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भगवती चरण वर्मा: 'चित्रलेखा' के रचयिता जिन्होंने यूसुफ खान को दिया दिलीप कुमार नाम

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भगवती चरण वर्मा: 'चित्रलेखा' के रचयिता जिन्होंने यूसुफ खान को दिया दिलीप कुमार नाम

सारांश

साहित्य, सिनेमा और राजनीति — तीनों की गलियों से गुज़रे भगवती चरण वर्मा की कहानी सिर्फ 'चित्रलेखा' तक सीमित नहीं है। वे वही शख्सियत हैं जिन्होंने यूसुफ खान को दिलीप कुमार नाम दिया और 'ज्वार भाटा' की पटकथा लिखी — हिंदी साहित्य का एक ऐसा नाम जो हर दौर में प्रासंगिक रहा।

मुख्य बातें

भगवती चरण वर्मा का जन्म 30 अगस्त 1903 को उन्नाव जिले के शफीपुर गांव में हुआ था।
उनकी पहली कविता हाईस्कूल के दौरान 'दैनिक प्रताप' में प्रकाशित हुई; कुल छह काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए।
कहा जाता है कि उन्होंने यूसुफ खान को दिलीप कुमार नाम दिया और फिल्म 'ज्वार भाटा' की पटकथा लिखी।
1943 में बॉम्बे टॉकीज से जुड़े और 1948 तक चार फिल्मों की पटकथा व संवाद लिखे; एक फिल्म का निर्माण भी किया।
'चित्रलेखा' , 'पतन' , 'चाणक्य' , 'भूले बिसरे चित्र' उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ हैं।
फिल्मी दुनिया छोड़ने के बाद वे राज्यसभा के मानद सदस्य रहे।

भगवती चरण वर्मा — हिंदी साहित्य का वह नाम जो उपन्यास, कविता, फिल्म पटकथा और राजनीति की गलियों से एक साथ गुज़रा। 30 अगस्त 1903 को उन्नाव जिले के शफीपुर गांव में जन्मे भगवती बाबू की जीवन-यात्रा इतनी बहुआयामी थी कि वे खुद इसे 'धारावाहिक जिंदगी' कहते थे। साहित्यकारों के बीच 'भगवती बाबू' और परिजनों के लिए 'बाबूजी' के नाम से मशहूर इस शख्सियत ने हिंदी साहित्य और भारतीय सिनेमा दोनों पर अमिट छाप छोड़ी।

साहित्य की नींव और कविता की शुरुआत

भगवती बाबू की पहली कविता 'दैनिक प्रताप' में तब प्रकाशित हुई थी जब वे हाईस्कूल के छात्र मात्र थे। आगे चलकर उनके छह काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए। हालांकि उन्हें व्यापक पहचान उपन्यासकार और कथाकार के रूप में मिली, कविता उनके सृजन की पहली सीढ़ी थी।

उनकी कालजयी कृति 'चित्रलेखा' के अलावा 'पतन' और 'चाणक्य' ने उन्हें हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान दिलाया। एक इंटरव्यू में उन्होंने स्वयं कहा था, 'चित्रलेखा' में रोमांस है और कल्पना है, जबकि 'चाणक्य' में कोई कल्पना नहीं — उसमें ऐसा कठोर और असल सत्य है, जिसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।

बॉम्बे टॉकीज और फिल्मी दुनिया का सफर

1943 में बॉम्बे टॉकीज की प्रमुख देविका रानी ने भगवती बाबू को आमंत्रित किया। एक मित्र के ज़रिए मिले इस निमंत्रण में न केवल नौकरी की गारंटी थी, बल्कि आने-जाने का खर्च भी शामिल था। उसी दौरान कोलकाता में एक घटना के कारण परिस्थितियां बदल गईं और भगवती बाबू कोलकाता लौटने की बजाय मुंबई के ही होकर रह गए — यह उन्होंने स्वयं प्रसार भारती को दिए एक इंटरव्यू में बताया था।

1943 से 1948 तक बॉम्बे टॉकीज में रहते हुए उन्होंने चार फिल्मों की पटकथा और संवाद लिखे। इस दौर में उन्होंने एक फिल्म का निर्माण भी किया। यह दिलचस्प तथ्य है कि जिस व्यक्ति ने फिल्में लिखीं और बनाईं, उसकी खुद फिल्में देखने में कोई रुचि नहीं थी।

यूसुफ खान से दिलीप कुमार: एक ऐतिहासिक नामकरण

कहा जाता है कि भगवती चरण वर्मा वही शख्सियत थे जिन्होंने यूसुफ खान को दिलीप कुमार नाम दिया। उनकी पहली फिल्म 'ज्वार भाटा' की पटकथा उन्होंने ही लिखी थी और उसी फिल्म में नायक की भूमिका में वे कलाकार थे जो आगे चलकर दिलीप कुमार के नाम से हिंदी सिनेमा के महानायक बने। यह नामकरण भारतीय सिनेमा के इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

फिल्मी दुनिया से मोहभंग और राजनीति में कदम

1948 तक आते-आते भगवती बाबू का फिल्मी दुनिया की चकाचौंध से मन उचट चुका था। बॉम्बे टॉकीज छोड़कर वे राजनीति की राह पर चल पड़े — इरादा बड़े नेता और मंत्री बनने का था। हालांकि वे राज्यसभा के मानद सदस्य रहे, लेकिन मंत्री पद की कामना उस वक्त उनके मन में नहीं थी।

जीवन के उत्तरार्ध में उनका दर्शन और गहरा हो गया। उन्होंने कहा था, 'जीवन के प्रति मेरा दृष्टिकोण समर्पण का दृष्टिकोण बन गया है। बहुत प्रयत्न किया, लेकिन जीवन की गतिविधि को और जीवन की सार्थकता को मैं नहीं समझ पाया।'

साहित्यिक विरासत और युगीन दस्तावेज़

भगवती बाबू की कृतियाँ 'भूले बिसरे चित्र', 'सीधी सच्ची बातें' और 'प्रश्न और मरीचिका' उनके लेखन और चिंतन का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन रचनाओं में उन्होंने महात्मा गांधी से पहले के युग से लेकर नेहरू काल और उसके बाद के दौर तक को जीवंत रूप में चित्रित किया। उनकी कहानियाँ पढ़ते हुए पाठक को यह अनुभव होता था मानो वे उनकी अपनी जीवन-गाथा ही पढ़ रहे हों। साहित्य, सिनेमा और राजनीति — तीनों क्षेत्रों में विचरण करने वाले भगवती चरण वर्मा की यह बहुआयामी यात्रा हिंदी साहित्य के इतिहास में एक अनूठा अध्याय है।

संपादकीय दृष्टिकोण

उसे बनाने वाले अनेक नाम इतिहास के हाशिये पर चले गए। जिस व्यक्ति ने दिलीप कुमार जैसी पहचान को आकार दिया, उसकी अपनी पहचान आज केवल साहित्य के विद्यार्थियों तक सिमट गई है। 'चित्रलेखा' जैसी कृति बार-बार पाठ्यक्रमों में लौटती है, लेकिन उसके रचयिता की बहुआयामी भूमिका — पटकथा लेखक, निर्माता, राज्यसभा सदस्य — को वह स्थान नहीं मिला जिसकी वह हकदार है। यह चूक केवल साहित्यिक नहीं, सांस्कृतिक स्मृति की भी है।
RashtraPress
29 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवती चरण वर्मा कौन थे?
भगवती चरण वर्मा हिंदी के प्रख्यात उपन्यासकार, कथाकार, कवि और फिल्म पटकथा लेखक थे। उनका जन्म 30 अगस्त 1903 को उन्नाव जिले के शफीपुर गांव में हुआ था और वे 'चित्रलेखा' जैसी कालजयी कृति के रचयिता के रूप में हिंदी साहित्य में अमर हैं।
भगवती चरण वर्मा ने यूसुफ खान को दिलीप कुमार नाम कैसे दिया?
कहा जाता है कि भगवती चरण वर्मा ने बॉम्बे टॉकीज के दौर में यूसुफ खान को दिलीप कुमार नाम दिया। उनकी पहली फिल्म 'ज्वार भाटा' की पटकथा वर्मा ने लिखी थी और उसी फिल्म में यूसुफ खान ने दिलीप कुमार के नाम से नायक की भूमिका निभाई थी।
भगवती चरण वर्मा का बॉम्बे टॉकीज से क्या संबंध था?
1943 में बॉम्बे टॉकीज की प्रमुख देविका रानी के निमंत्रण पर भगवती बाबू मुंबई आए और 1948 तक वहाँ रहे। इस दौरान उन्होंने चार फिल्मों की पटकथा और संवाद लिखे तथा एक फिल्म का निर्माण भी किया।
भगवती चरण वर्मा की प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ कौन-सी हैं?
उनकी प्रमुख कृतियों में 'चित्रलेखा', 'पतन', 'चाणक्य', 'भूले बिसरे चित्र', 'सीधी सच्ची बातें' और 'प्रश्न और मरीचिका' शामिल हैं। इन रचनाओं में उन्होंने गांधी-पूर्व युग से नेहरू काल तक के भारत को चित्रित किया।
भगवती चरण वर्मा ने राजनीति में कब कदम रखा?
1948 में फिल्मी दुनिया से मोहभंग के बाद भगवती बाबू ने राजनीति की राह अपनाई। वे राज्यसभा के मानद सदस्य रहे, हालांकि उनका मूल उद्देश्य बड़े नेता और मंत्री बनना था।
राष्ट्र प्रेस
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