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छऊ नृत्य के संरक्षक गोपाल प्रसाद दुबे: मुखौटा कला को दिया नया आयाम, सरायकेला से हार्वर्ड तक की यात्रा

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छऊ नृत्य के संरक्षक गोपाल प्रसाद दुबे: मुखौटा कला को दिया नया आयाम, सरायकेला से हार्वर्ड तक की यात्रा

सारांश

सरायकेला की काली मिट्टी से गढ़े मुखौटों को हार्वर्ड के मंच तक ले जाने वाले पंडित गोपाल प्रसाद दुबे सिर्फ नर्तक नहीं, एक कला-संरक्षक थे। उनकी साधना ने छऊ को वैश्विक पहचान दी और तीनों शैलियों का पहला औपचारिक पाठ्यक्रम रचा — एक विरासत जो आज भी जीवित है।

मुख्य बातें

पंडित गोपाल प्रसाद दुबे का जन्म 25 जून 1957 को सरायकेला, झारखंड के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
दादा शशिभूषण दुबे से नौ वर्ष की आयु में कला की पहली दीक्षा मिली; 14 वर्ष से पारंपरिक अखाड़ों में प्रशिक्षण आरंभ।
1986 में एशियन कल्चरल काउंसिल की फेलोशिप पर न्यू यॉर्क में पश्चिमी रंगमंच और कोरियोग्राफी का अध्ययन किया।
हार्वर्ड , यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन और शिकागो में छऊ का अध्यापन कर इसे वैश्विक मंच दिया।
सरायकेला , मयूरभंज और पुरुलिया — तीनों छऊ शैलियों का पहला औपचारिक पाठ्यक्रम तैयार किया।
14 नवंबर 2022 को निधन; विरासत त्रिनेत्र छऊ डांस सेंटर और भाई सुनील दुबे के माध्यम से जारी।

पंडित गोपाल प्रसाद दुबे — छऊ नृत्य के उन विरले साधकों में से एक, जिन्होंने सरायकेला, झारखंड की मिट्टी से उठकर हार्वर्ड और यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन तक इस लुप्तप्राय कला की अलख जगाई। 25 जून 1957 को एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे गोपाल का बचपन छऊ की गूँजती धुनों और मुखौटों की रहस्यमयी दुनिया के बीच बीता, और यही बचपन का आकर्षण आगे चलकर एक ऐसी जीवन-साधना बन गया जिसने इस नृत्य परंपरा के इतिहास को नई दिशा दी।

बचपन और गुरु-दीक्षा

गोपाल के दादा शशिभूषण दुबे शाही सिंह देव राजवंश के दरबार में अभिनेता थे। उन्होंने महज नौ वर्ष की आयु में गोपाल को कला की पहली दीक्षा दी। 14 वर्ष की उम्र में उन्होंने पारंपरिक 'अखाड़ों' में प्रशिक्षण आरंभ किया। गुरु नटशेखर बनबिहारी पटनायक से शारीरिक संतुलन और चपलता सीखी, जबकि गुरु पद्मश्री केदारनाथ साहू से जटिल लयबद्ध हस्त मुद्राओं का गहन ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने प्रसिद्ध अमेरिकी नर्तकी शेरॉन लॉयन से ओडिसी नृत्य की बारीकियाँ भी सीखीं — यह विविधता उनकी कलात्मक दृष्टि की गहराई को दर्शाती है।

छऊ नृत्य और मुखौटा कला की विशेषता

छऊ पूर्वी भारत का एक ऊर्जावान अर्ध-शास्त्रीय नृत्य है, जो कलाबाज़ियों और मार्शल आर्ट के तत्वों के लिए जाना जाता है। मूलतः 'परिकंडा' — ढाल और तलवार की पारंपरिक युद्ध-कला — से उपजे इस नृत्य की सरायकेला शैली अत्यंत कोमल और अमूर्त है। इस शैली की आत्मा उसके मुखौटों में बसती है।

मुखौटा धारण करने के बाद 'दृष्टि भेद' — आँखों के भाव — समाप्त हो जाते हैं। ऐसे में नर्तक को अपनी समस्त भावनाएँ 'ग्रीवा भेद' (गर्दन के संचालन) और शारीरिक भंगिमाओं के माध्यम से दर्शकों तक पहुँचानी होती हैं — एक ऐसी चुनौती जो इस कला को असाधारण बनाती है।

मुखौटा निर्माण की साधना

पंडित गोपाल प्रसाद दुबे इस लुप्तप्राय मुखौटा निर्माण कला के बड़े संरक्षक थे। खरकाई नदी की उपजाऊ काली मिट्टी से सांचे (माटिर मुहा) गढ़ना, गोबर की राख का छिड़काव, मैदा के गोंद से कागज़ की परतें चढ़ाना और अंत में खड़िया मिट्टी के लेप पर सजीव पेस्टल रंग भरना — यह पूरी प्रक्रिया किसी तपस्या से कम नहीं थी।

रंगों का चयन भी प्रतीकात्मक था: भगवान कृष्ण के लिए नीला, राम के लिए हरा और शांत पात्रों के लिए हल्का गुलाबी। यह रंग-विधान बिना एक शब्द बोले ही पात्र के चरित्र को दर्शकों के सामने उजागर कर देता था।

वैश्विक मंच पर भारतीय कला का प्रसार

1986 में एशियन कल्चरल काउंसिल की फेलोशिप पाकर वे न्यू यॉर्क गए, जहाँ उन्होंने आधुनिक पश्चिमी रंगमंच और समकालीन कोरियोग्राफी का गहन अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने पूर्व और पश्चिम की कलात्मक संस्कृतियों के बीच एक ऐतिहासिक संवाद स्थापित किया।

हार्वर्ड, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन और शिकागो जैसे वैश्विक संस्थानों में अध्यापन करते हुए उन्होंने दुनिया को यह सिखाया कि एक मुखौटा किस प्रकार मनुष्य के अहंकार को ढककर उसकी आत्मा को नृत्य के लिए स्वतंत्र कर देता है। गौरतलब है कि उन्होंने सरायकेला, मयूरभंज और पुरुलिया — तीनों छऊ शैलियों के लिए पहला औपचारिक पाठ्यक्रम तैयार करने में भी ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

विरासत और स्मृति

14 नवंबर 2022 को पंडित गोपाल प्रसाद दुबे इस संसार से विदा हो गए। लेकिन उनकी विरासत आज भी त्रिनेत्र छऊ डांस सेंटर के माध्यम से उनके भाई सुनील दुबे और उनके शिष्यों के रूप में जीवित है। छऊ की वह लौ, जो सरायकेला के एक ब्राह्मण परिवार में जली थी, आज वैश्विक मंचों पर प्रकाशमान है — यही उनकी सच्ची साधना का प्रमाण है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तब भी मुखौटा निर्माण जैसी सहायक कलाएँ हाशिये पर रहीं। दुबे ने बिना राजकीय संरक्षण की प्रतीक्षा किए हार्वर्ड और लंदन में इस कला को स्वयं ले जाकर वह काम किया जो दशकों की नीतियाँ नहीं कर सकीं। प्रश्न यह है कि त्रिनेत्र छऊ डांस सेंटर जैसी संस्थाओं को क्या वह सरकारी और सामाजिक सहयोग मिल रहा है जो इस विरासत को अगली पीढ़ी तक निर्बाध पहुँचाने के लिए आवश्यक है?
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंडित गोपाल प्रसाद दुबे कौन थे?
पंडित गोपाल प्रसाद दुबे सरायकेला छऊ नृत्य और मुखौटा निर्माण कला के प्रमुख संरक्षक थे, जिन्होंने इस परंपरा को वैश्विक मंच पर स्थापित किया। 25 जून 1957 को झारखंड के सरायकेला में जन्मे दुबे ने हार्वर्ड, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन और शिकागो जैसे संस्थानों में छऊ का अध्यापन किया।
सरायकेला छऊ नृत्य की मुखौटा परंपरा क्या है?
सरायकेला छऊ में मुखौटा पहनने के बाद नर्तक की आँखों के भाव (दृष्टि भेद) काम नहीं करते, इसलिए वह गर्दन के संचालन (ग्रीवा भेद) और शारीरिक भंगिमाओं से भावनाएँ व्यक्त करता है। मुखौटे खरकाई नदी की काली मिट्टी, गोबर की राख, मैदा के गोंद और कागज़ की परतों से बनाए जाते हैं, और पात्र के अनुसार विशेष रंगों से सजाए जाते हैं।
गोपाल प्रसाद दुबे ने छऊ को वैश्विक स्तर पर कैसे पहचान दिलाई?
1986 में एशियन कल्चरल काउंसिल की फेलोशिप पर न्यू यॉर्क जाकर उन्होंने पश्चिमी रंगमंच और कोरियोग्राफी का अध्ययन किया और पूर्व-पश्चिम के बीच कलात्मक संवाद स्थापित किया। इसके बाद हार्वर्ड, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन और शिकागो में अध्यापन कर उन्होंने छऊ को अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक मंच पर स्थापित किया।
गोपाल प्रसाद दुबे का निधन कब हुआ और उनकी विरासत कैसे जीवित है?
पंडित गोपाल प्रसाद दुबे का निधन 14 नवंबर 2022 को हुआ। उनकी विरासत त्रिनेत्र छऊ डांस सेंटर के माध्यम से उनके भाई सुनील दुबे और उनके शिष्यों द्वारा आगे बढ़ाई जा रही है।
छऊ की तीन शैलियाँ कौन-सी हैं और दुबे का उनमें क्या योगदान था?
छऊ की तीन प्रमुख शैलियाँ हैं — सरायकेला (झारखंड), मयूरभंज (ओडिशा) और पुरुलिया (पश्चिम बंगाल)। पंडित गोपाल प्रसाद दुबे ने इन तीनों शैलियों के लिए पहला औपचारिक पाठ्यक्रम तैयार करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, जिससे इनका व्यवस्थित प्रशिक्षण और संरक्षण संभव हुआ।
राष्ट्र प्रेस
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