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तिब्बत बाढ़: चीनी सेंसरशिप से तबाही का सच छुपा, RSF ने कहा — 'सूचना का ब्लैक होल'

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तिब्बत बाढ़: चीनी सेंसरशिप से तबाही का सच छुपा, RSF ने कहा — 'सूचना का ब्लैक होल'

सारांश

तिब्बत में विनाशकारी बाढ़ के बाद चीन ने स्वतंत्र मीडिया को क्षेत्र में प्रवेश से रोका। RSF के अनुसार मृतक संख्या आधिकारिक 16 से कहीं अधिक हो सकती है। वीचैट पर पोस्ट सेंसर, 10 इंटरनेट यूज़र्स पर कार्रवाई — और नेपाल में 1,000 से अधिक मौतों से जुड़ी इस आपदा का सच अब भी अँधेरे में है।

मुख्य बातें

RSF ने तिब्बत बाढ़ के बाद चीन द्वारा मीडिया पर लगाई गई कथित सेंसरशिप की कड़ी निंदा की है।
किसी भी स्वतंत्र या अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान को बाढ़ प्रभावित तिब्बती क्षेत्रों में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई।
मृतक संख्या पर विवाद: चीन का आधिकारिक आँकड़ा 16 , जबकि तिब्बत रेडियो का दावा 29 से अधिक।
वीचैट पर बाढ़ संबंधी पोस्ट कथित तौर पर सेंसर; 'अफवाह फैलाने' के आरोप में 10 इंटरनेट यूज़र्स पर कार्रवाई।
26 अगस्त को तिब्बत से उद्गमित बाढ़ भोटेकोशी नदी के रास्ते नेपाल के रसुवा क्षेत्र तक पहुँची; नेपाल में 1,000 से अधिक मौतें।
RSF एशिया-प्रशांत प्रमुख अलेक्जेंड्रा बिएलाकोव्स्का ने तिब्बत को 'सूचना का ब्लैक होल' करार दिया।

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) ने तिब्बती क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद चीन द्वारा मीडिया पर लगाई गई कथित सेंसरशिप की कड़ी निंदा की है। संगठन के अनुसार, किसी भी स्वतंत्र पत्रकार या अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में जाकर स्वतंत्र रिपोर्टिंग की अनुमति नहीं दी गई, जिससे तिब्बत में फ्लैश फ्लड से हुई वास्तविक तबाही का अनुमान लगाना लगभग असंभव हो गया है।

मीडिया पर पूर्ण नियंत्रण का आरोप

RSF के अनुसार, चीनी अधिकारियों ने बाढ़ की रिपोर्टिंग का अधिकार केवल सरकारी मीडिया को दिया। इन रिपोर्टों में राहत एवं बचाव कार्यों में सरकार की 'उपलब्धियों' को प्रमुखता दी जा रही है, जबकि आपदा के वास्तविक पैमाने और उसके व्यापक मानवीय प्रभाव की स्वतंत्र तस्वीर सामने नहीं आ पा रही। संगठन ने कहा कि यह चीन में पत्रकारों पर लंबे समय से जारी कड़े नियंत्रण को उजागर करता है।

RSF ने चीन के सरकारी अखबार शिनजिंग बाओ (द बीजिंग न्यूज़) के हवाले से बताया कि अधिकारियों ने आपदा से संबंधित कथित 'अफवाहें फैलाने' के आरोप में 10 इंटरनेट यूज़र्स के विरुद्ध कार्रवाई भी की है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

RSF एशिया-प्रशांत की एडवोकेसी प्रमुख अलेक्जेंड्रा बिएलाकोव्स्का ने कहा कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में हाल के वर्षों में तिब्बत 'वास्तविक अर्थों में सूचना का ब्लैक होल' बन गया है। उन्होंने कहा, 'स्वतंत्र तिब्बती मीडिया या अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों को इस स्वायत्त क्षेत्र से स्वतंत्र रूप से खबरें करने की अनुमति नहीं है। वहाँ केवल सरकारी नियंत्रण वाले मीडिया और प्रचार तंत्र से जुड़े संस्थान ही काम कर सकते हैं, जो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रचार विभाग के दिशा-निर्देशों के अनुसार खबरें प्रकाशित करते हैं।'

स्वतंत्र मीडिया संस्थान तिब्बत रेडियो के प्रधान संपादक कालसांग जिग्मे ने कहा, 'इस बार सूचना पर नियंत्रण पहले की प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में कहीं अधिक कड़ा नज़र आ रहा है। पत्रकारों के लिए आपदा की वास्तविक गंभीरता का पता लगाना बेहद मुश्किल हो गया है।'

मृतक संख्या पर विवाद

RSF के अनुसार, तिब्बत रेडियो द्वारा जुटाई गई जानकारी के आधार पर करीब 29 तिब्बतियों की मौत हुई है, जबकि चीन की आधिकारिक संख्या 16 है। तिब्बती मीडिया संस्थानों का कहना है कि वास्तविक मृतक संख्या इससे काफी अधिक हो सकती है, परंतु सीमित पहुँच और विश्वसनीय स्रोतों की कमी के कारण आँकड़ों की पुष्टि करना संभव नहीं है।

जिग्मे ने बताया कि उन्होंने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले तिब्बतियों के निर्वासित परिजनों से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कई लोग सार्वजनिक रूप से जानकारी साझा करने से हिचक रहे हैं — उन्हें डर है कि ऐसा करने से तिब्बत में रह रहे उनके परिवार के सदस्यों को नुकसान पहुँच सकता है।

सोशल मीडिया पर भी सेंसरशिप

RSF ने चीन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी व्यापक सेंसरशिप का आरोप लगाया है। विशेष रूप से वीचैट पर बाढ़ से संबंधित कई पोस्ट और संदर्भ कथित तौर पर हटा दिए गए या सेंसर कर दिए गए।

नेपाल तक पहुँची तबाही

यह बाढ़ 26 अगस्त को नेपाल के रसुवा क्षेत्र में भी भारी तबाही लेकर आई। बाढ़ का उद्गम चीन के तिब्बती क्षेत्र में था और पानी सीमा पार बहने वाली भोटेकोशी नदी के रास्ते नेपाल में घुसा। इस आपदा में नेपाल में 1,000 से अधिक लोगों की मौत हुई और हिमालयी देश के कई इलाकों में व्यापक नुकसान दर्ज किया गया। गौरतलब है कि तिब्बत में सूचना की अनुपलब्धता के कारण इस आपदा की सीमापार प्रकृति और मूल कारणों की भी स्वतंत्र जाँच नहीं हो पाई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

क्योंकि इसी बाढ़ का पानी नेपाल में 1,000 से अधिक जानें लेकर गया। जब किसी सीमापार आपदा का उद्गम स्थल सूचना के लिहाज़ से बंद हो, तो पड़ोसी देशों की तैयारी और जवाबदेही दोनों प्रभावित होती हैं। आधिकारिक मृतक संख्या 16 और तिब्बती मीडिया के दावे 29 के बीच का अंतर महज़ आँकड़ों का नहीं, बल्कि उस पारदर्शिता का सवाल है जो किसी भी आपदा प्रबंधन की बुनियाद होती है। चीन का यह रवैया अंतरराष्ट्रीय आपदा सहयोग तंत्र को कमज़ोर करता है और यह पूछने पर मजबूर करता है कि क्या 'राष्ट्रीय संप्रभुता' की आड़ में मानवीय जवाबदेही की बलि दी जा रही है।
RashtraPress
3 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तिब्बत बाढ़ में चीनी सेंसरशिप का मुद्दा क्या है?
RSF के अनुसार, चीन ने तिब्बत में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद किसी भी स्वतंत्र या अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान को प्रभावित क्षेत्रों में जाकर रिपोर्टिंग करने की अनुमति नहीं दी। केवल सरकारी मीडिया को कवरेज का अधिकार दिया गया, जिसमें राहत कार्यों की उपलब्धियाँ प्रमुखता से दिखाई गईं।
तिब्बत बाढ़ में कितने लोगों की मौत हुई?
चीन का आधिकारिक मृतक आँकड़ा 16 है, जबकि तिब्बत रेडियो द्वारा जुटाई गई जानकारी के अनुसार कम से कम 29 तिब्बतियों की मौत हुई है। स्वतंत्र पहुँच न होने के कारण वास्तविक संख्या की पुष्टि संभव नहीं है।
RSF ने चीन की सेंसरशिप पर क्या कहा?
RSF एशिया-प्रशांत की एडवोकेसी प्रमुख अलेक्जेंड्रा बिएलाकोव्स्का ने कहा कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में तिब्बत 'वास्तविक अर्थों में सूचना का ब्लैक होल' बन गया है। उन्होंने कहा कि वहाँ केवल चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रचार विभाग के दिशा-निर्देशों पर चलने वाले संस्थान ही काम कर सकते हैं।
क्या चीन ने सोशल मीडिया पर भी सेंसरशिप लगाई?
RSF के अनुसार, वीचैट सहित चीन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बाढ़ से संबंधित कई पोस्ट और संदर्भ कथित तौर पर हटाए गए या सेंसर किए गए। इसके अलावा अधिकारियों ने 'अफवाह फैलाने' के आरोप में 10 इंटरनेट यूज़र्स के विरुद्ध कार्रवाई की।
तिब्बत की यह बाढ़ नेपाल से कैसे जुड़ी है?
26 अगस्त को तिब्बती क्षेत्र से उद्गमित बाढ़ का पानी भोटेकोशी नदी के रास्ते नेपाल के रसुवा क्षेत्र में पहुँचा और वहाँ 1,000 से अधिक लोगों की मौत हुई। तिब्बत में सूचना की अनुपलब्धता के कारण इस सीमापार आपदा के मूल कारणों की स्वतंत्र जाँच भी संभव नहीं हो पाई।
राष्ट्र प्रेस
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