पीएलए को पीछे हटने पर मजबूर किया भारतीय सेना ने — पूर्व सेना प्रमुख नरवणे का बड़ा खुलासा
सारांश
Key Takeaways
- जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने पुष्टि की कि भारतीय सेना ने चीन की पीएलए को सीमा पर पीछे हटने पर मजबूर किया।
- नरवणे ने कहा कि यह सफलता केवल सेना की नहीं, बल्कि पूरे देश के सामूहिक प्रयास का परिणाम है।
- ऑपरेशन सिंदूर में पहली बार आतंकी संगठनों के नेतृत्व मुख्यालयों को भी निशाना बनाया गया, जो पुराने ऑपरेशनों से अलग था।
- नरवणे ने तेल और क्रिटिकल मिनरल्स में आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य बताया।
- ईरान-इजराइल-अमेरिका संघर्ष का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वैश्विक युद्धों से सीखकर भारत को अपनी रक्षा नीति मजबूत करनी होगी।
- पाकिस्तान को संदेश दिया गया कि आतंकवाद को समर्थन देने पर भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
गुरुग्राम, 25 अप्रैल। चीन सीमा पर भारत की निर्णायक सैन्य कार्रवाई को लेकर पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने एक बड़ा और महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारतीय सेना ने सीमा पर हालात को मजबूती से संभाला और चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को पीछे हटने पर विवश किया। यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत-चीन सीमा तनाव को लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चा जारी है।
सामूहिक राष्ट्रीय प्रयास से मिली सफलता
राष्ट्र प्रेस के साथ विशेष बातचीत में जनरल नरवणे ने कहा कि सीमा पर किसी भी कार्रवाई की सफलता केवल सेना के बूते नहीं होती। यह पूरे देश का सामूहिक प्रयास होता है, जिसमें विभिन्न सरकारी एजेंसियां, खुफिया तंत्र और नीति-निर्माता मिलकर काम करते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत की एकजुट प्रतिक्रिया का ही परिणाम था कि पीएलए को अपनी स्थिति बदलनी पड़ी। उनके शब्दों में — "अगर यह जीत नहीं है, तो और क्या है?" यह वाक्य उस आत्मविश्वास को दर्शाता है जो भारतीय सैन्य नेतृत्व में मौजूद है।
भारतीय सेना की रणनीतिक बढ़त
जनरल नरवणे ने बताया कि सीमा पर उठाए गए हर कदम को पूरी रणनीति और समन्वय के साथ अंजाम दिया गया। इस सुनियोजित कार्रवाई ने भारत को सामरिक बढ़त दिलाई और चीन को यह संदेश दिया कि भारतीय सेना किसी भी चुनौती का जवाब देने में पूरी तरह सक्षम है।
गौरतलब है कि 2020 में गलवान घाटी संघर्ष के बाद से भारत-चीन सीमा पर तनाव की स्थिति बनी रही थी। पूर्वी लद्दाख में पीएलए की आक्रामकता के जवाब में भारत ने जिस दृढ़ता से सैनिकों की तैनाती की और कूटनीतिक दबाव बनाया, उसी का नतीजा था कि 2024 में दोनों देशों के बीच गश्त समझौता संभव हो सका।
वैश्विक युद्धों से सीख और आत्मनिर्भरता की जरूरत
जनरल नरवणे ने ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष का संदर्भ देते हुए कहा कि हर युद्ध अपने साथ महत्वपूर्ण सबक लेकर आता है। असली विश्लेषण युद्ध समाप्त होने के बाद होता है, लेकिन मौजूदा वैश्विक हालात एक बात साफ कर देते हैं — भारत को हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना अनिवार्य है।
उन्होंने विशेष रूप से तेल और क्रिटिकल मिनरल्स का उल्लेख किया। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अभी भी अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 85 प्रतिशत आयात पर निर्भर है, और लिथियम, कोबाल्ट जैसे रणनीतिक खनिजों के लिए भी बड़े पैमाने पर विदेशी स्रोतों पर आश्रित है।
ऑपरेशन सिंदूर — एक नई रणनीतिक सोच
जनरल नरवणे ने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा कि यह ऑपरेशन पिछले सैन्य अभियानों से गुणात्मक रूप से अलग था। इस बार केवल आतंकी ठिकानों को नहीं, बल्कि आतंकी संगठनों के नेतृत्व मुख्यालयों को भी निशाना बनाया गया।
उन्होंने रक्षा मंत्री के उस बयान का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि "हम घर में घुसकर मारेंगे।" नरवणे के अनुसार इस ऑपरेशन ने पाकिस्तान को एक स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया है — अगर वह भारत के विरुद्ध आतंकवाद को प्रश्रय देता रहा, तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर है और भारत की सैन्य व कूटनीतिक नीति की दिशा पर पूरी दुनिया की नजर टिकी है। आने वाले हफ्तों में भारत की सीमा नीति और सैन्य तैयारियों को लेकर और अधिक महत्वपूर्ण घोषणाएं संभव हैं।