बेंगलुरु में 5 पुलिस कमिश्नरेट प्रस्ताव पर कांग्रेस-भाजपा भिड़े, खड़गे बोले — शहर की ज़रूरत
सारांश
मुख्य बातें
बेंगलुरु में पाँच पुलिस कमिश्नरेट गठित करने के प्रस्ताव को लेकर 6 अक्टूबर 2026 को कर्नाटक की कांग्रेस सरकार और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच तीखी बहस छिड़ गई। गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने इस पुनर्गठन योजना का समर्थन किया, जबकि विपक्ष के नेता आर. अशोक ने इसे अव्यावहारिक और वित्तीय रूप से संदिग्ध बताते हुए खारिज किया।
प्रस्ताव में क्या है
सरकारी प्रस्ताव के अनुसार बेंगलुरु को पाँच कमिश्नरेट — सेंट्रल, नॉर्थ, साउथ, ईस्ट और वेस्ट — में विभाजित किया जाएगा। इन सभी की देखरेख एक चीफ कमिश्नर ऑफ पुलिस करेंगे, जो मौजूदा पुलिस कमिश्नर पद का नया नामकरण होगा। इस पुनर्गठन के तहत अतिरिक्त पुलिस पोस्ट भी सृजित किए जाएंगे।
यह प्रस्ताव कैबिनेट के समक्ष रखे जाने से पहले सभी संबंधित पक्षों से परामर्श के बाद अंतिम रूप दिया जाएगा। गृह मंत्री के अनुसार इस विषय पर प्रारंभिक विमर्श पहले ही हो चुका है।
सरकार की दलील
प्रियांक खड़गे ने तर्क दिया कि बेंगलुरु पुलिस का अधिकार क्षेत्र पहले से ही ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी की सीमाओं से परे फैला हुआ है। उन्होंने कहा कि बेंगलुरु एशिया के सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले शहरों में शुमार है, जहाँ विकास दर लगभग 8.5 प्रतिशत है और 2035 तक यह गति बनी रहने का अनुमान है।
खड़गे के अनुसार शहर के इस विस्तार के अनुरूप पुलिसिंग व्यवस्था की समीक्षा अपरिहार्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय से पहले और चर्चाएं की जाएंगी तथा सभी हितधारकों की राय को ध्यान में रखा जाएगा।
भाजपा की आपत्तियाँ
विपक्ष के नेता आर. अशोक ने इस प्रस्ताव की कड़ी आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि यह विभाजन प्रशासनिक दक्षता के लिए नहीं, बल्कि वित्तीय कारणों से किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि कई पुलिस अधिकारियों ने निजी तौर पर इस प्रस्ताव को लेकर चिंता जताई है।
अशोक ने यह भी आरोप लगाया कि वित्तीय तंगी पहले से ही मौजूदा नागरिक निकायों को प्रभावित कर रही है और पाँच कमिश्नरेट बनाने से शहर की पुलिसिंग में कोई सुधार नहीं होगा। उन्होंने सरकार को पत्र लिखकर विधान सौधा और कुमारकृपा गेस्ट हाउस में मंत्रियों व अधिकारियों के कमरों के नवीनीकरण कार्यों का विवरण माँगा है और चेतावनी दी है कि जानकारी न मिलने पर वे विरोध प्रदर्शन करेंगे।
व्यापक संदर्भ
गौरतलब है कि बेंगलुरु देश के उन चुनिंदा महानगरों में है जहाँ जनसंख्या और शहरी विस्तार की रफ़्तार के मुकाबले पुलिस-नागरिक अनुपात लगातार दबाव में रहा है। यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब कर्नाटक सरकार पर विभिन्न नागरिक सेवाओं के विकेंद्रीकरण का राजनीतिक दबाव है। आलोचकों का कहना है कि बिना पर्याप्त बजट आवंटन के इस पुनर्गठन का क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण होगा।
आगे का रास्ता
सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रस्ताव अभी कैबिनेट के सामने नहीं गया है और हितधारकों से परामर्श जारी है। भाजपा इस मुद्दे को विधानमंडल के भीतर और बाहर उठाने का इरादा रखती है। इस पुनर्गठन योजना का भविष्य अब कैबिनेट की मंज़ूरी और राजनीतिक सहमति पर निर्भर करेगा।