कैग रिपोर्ट में गंभीर खुलासा- 'जम्मू-कश्मीर में 697 झीलों में से 518 झीलें लुप्त'
सारांश
Key Takeaways
- 518 झीलें जम्मू-कश्मीर में गायब हो गई हैं।
- अतिक्रमण और शहरीकरण के कारण 315 झीलें पूरी तरह से लुप्त हो गई हैं।
- रिपोर्ट में सात जल निकायों का उल्लेख है जो सूख चुके हैं।
- भविष्य में जल निकायों के संरक्षण के लिए एकीकृत प्राधिकरण की जरूरत है।
श्रीनगर, 6 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। जम्मू-कश्मीर पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की हालिया रिपोर्ट में एक चिंताजनक स्थिति का खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, 518 झीलें या तो पूरी तरह से गायब हो चुकी हैं या इतनी खराब अवस्था में हैं कि उनकी पुनः प्राप्ति संभव नहीं है।
कैग की रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर में एक गंभीर पर्यावरणीय संकट का संकेत दिया गया है, जिसमें सर्वेक्षण की गई 697 झीलों में से 518 झीलें या तो लुप्त हो गई हैं या उनकी स्थिति अत्यंत खराब हो चुकी है।
1967 से 2020 तक के आंकड़ों का विश्लेषण करने वाली इस ऑडिट में यह सामने आया है कि अतिक्रमण, शहरीकरण और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण 315 झीलें पूरी तरह से गायब हो गई हैं।
कैग ने केंद्र शासित प्रदेश में उभर रहे पारिस्थितिकी संकट पर ध्यान केंद्रित किया है, जो बिना आवश्यक उपायों के और भी गंभीर हो सकता है।
रिपोर्ट में विशेष रूप से सात जल निकायों की पहचान की गई है, जो सूख चुके हैं, जिनमें राख-ए-अर्थ, सेथरगुंड नुंबल, मरहामा, देवपुरसर, महतान, चंदरगर नुंबल और गलवाल तालाब शामिल हैं, जो सूखने के बाद 'अदृश्य' हो गए हैं।
यह गिरावट मुख्यतः मानव गतिविधियों के कारण हुई है, जो आर्द्रभूमि को कृषि, आवासीय या व्यावसायिक उपयोग में बदलने के कारण उत्पन्न हुई। रिपोर्ट में डल और वुलर जैसी प्रमुख जल निकायों के संरक्षण प्रयासों की विफलता को उजागर किया गया है, जिसमें अनुपचारित सीवेज और संबंधित अधिकारियों की अक्षमता को महत्वपूर्ण मुद्दों के रूप में बताया गया है।
लुप्त हुई 315 झीलों में से 235 का प्रबंधन राजस्व और कृषि विभागों के अंतर्गत था, जबकि 80 झीलों का प्रबंधन वन विभाग द्वारा किया गया। केवल छह प्रमुख झीलों (डल, वुलर, होकरसर, मानसबल, सुरिंसर और मानसर) पर ही ध्यान दिया गया, जिससे अन्य 691 झीलों के लिए कोई प्रभावी प्रबंधन योजना नहीं बनाई जा सकी।
कैग की रिपोर्ट में भविष्य में होने वाले नुकसान को रोकने और इन महत्वपूर्ण जल निकायों के पुनर्स्थापन के लिए एक विशेष और एकीकृत प्राधिकरण की स्थापना की सिफारिश की गई है।
इसी संदर्भ में हाल ही में किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन में कश्मीर हिमालय के पांच ऊंचाई वाले हिमनदों को हिमनद विस्फोट बाढ़ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बताया गया है। यह बाढ़ बादल फटने जैसी चरम मौसम की घटनाओं से उत्पन्न हो सकती है।