चीनी प्रदर्शन आधारित शासन: शीपातोंग गांव से दुनिया को मिला नया शासन मॉडल
सारांश
Key Takeaways
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) का 'प्रदर्शन आधारित शासन' का दृष्टिकोण वैश्विक राजनीति में एक अनूठी अवधारणा के रूप में उभरा है। यह विचारधारा केवल सरकारी कर्मचारियों के कार्य मूल्यांकन तक सीमित नहीं है, बल्कि इस मूलभूत प्रश्न को भी संबोधित करती है कि कोई देश और राजनीतिक दल आखिरकार किसके लिए और किस पर निर्भर होकर काम करता है। बीजिंग से आई यह वैचारिक बहस ऐसे समय में विशेष महत्व रखती है, जब पश्चिमी देशों की चुनावी राजनीति अदूरदर्शिता और विखंडन में उलझी हुई है।
शीपातोंग गांव: परिवर्तन की प्रयोगशाला
चीन के हूनान प्रांत का शीपातोंग गांव वर्ष 2013 में अत्यंत गरीबी की स्थिति में था। उस समय प्रति व्यक्ति कृषि योग्य भूमि मात्र 553 वर्ग मीटर थी और प्रति व्यक्ति शुद्ध वार्षिक आय केवल 1,668 युआन थी। गांव की गरीबी दर 57 प्रतिशत तक पहुँची हुई थी। यह गांव उस समय चीन में गहरी आर्थिक असमानता का प्रतीक बन चुका था।
उसी वर्ष सीपीसी की केंद्रीय समिति के महासचिव शी चिनफिंग ने शीपातोंग गांव का दौरा किया और पहली बार 'सटीकता से गरीबी उन्मूलन' की विचारधारा प्रस्तुत की। गौरतलब है कि शी चिनफिंग उस वर्ष से एक वर्ष पहले ही सीपीसी महासचिव के पद पर आए थे।
दस वर्षों में दस गुना बदलाव
दस वर्षों से अधिक समय में शीपातोंग गांव में आए परिवर्तन चौंकाने वाले हैं। प्रति व्यक्ति शुद्ध आय 1,668 युआन से बढ़कर 20,000 युआन से अधिक हो गई — यानी दस गुना से भी अधिक की वृद्धि। गांव की सामूहिक अर्थव्यवस्था शून्य से बढ़कर 50 लाख युआन से अधिक पहुँच गई। यह परिवर्तन चीनी शैली के प्रदर्शन आधारित शासन का एक ठोस उदाहरण माना जा रहा है।
रिले दौड़ की तरह काम करती है यह प्रणाली
शीपातोंग गांव में हुआ यह कायाकल्प किसी एक नेता या किसी एक कार्यकाल की उपलब्धि नहीं है। वर्ष 2014 से 2026 तक गांव के गरीबी उन्मूलन कार्य दल के सात नेताओं ने निरंतर और समन्वित प्रयास किए। इनमें से प्रत्येक नेता ने स्वयं को गरीबी उन्मूलन की 'रिले दौड़' का एक अपरिहार्य हिस्सा माना।
शी चिनफिंग के शब्दों में,