देवी प्रसाद राय चौधरी: अस्वीकृति से पद्म भूषण तक, भारतीय कला के अनसुने शिल्पी की गाथा
सारांश
मुख्य बातें
देवी प्रसाद राय चौधरी — पद्म भूषण से सम्मानित चित्रकार और मूर्तिकार — का जीवन इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा को संस्थागत अस्वीकृति दबा नहीं सकती। 15 जून 1899 को तत्कालीन बंगाल के ताजहाट (वर्तमान बांग्लादेश) में जन्मे राय चौधरी ने भारतीय कला के आकाश में वह स्थान अर्जित किया जो उन्हें शुरुआती दौर में नकार दिया गया था। उनकी यात्रा — एक युवा कलाकार की ठुकराई हुई कृतियों से लेकर ललित कला अकादमी के संस्थापक अध्यक्ष बनने तक — भारतीय कला इतिहास के सबसे मार्मिक अध्यायों में से एक है।
अस्वीकृति का वह क्षण
जिस दौर में बंगाल स्कूल भारतीय कला आंदोलन के केंद्र में था, उसी समय उस पर यह आरोप भी लगाया जाता था कि वह अपने दायरे से बाहर के कलाकारों के प्रति उदार नहीं था। कहा जाता है कि जब युवा राय चौधरी ने अपनी कृतियाँ महान चित्रकार अबनिंद्रनाथ टैगोर के समक्ष प्रस्तुत कीं, तो उन्हें यह कहकर खारिज कर दिया गया कि इन कार्यों का कोई मूल्य नहीं और उन्हें पारंपरिक बंगाली चित्रों की नकल से कला सीखनी चाहिए। यह टिप्पणी किसी भी संवेदनशील कलाकार को तोड़ सकती थी — लेकिन राय चौधरी रुके नहीं।
विडंबना यह रही कि जिस बंगाल स्कूल ने उन्हें आरंभ में नकारा, बाद के वर्षों में उन्हें उसी परंपरा का अंग माना जाने लगा। गौरतलब है कि उन्होंने चित्रकला की शिक्षा अबनिंद्रनाथ टैगोर से, जीवन-चित्रण और पोर्ट्रेट कला की बारीकियाँ ई. बॉयस (सिग्नोर बोरेस) से और मूर्तिकला का प्रशिक्षण हिरण्मय राय चौधरी से प्राप्त किया। बाद में उन्होंने इटली में भी उच्च प्रशिक्षण हासिल किया।
बहुआयामी कला-शैली और संघर्ष के वर्ष
रंग और मिट्टी, प्लास्टर और कांस्य — राय चौधरी हर माध्यम में समान दक्षता रखते थे। उनकी चित्रकला में चीनी तकनीक, जापानी वॉश प्रक्रिया और उनकी अपनी स्क्रैचिंग पद्धति का अद्भुत समन्वय दिखता है। कला समीक्षक डॉ. कार्ल खंडालावाला ने उन्हें 'डेकोरेटिव आर्टिस्ट' कहकर सीमित करने का प्रयास किया था, लेकिन उनकी कृतियों की व्यापकता इस वर्गीकरण को चुनौती देती रही।
लंबे समय तक स्थायी रोज़गार न होने के कारण उन्होंने मंच सज्जा, पर्दों और बैकड्रॉप निर्माण का कार्य भी किया। कोलकाता में मास्टर हुसैन बख्श लाहौरी की परंपरा से जुड़ी इस विधा को उन्होंने मुंबई में आगे बढ़ाया, क्योंकि उनका अपना शहर उन्हें अपेक्षित संरक्षण देने को तैयार नहीं था।
मूर्तियों में आम आदमी की धड़कन
चित्रकला से उन्होंने शुरुआत की, लेकिन पहचान उनकी विशाल सार्वजनिक मूर्तियों से मिली। फ्रांसीसी मूर्तिकार ऑगस्ते रोडाँ के कार्यों से प्रेरित राय चौधरी ने मानव शरीर की गति और भावों को मूर्त रूप देने में असाधारण दक्षता हासिल की। वे सड़क पर चलते-फिरते सामान्य लोगों को अपनी कला का विषय बनाना पसंद करते थे — यही कारण है कि उनकी मूर्तियों में आम आदमी की जीवंतता झलकती है।
उनकी प्रमुख सार्वजनिक कृतियों में नई दिल्ली की 'डांडी मार्च', चेन्नई की प्रसिद्ध 'ट्रायम्फ ऑफ लेबर', पटना का 'शहीद स्मारक', तिरुवनंतपुरम में त्रावणकोर के अंतिम शासक चितिरा तिरुनाल बलराम वर्मा की कांस्य प्रतिमा तथा जयपुर महाराजा की जीवन आकार की मूर्ति शामिल हैं। उनके स्त्री चित्रों में एक कोमलता और आत्मीयता का भाव मिलता है, जबकि पुरुष पात्र अकेले, दृढ़ और आक्रामक ऊर्जा से भरे दिखते हैं।
शिक्षक और संस्थान-निर्माता
राय चौधरी केवल कलाकार नहीं, एक समर्पित शिक्षक और संस्थान-निर्माता भी थे। उन्होंने इंडियन सोसाइटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट, कलकत्ता में अध्यापन किया। 1928 में वे मद्रास कॉलेज ऑफ आर्ट से जुड़े और बाद में उसके प्राचार्य बने। 1929 से 1958 तक उन्होंने मद्रास के गवर्नमेंट स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स में प्राचार्य एवं मूर्तिकला विभागाध्यक्ष के रूप में सेवाएँ दीं। उनके नेतृत्व में दक्षिण भारत में कला शिक्षा को नई दिशा मिली।
सम्मान और विरासत
1937 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें मोस्ट एक्सॉल्टेड मेंबर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर (एम.बी.ई.) की उपाधि प्रदान की। 1953 में उन्हें नई दिल्ली स्थित ललित कला अकादमी का संस्थापक अध्यक्ष नामित किया गया। 1958 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। बाद में रवींद्र भारती विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टरेट प्रदान की और वे ललित कला अकादमी के निर्वाचित फेलो भी बने।
15 अक्टूबर 1975 को देवी प्रसाद राय चौधरी इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनकी मूर्तियाँ और चित्र आज भी बोलते हैं — उस कलाकार की भाषा में, जिसे एक बार 'बेकार' कहकर खारिज किया गया था और जिसने अंततः भारतीय कला की नींव को नया आकार दिया।