क्या एआई में वैश्विक सहयोग का संदेश चीन का साझा प्रगति है?

सारांश
Key Takeaways
- चीन का एआई में वैश्विक सहयोग पर जोर।
- संयुक्त अनुसंधान के माध्यम से समान लाभ।
- नैतिकता और नियमन पर ध्यान।
- भारत और चीन का सहयोग क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव डाल सकता है।
- एआई का उपयोग मानवता की भलाई के लिए किया जाना चाहिए।
बीजिंग, 30 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के क्षेत्र में, चीन ने एक बार फिर वैश्विक सहयोग और साझा प्रगति पर जोर दिया है। चीन का कहना है कि एआई केवल एक तकनीकी प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह मानवता की भलाई और वैश्विक विकास के लिए साझा अवसर प्रदान करता है।
चीन लगातार अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर यह संदेश देता आया है कि एआई का उपयोग जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य सेवाओं, खाद्य सुरक्षा और सतत विकास जैसे प्रमुख मुद्दों से निपटने के लिए होना चाहिए। चीन का मानना है कि एआई अनुसंधान और विकास में संयुक्त योगदान से दुनिया के सभी देशों को समान रूप से लाभ मिल सकता है।
हाल के वर्षों में, चीन ने एआई अनुसंधान और नवाचार में भारी निवेश किया है और विदेशी विश्वविद्यालयों, संस्थानों और कंपनियों के साथ सहयोग की नीति अपनाई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे वैश्विक स्तर पर तकनीकी साझेदारी को नई दिशा मिल सकती है।
चीन एआई नैतिकता और नियमन पर भी विशेष ध्यान देता है। उसका तर्क है कि निजता की सुरक्षा, गलत सूचनाओं की रोकथाम और रोजगार पर एआई के प्रभाव जैसे मुद्दों के लिए साझा अंतर्राष्ट्रीय मानक आवश्यक हैं।
भारतीय विशेषज्ञ भी चीन की इस दृष्टिकोण को महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका मानना है कि, “एआई किसी एक देश या क्षेत्र की सीमा में नहीं बंधा है। भारत और चीन जैसे बड़े देशों के बीच सहयोग से एशिया को वैश्विक एआई विकास का केंद्र बनाया जा सकता है।”
“भारत के पास एआई टैलेंट और सॉफ्टवेयर क्षमताएं हैं, जबकि चीन के पास हार्डवेयर और बड़े पैमाने पर डेटा प्रोसेसिंग का अनुभव है। यदि दोनों देश मिलकर काम करें, तो यह सहयोग न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एआई की दिशा तय कर सकता है।”
विश्लेषकों का मानना है कि चीन का दृष्टिकोण इस विचार को मजबूत करता है कि एआई किसी एक देश की संपत्ति नहीं, बल्कि वैश्विक साझेदारी का साधन है।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)