8 अक्टूबर 2026
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ज्ञानेश कुमार को अब जाना चाहिए, चुनाव आयोग की विश्वसनीयता खतरे में: प्रशांत किशोर

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ज्ञानेश कुमार को अब जाना चाहिए, चुनाव आयोग की विश्वसनीयता खतरे में: प्रशांत किशोर

सारांश

प्रशांत किशोर ने दरभंगा में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा माँगा और कहा कि 7-8 साल से आयोग सत्तारूढ़ दल के पक्ष में खड़ा दिखता है। साथ ही बिहार के छह लाख शिक्षकों को एकजुट होने का आह्वान किया और बांकीपुर उपचुनाव के बाद नौकरी के दावों पर सफाई दी।

मुख्य बातें

प्रशांत किशोर ने 8 अक्टूबर 2026 को दरभंगा में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग की।
किशोर के अनुसार पिछले 7-8 वर्षों से वोटर रोल, चुनाव समय सारणी, आचार संहिता और मतगणना — हर स्तर पर आयोग सत्तारूढ़ दल के पक्ष में दिखता है।
उन्होंने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार की सेवानिवृत्ति के बाद एचडीएफसी बैंक की चेयरमैनी का भी ज़िक्र किया।
बिहार के 6 लाख शिक्षकों से एकजुट होकर सातवें वेतन आयोग की माँग को लोकसभा चुनाव का मुद्दा बनाने का आह्वान किया।
बांकीपुर उपचुनाव के बाद 10,000 नौकरियों के बयान पर सफाई दी — कहा कि निजी क्षेत्र में रोज़गार दिलाने की कोशिश जारी है।

जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने 8 अक्टूबर 2026 को दरभंगा, बिहार में मीडिया से बातचीत के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि उन्हें पद छोड़ना चाहिए, क्योंकि भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) की विश्वसनीयता गंभीर संकट में है। किशोर के अनुसार, यह संकट किसी एक व्यक्ति या एक घटना की वजह से नहीं, बल्कि पिछले 7-8 वर्षों की लगातार खामियों का परिणाम है।

चुनाव आयोग पर किशोर के आरोप

प्रशांत किशोर ने कहा कि ज्ञानेश कुमार से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त रहे राजीव कुमार ने भी इसी ढर्रे पर आयोग चलाया। किशोर के अनुसार, राजीव कुमार के सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें एचडीएफसी बैंक का चेयरमैन बना दिया गया — एक ऐसी नियुक्ति जो सवाल उठाती है।

किशोर ने आरोप लगाया कि वोटर रोल बनाने की प्रक्रिया से लेकर चुनाव की समय सारणी, आचार संहिता के लागू न होने, बिहार में कथित तौर पर ₹10,000 देकर वोट खरीदने और मतगणना में धांधली तक — हर स्तर पर आयोग खुलेआम सत्तारूढ़ दल के पक्ष में दिखता है।

सुधार की माँग

किशोर ने स्पष्ट किया कि सिर्फ ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा काफी नहीं होगा — आयोग में संरचनात्मक सुधार ज़रूरी हैं। उनकी माँग है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जाए और वोटर लिस्ट बनाने की विधि में मूलभूत बदलाव हो ताकि जनता का चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा बहाल हो सके। उन्होंने कहा कि देश में जो आंदोलन हो रहा है वह इसी अविश्वास की उपज है।

शिक्षकों के सातवें वेतन आयोग पर रुख

शिक्षकों के लिए सातवें वेतन आयोग के मुद्दे पर किशोर ने कहा कि यह बात मायने नहीं रखती कि इस माँग को किसने उठाया — ज़रूरी यह है कि यह एक केंद्रीय मुद्दा बने और इस पर वोट माँगे जाएँ। उन्होंने तर्क दिया कि कोई भी विधायक या विधान परिषद सदस्य अकेले यह लागू नहीं करवा सकता, लेकिन अगर बिहार के छह लाख शिक्षक एकजुट हो जाएँ तो राज्य की सभी राजनीतिक पार्टियाँ समाधान निकालने पर मजबूर होंगी।

किशोर ने जोड़ा कि लोकसभा चुनाव से पहले यह समाधान इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि दिल्ली की सत्ता पाने के इच्छुक किसी भी दल को बिहार जीतना होगा — और छह लाख शिक्षकों के समर्थन के बिना यह संभव नहीं।

नौकरी के वादे पर सफाई

बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के संदर्भ में किशोर ने कहा कि उन्होंने 10,000 नौकरियों का कोई पूर्व वादा नहीं किया था। जीत के बाद जनता के भरोसे को देखते हुए उन्होंने अपने देशव्यापी संपर्कों से बातचीत की और तय हुआ कि सरकारी नौकरी दिलाना उनके वश में नहीं, लेकिन निजी क्षेत्र में रोज़गार दिलाया जा सकता है। उन्होंने दावा किया कि लोग उनके कार्यालय में सीवी जमा कर रहे हैं और नौकरियाँ दिलाई भी जा रही हैं।

क्या होगा आगे

यह ऐसे समय में आया है जब बिहार में राजनीतिक सरगर्मियाँ तेज़ हैं और लोकसभा चुनाव की छाया में विभिन्न दल अपनी स्थिति मज़बूत करने में जुटे हैं। किशोर की यह बयानबाज़ी चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर राष्ट्रीय बहस को नई धार दे सकती है, और जन सुराज पार्टी के राजनीतिक एजेंडे को भी एक स्पष्ट दिशा देती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसके पीछे एक गहरा संस्थागत सवाल छिपा है — क्या चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया स्वयं उसकी स्वायत्तता को कमज़ोर कर रही है? सर्वोच्च न्यायालय भी 2023 में नियुक्ति सुधार पर निर्देश दे चुका है, फिर भी ठोस बदलाव की गति धीमी रही है। किशोर के राजीव कुमार-एचडीएफसी प्रसंग का उल्लेख इस बहस को 'पोस्ट-रिटायरमेंट बेनिफिट' की परंपरा से जोड़ता है जो भारत के कई नियामक संस्थाओं को लेकर उठती है। असली परीक्षा यह है कि क्या विपक्ष इस मुद्दे को ठोस विधायी प्रस्ताव में बदल सकता है — या यह सुर्खियों तक सीमित रहेगा।
RashtraPress
8 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रशांत किशोर ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग क्यों की?
प्रशांत किशोर का कहना है कि पिछले 7-8 वर्षों में चुनाव आयोग हर स्तर पर सत्तारूढ़ दल के पक्ष में खड़ा दिखता है — वोटर रोल से लेकर मतगणना तक। उनके अनुसार आयोग की विश्वसनीयता इतनी गिर गई है कि जनता को लग रहा है कि चुनाव निष्पक्ष नहीं हो रहे।
चुनाव आयोग में किस तरह के सुधार की माँग है?
किशोर ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और वोटर लिस्ट बनाने की विधि में मूलभूत बदलाव की माँग की है। उनका कहना है कि केवल मुख्य चुनाव आयुक्त का बदलाव पर्याप्त नहीं, संरचनात्मक सुधार ज़रूरी है।
बिहार के शिक्षकों के सातवें वेतन आयोग पर किशोर का क्या कहना है?
किशोर ने कहा कि बिहार के छह लाख शिक्षकों को एकजुट होना होगा, तभी राजनीतिक दल इस माँग को मानने पर मजबूर होंगे। उन्होंने इसे लोकसभा चुनाव से पहले का एक निर्णायक मुद्दा बताया।
10,000 नौकरियों वाले बयान पर प्रशांत किशोर ने क्या सफाई दी?
किशोर ने स्पष्ट किया कि बांकीपुर उपचुनाव लड़ते समय उन्होंने नौकरी देने का कोई वादा नहीं किया था। जीत के बाद उन्होंने अपने संपर्कों के ज़रिए निजी क्षेत्र में रोज़गार दिलाने की पहल शुरू की और दावा किया कि लोग उनके कार्यालय में सीवी जमा कर रहे हैं।
राजीव कुमार और एचडीएफसी बैंक का ज़िक्र किशोर ने क्यों किया?
किशोर ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार का उदाहरण देते हुए कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें एचडीएफसी बैंक का चेयरमैन बनाया गया। इसे उन्होंने उस संस्थागत प्रवृत्ति के उदाहरण के रूप में रखा जो आयोग की स्वायत्तता पर सवाल उठाती है।
राष्ट्र प्रेस
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