दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 6 सीबीआई अधिकारियों पर झूठा बयान देने के लिए आपराधिक कार्रवाई का आदेश
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 8 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के छह अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया है। इन अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने एक भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) अधिकारी से जुड़े मामले में अदालत के सामने जानबूझकर झूठा बयान दिया था। न्यायमूर्ति मधु जैन की एकल पीठ ने यह ऐतिहासिक निर्देश आईआरएस अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल की आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए पारित किया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आय से अधिक संपत्ति के एक मुकदमे से जुड़ा है, जिसमें सीबीआई ने अशोक कुमार अग्रवाल के खिलाफ अभियोजन चलाया था। यह अभियोजन 26 नवंबर 2002 को पारित एक स्वीकृति आदेश पर आधारित था। जनवरी 2016 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने उस मंजूरी को अमान्य घोषित कर दिया, जिसके बाद विशेष न्यायाधीश ने मार्च 2016 में अग्रवाल को बरी कर दिया।
झूठे बयान का पूरा घटनाक्रम
बरी होने के बाद सीबीआई ने सर्वोच्च न्यायालय में फैसले को चुनौती देने पर विचार किया। 8 जून 2016 को विधि एवं न्याय मंत्रालय ने अपनी कानूनी राय में स्पष्ट किया कि इस मामले को उच्च मंच पर ले जाने का कोई उचित आधार नहीं है। यह राय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के माध्यम से 1 जुलाई 2016 को सीबीआई को सूचित की गई थी।
इसके बाद जब अग्रवाल ने जांच के दौरान जब्त दस्तावेजों की वापसी की मांग की, तो सीबीआई ने 2 अगस्त 2016 को दायर अपने जवाब में कहा कि 'इस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई के संबंध में प्रशासनिक मंत्रालय के साथ पत्राचार चल रहा है।' उच्च न्यायालय के अनुसार, यह बयान तथ्यात्मक रूप से असत्य था, क्योंकि उस समय ऐसा कोई वास्तविक पत्राचार नहीं चल रहा था।
अदालत की कड़ी टिप्पणी
उच्च न्यायालय ने पाया कि सीबीआई ने 8 अगस्त 2016 को डीओपीटी को मामले पर पुनर्विचार और नई कानूनी राय मांगने का प्रस्ताव भेजा था — यानी झूठा बयान देने के उसी दिन। 9 अगस्त 2016 को दायर अतिरिक्त जवाब में सीबीआई ने कहा कि उसने 'सैद्धांतिक रूप से' जनवरी 2016 के फैसले को चुनौती देने का निर्णय किया था और यह प्रस्ताव 8 अगस्त को विभाग को भेज दिया गया था। अदालत ने इस स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना।
किन अधिकारियों पर होगी कार्रवाई
दिल्ली उच्च न्यायालय ने विशेष न्यायाधीश को निर्देश दिया कि वे सुशील दीवान, विनीत विनायक, अमित कुमार, रमन त्यागी, प्रेम कुमार गौतम और मोहम्मद आजाद के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 191, धारा 193 और धारा 209 के तहत लिखित शिकायत दर्ज करें। यह शिकायत निर्णय प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट को भेजने का निर्देश दिया गया है।
आगे क्या होगा
राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष न्यायाधीश को अब उच्च न्यायालय के निर्देश के अनुरूप लिखित शिकायत तैयार कर निर्धारित समयसीमा में मजिस्ट्रेट के पास भेजनी होगी। गौरतलब है कि यह मामला इस बात की मिसाल बन सकता है कि जांच एजेंसियों के अधिकारी भी अदालत में असत्य कथन देने पर आपराधिक जवाबदेही से नहीं बच सकते। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।