छऊ नृत्य के संरक्षक गोपाल प्रसाद दुबे: मुखौटा कला को दिया नया आयाम, सरायकेला से हार्वर्ड तक की यात्रा
सारांश
मुख्य बातें
पंडित गोपाल प्रसाद दुबे — छऊ नृत्य के उन विरले साधकों में से एक, जिन्होंने सरायकेला, झारखंड की मिट्टी से उठकर हार्वर्ड और यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन तक इस लुप्तप्राय कला की अलख जगाई। 25 जून 1957 को एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे गोपाल का बचपन छऊ की गूँजती धुनों और मुखौटों की रहस्यमयी दुनिया के बीच बीता, और यही बचपन का आकर्षण आगे चलकर एक ऐसी जीवन-साधना बन गया जिसने इस नृत्य परंपरा के इतिहास को नई दिशा दी।
बचपन और गुरु-दीक्षा
गोपाल के दादा शशिभूषण दुबे शाही सिंह देव राजवंश के दरबार में अभिनेता थे। उन्होंने महज नौ वर्ष की आयु में गोपाल को कला की पहली दीक्षा दी। 14 वर्ष की उम्र में उन्होंने पारंपरिक 'अखाड़ों' में प्रशिक्षण आरंभ किया। गुरु नटशेखर बनबिहारी पटनायक से शारीरिक संतुलन और चपलता सीखी, जबकि गुरु पद्मश्री केदारनाथ साहू से जटिल लयबद्ध हस्त मुद्राओं का गहन ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने प्रसिद्ध अमेरिकी नर्तकी शेरॉन लॉयन से ओडिसी नृत्य की बारीकियाँ भी सीखीं — यह विविधता उनकी कलात्मक दृष्टि की गहराई को दर्शाती है।
छऊ नृत्य और मुखौटा कला की विशेषता
छऊ पूर्वी भारत का एक ऊर्जावान अर्ध-शास्त्रीय नृत्य है, जो कलाबाज़ियों और मार्शल आर्ट के तत्वों के लिए जाना जाता है। मूलतः 'परिकंडा' — ढाल और तलवार की पारंपरिक युद्ध-कला — से उपजे इस नृत्य की सरायकेला शैली अत्यंत कोमल और अमूर्त है। इस शैली की आत्मा उसके मुखौटों में बसती है।
मुखौटा धारण करने के बाद 'दृष्टि भेद' — आँखों के भाव — समाप्त हो जाते हैं। ऐसे में नर्तक को अपनी समस्त भावनाएँ 'ग्रीवा भेद' (गर्दन के संचालन) और शारीरिक भंगिमाओं के माध्यम से दर्शकों तक पहुँचानी होती हैं — एक ऐसी चुनौती जो इस कला को असाधारण बनाती है।
मुखौटा निर्माण की साधना
पंडित गोपाल प्रसाद दुबे इस लुप्तप्राय मुखौटा निर्माण कला के बड़े संरक्षक थे। खरकाई नदी की उपजाऊ काली मिट्टी से सांचे (माटिर मुहा) गढ़ना, गोबर की राख का छिड़काव, मैदा के गोंद से कागज़ की परतें चढ़ाना और अंत में खड़िया मिट्टी के लेप पर सजीव पेस्टल रंग भरना — यह पूरी प्रक्रिया किसी तपस्या से कम नहीं थी।
रंगों का चयन भी प्रतीकात्मक था: भगवान कृष्ण के लिए नीला, राम के लिए हरा और शांत पात्रों के लिए हल्का गुलाबी। यह रंग-विधान बिना एक शब्द बोले ही पात्र के चरित्र को दर्शकों के सामने उजागर कर देता था।
वैश्विक मंच पर भारतीय कला का प्रसार
1986 में एशियन कल्चरल काउंसिल की फेलोशिप पाकर वे न्यू यॉर्क गए, जहाँ उन्होंने आधुनिक पश्चिमी रंगमंच और समकालीन कोरियोग्राफी का गहन अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने पूर्व और पश्चिम की कलात्मक संस्कृतियों के बीच एक ऐतिहासिक संवाद स्थापित किया।
हार्वर्ड, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन और शिकागो जैसे वैश्विक संस्थानों में अध्यापन करते हुए उन्होंने दुनिया को यह सिखाया कि एक मुखौटा किस प्रकार मनुष्य के अहंकार को ढककर उसकी आत्मा को नृत्य के लिए स्वतंत्र कर देता है। गौरतलब है कि उन्होंने सरायकेला, मयूरभंज और पुरुलिया — तीनों छऊ शैलियों के लिए पहला औपचारिक पाठ्यक्रम तैयार करने में भी ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
विरासत और स्मृति
14 नवंबर 2022 को पंडित गोपाल प्रसाद दुबे इस संसार से विदा हो गए। लेकिन उनकी विरासत आज भी त्रिनेत्र छऊ डांस सेंटर के माध्यम से उनके भाई सुनील दुबे और उनके शिष्यों के रूप में जीवित है। छऊ की वह लौ, जो सरायकेला के एक ब्राह्मण परिवार में जली थी, आज वैश्विक मंचों पर प्रकाशमान है — यही उनकी सच्ची साधना का प्रमाण है।