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मां संतला देवी मंदिर देहरादून: पत्थर बने भाई-बहन की पौराणिक कथा और आस्था का अनूठा केंद्र

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मां संतला देवी मंदिर देहरादून: पत्थर बने भाई-बहन की पौराणिक कथा और आस्था का अनूठा केंद्र

सारांश

देहरादून की पहाड़ियों पर बसा मां संतला देवी मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं — यह भाई-बहन के अदम्य साहस और आत्मसमर्पण की वह कथा है, जो मुगल आक्रमण के बीच दिव्य प्रकाश बनकर प्रकट हुई। मुख्यमंत्री धामी के प्रचार के बाद यह स्थल अब राज्य के धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर और उभर रहा है।

मुख्य बातें

मां संतला देवी मंदिर , देहरादून से 12-15 किमी दूर पंजाबीवाला के पास एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार मुगल शासक औरंगजेब की सेना के आक्रमण के दौरान मां संतला देवी और उनके भाई पत्थर की मूर्तियों में परिवर्तित हो गए थे।
यह घटना कथित तौर पर शनिवार को घटी थी, इसलिए मंदिर में शनिवार और नवरात्रों पर विशेष भीड़ उमड़ती है।
पंजाबीवाला से मंदिर तक 2 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है, जहाँ से दून घाटी और शिवालिक पहाड़ियों का मनोरम दृश्य दिखता है।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक्स पर मंदिर का वीडियो साझा कर इसे प्रमुख धार्मिक-आध्यात्मिक स्थल बताया।

देहरादून से मात्र 12 से 15 किलोमीटर की दूरी पर जेंतनवाला/पंजाबीवाला के निकट एक ऊँची पहाड़ी पर विराजमान मां संतला देवी मंदिर उत्तराखंड की देवभूमि की उस अखंड आस्था का प्रतीक है, जो पौराणिक कथाओं, चमत्कारी मान्यताओं और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इसी स्थान पर मां संतला देवी और उनके भाई दिव्य प्रकाश में पत्थर की मूर्तियों के रूप में परिवर्तित हो गए थे, जो आज भी भक्तों की असीम श्रद्धा का केंद्र हैं।

मंदिर की भौगोलिक स्थिति और पहुँच

देहरादून शहर से करीब 12 से 15 किमी की दूरी पर स्थित यह मंदिर पंजाबीवाला गाँव के पास एक सुरम्य पहाड़ी की चोटी पर बना है। पंजाबीवाला से मंदिर तक पहुँचने के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 2 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है।

इस चढ़ाई के दौरान दून घाटी और शिवालिक पहाड़ियों का विहंगम दृश्य दर्शनार्थियों को एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभव देता है। यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रकृति प्रेमियों के लिए भी विशेष आकर्षण रखता है।

पौराणिक कथा: भाई-बहन और दिव्य परिवर्तन

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में इस स्थान पर मां संतला देवी और उनके भाई का किला था। कहा जाता है कि मुगल शासक औरंगजेब की सेना के आक्रमण और शादी के प्रस्ताव को लेकर उत्पन्न संघर्ष के दौरान जब दोनों भाई-बहन को लगा कि वे विशाल सेना का सामना नहीं कर सकते, तो उन्होंने अपने शस्त्र त्याग दिए और ईश्वर से प्रार्थना की।

मान्यता है कि उसी क्षण एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ और मां संतला देवी तथा उनके भाई पत्थर की मूर्तियों में परिवर्तित हो गए। यह कथा भाई-बहन के अटूट बंधन, वीरता और अदम्य आस्था की जीवंत गाथा है, जो आज भी इस पहाड़ी पर गूँजती प्रतीत होती है।

शनिवार का विशेष महत्व

लोक मान्यताओं के अनुसार यह अलौकिक घटना शनिवार के दिन घटित हुई थी, इसलिए इस मंदिर में शनिवार का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इस दिन दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या अन्य दिनों की तुलना में काफी अधिक होती है।

इसके अलावा नवरात्रों के दौरान यहाँ भक्तों का विशाल जनसैलाब उमड़ता है। मान्यता है कि सच्चे मन से संतान प्राप्ति और मनोकामना पूर्ति के लिए आने वाले भक्तों की हर अभिलाषा यहाँ पूर्ण होती है।

मुख्यमंत्री धामी ने किया मंदिर का प्रचार

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का एक विशेष वीडियो साझा कर इसके धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित किया।

अपनी पोस्ट में धामी ने लिखा, 'देहरादून के प्रमुख धार्मिक और आध्यात्मिक स्थलों में मां संतला देवी मंदिर का एक विशेष स्थान है। प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा यह पवित्र स्थान भक्तों की अटूट आस्था, भक्ति और विश्वास का प्रतीक है। यहाँ मां के दर्शन मात्र से ही भक्तों को आध्यात्मिक शांति और दिव्य अनुभव की प्राप्ति होती है। देहरादून आने पर आपको भी इस पवित्र मंदिर के दर्शन अवश्य करने चाहिए।'

आम जनता और पर्यटन पर असर

मुख्यमंत्री की इस पहल से मंदिर की ख्याति राज्य की सीमाओं से परे भी पहुँचने लगी है। उत्तराखंड सरकार की धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की नीति के अंतर्गत इस मंदिर को भी प्रमुखता से प्रचारित किया जा रहा है।

गौरतलब है कि उत्तराखंड में धार्मिक पर्यटन राज्य की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और मां संतला देवी मंदिर जैसे स्थल स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका का माध्यम भी बनते जा रहे हैं। आस्था, इतिहास और प्रकृति के इस त्रिवेणी संगम पर श्रद्धालुओं और पर्यटकों की रुचि आने वाले समय में और बढ़ने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इन स्थलों की दीर्घकालिक विरासत टिकाऊ पर्यटन नीति पर टिकी है।
RashtraPress
24 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मां संतला देवी मंदिर कहाँ स्थित है?
मां संतला देवी मंदिर उत्तराखंड के देहरादून से लगभग 12 से 15 किलोमीटर दूर जेंतनवाला/पंजाबीवाला के पास एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। पंजाबीवाला से मंदिर तक पहुँचने के लिए करीब 2 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई करनी होती है।
मां संतला देवी मंदिर की पौराणिक कथा क्या है?
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में मुगल शासक औरंगजेब की सेना के आक्रमण के दौरान मां संतला देवी और उनके भाई ने हथियार त्यागकर ईश्वर की प्रार्थना की, जिसके बाद एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ और दोनों पत्थर की मूर्तियों में परिवर्तित हो गए। यह कथा भाई-बहन के अटूट प्रेम और वीरता का प्रतीक मानी जाती है।
इस मंदिर में शनिवार का विशेष महत्व क्यों है?
स्थानीय मान्यता के अनुसार मां संतला देवी और उनके भाई का पत्थर में परिवर्तित होने का चमत्कार शनिवार के दिन हुआ था। इसी कारण यहाँ शनिवार को विशेष पूजा-अर्चना होती है और भक्तों की संख्या भी इस दिन अधिक रहती है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंदिर के बारे में क्या कहा?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक्स पर मंदिर का वीडियो साझा करते हुए इसे देहरादून के प्रमुख धार्मिक और आध्यात्मिक स्थलों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि यहाँ मां के दर्शन मात्र से भक्तों को आध्यात्मिक शांति और दिव्य अनुभव की प्राप्ति होती है।
मंदिर में दर्शन का सबसे उपयुक्त समय कौन-सा है?
नवरात्रों के दौरान इस मंदिर में भक्तों का विशाल जनसैलाब उमड़ता है, इसलिए नवरात्र इस मंदिर के दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है। इसके अलावा प्रत्येक शनिवार भी मंदिर में विशेष धार्मिक गतिविधियाँ होती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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