भाग ले रहे देश वैश्विक GDP और जनसंख्या के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिससे यहाँ होने वाले निर्णयों का असर व्यापक होगा।
सम्मेलन में व्यापार के नए तरीकों, जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीतियों और आतंकवाद-रोधी सहयोग पर केंद्रित द्विपक्षीय वार्ताएँ होने की उम्मीद है।
आगे का कार्यक्रम
दो दिवसीय फोरम में भाग ले रहे सभी 21 देशों के प्रतिनिधि विभिन्न कार्य-समूहों में अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा करेंगे। सम्मेलन के अंत में एक संयुक्त घोषणापत्र जारी किए जाने की संभावना है जो भाग लेने वाले देशों की साझा प्राथमिकताएँ निर्धारित करेगा।