मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तुरंत इस्तीफा दें — कांग्रेस का आरोप, संविधान-प्रदत्त अधिकार किए नष्ट
सारांश
मुख्य बातें
चुनाव आयोग के भीतर विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) समेत कई मुद्दों पर आंतरिक मतभेद की रिपोर्टें सामने आने के बाद, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष ने 26 सितंबर 2026 को एकजुट मोर्चा खोल दिया। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने उनके तत्काल इस्तीफे की मांग की, आरोप लगाते हुए कि उन्होंने संविधान-प्रदत्त मतदाताओं के अधिकारों को 'चकनाचूर' कर दिया। इस बीच, पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने विपरीत दिशा में जाते हुए ज्ञानेश कुमार को पद्म भूषण से नवाजने की माँग कर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी।
कांग्रेस के आरोप और इस्तीफे की माँग
कांग्रेस सांसद कर्मवीर सिंह बौद्ध ने बातचीत में सवाल उठाया, 'क्या ज्ञानेश कुमार भाजपा के एजेंट हैं? एक संवैधानिक संस्था के पद पर बैठने के बाद भाजपा क्यों उनका समर्थन कर रही है?' उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा ने देश की संवैधानिक संस्थाओं को खत्म कर दिया है और ज्ञानेश कुमार ने 'लोकतंत्र को खतरे में डाला है तथा संविधान में दिए गए अधिकारों को बिल्कुल चकनाचूर कर दिया।' उनकी माँग थी कि ज्ञानेश कुमार को तुरंत इस्तीफा देना चाहिए।
कांग्रेस नेता मुकुल वासनिक ने भी इस सुर में सुर मिलाते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को इस्तीफा देना चाहिए और चेतावनी दी, 'जो गलत काम उन्होंने चुनाव आयोग के जरिए किए हैं, उसकी वजह से उन्हें बख्शा नहीं जाएगा — समय आएगा और उन पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी।'
एनडीए के भीतर से भी उठी स्पष्टीकरण की माँग
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा कि चुनाव आयोग अपनी बातों को मजबूती से रखे, जिसे कांग्रेस ने आंशिक रूप से स्वीकार किया। आंध्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष गुरुनाधम ने कहा, 'कांग्रेस पार्टी चिराग पासवान के बयान के 50 फीसदी हिस्से को स्वीकार और बाकी को खारिज करना चाहेगी।' उन्होंने माँग की कि चुनाव आयोग मतदाता सूची से कथित तौर पर 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने के मामले में जनता को जवाब दे, खासकर जब दो चुनाव आयुक्तों ने कथित रूप से असहमति पत्र सौंपा हो।
उपेंद्र कुशवाहा ने भी चिराग पासवान के साथ आयोग से स्पष्टीकरण की माँग की। इस पर कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने कहा, 'लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए उनके इस बयान का स्वागत किया जाना चाहिए,' साथ ही उनसे एनडीए से अलग होकर 'वोट चोरी के खिलाफ इस महासंग्राम' में शामिल होने का आग्रह किया।
विवाद की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि एसआईआर प्रक्रिया और मतदाता सूची संशोधन को लेकर चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्टें कुछ समय से सामने आ रही हैं। आलोचकों का कहना है कि मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है। यह ऐसे समय में आया है जब देश में कई राज्यों में चुनावी तैयारियाँ चल रही हैं और विपक्षी दल चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर पहले से ही सवाल उठाते रहे हैं।
आगे क्या
कांग्रेस और विपक्षी दलों के बढ़ते दबाव के बीच यह देखना अहम होगा कि चुनाव आयोग मतदाता सूची विवाद पर औपचारिक स्पष्टीकरण देता है या नहीं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता का यह सवाल आने वाले चुनावी राजनीति में एक केंद्रीय मुद्दा बन सकता है।