चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन: सुप्रीम कोर्ट की चिंता लुप्तप्राय वन्यजीवों की सुरक्षा पर
सारांश
Key Takeaways
- सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप लुप्तप्राय वन्यजीवों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।
- अवैध खनन से वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों को खतरा है।
- अभयारण्य का क्षेत्र लगभग 435 किलोमीटर लंबा है।
- रिवर डॉल्फिन, घड़ियाल और दुर्लभ पक्षियों की प्रजातियां यहां पाई जाती हैं।
- सुप्रीम कोर्ट ने अवैध खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए हैं।
नई दिल्ली, १३ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में चंबल अभयारण्य में हो रहे अवैध रेत खनन पर स्वतः संज्ञान लिया है। यह कदम विशेष रूप से लुप्तप्राय वन्यजीवों, जैसे घड़ियाल, रिवर डॉल्फिन और दुर्लभ पक्षियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले में चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हाल के समाचार पत्रों और सीएसआर द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों के आधार पर यह संज्ञान लिया गया है। रिपोर्टों में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है कि संरक्षित क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अवैध खनन हो रहा है, जो वन्यजीवों के जीवन को गंभीर खतरे में डाल रहा है।
जस्टिस विक्रम नाथ ने बताया कि कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां मुख्यमंत्री योगी द्वारा घड़ियालों को छोड़ा गया था, लेकिन वे भी अब अवैध खनन के दायरे में आ गए हैं। इस खनन के चलते घड़ियालों को स्थानांतरित होना पड़ा है और उनकी प्राकृतिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उचित दिशा-निर्देशों के लिए प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) के समक्ष इसे प्रस्तुत करने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संरक्षित क्षेत्रों में किसी भी प्रकार का खनन और रेत का परिवहन पूरी तरह से प्रतिबंधित है। इसके बावजूद अवैध खनन की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। यह न केवल वन्यजीवों के लिए खतरा है, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र को भी असंतुलित कर सकता है। अभयारण्य में अवैध खनन के कारण स्थानीय वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों में बदलाव आ रहा है।
राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य का क्षेत्र लगभग ४३५ किलोमीटर लंबा है और इसे देश के सबसे संवेदनशील पर्यावरणीय क्षेत्रों में गिना जाता है। यह क्षेत्र न केवल घड़ियालों का घर है, बल्कि यहां रिवर डॉल्फिन, कछुओं और कई दुर्लभ पक्षियों की प्रजातियां भी पाई जाती हैं। रेत इस पूरे पारिस्थितिक तंत्र का आधार है। अगर अवैध खनन जारी रहता है, तो इन प्रजातियों के अस्तित्व पर सीधा खतरा पैदा हो सकता है।