उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर: जिन्होंने विलुप्ति के कगार से बचाई ध्रुपद-धमार की परंपरा
सारांश
मुख्य बातें
उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर उन विरले कलाकारों में से थे जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत की सबसे प्राचीन गायन शैली — ध्रुपद-धमार — को उस समय थामे रखा जब यह परंपरा लगभग समाप्ति की ओर बढ़ रही थी। एक इंटरव्यू में उन्होंने स्वयं स्वीकार किया था कि ध्रुपद-धमार गायकी कई दशक पहले लगभग खत्म हो चुकी थी और केवल कुछ परिवारों व चुनिंदा कलाकारों के अथक प्रयासों से यह जीवित बच पाई। उनका यह कथन महज़ चिंता नहीं, बल्कि एक ऐसे साधक की पीड़ा थी जिसने पूरा जीवन इस कला को पुनर्जीवित करने में लगा दिया।
ध्रुपद की दशा और डागर की पीड़ा
उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर के अनुसार, समय के साथ ध्रुपद का मूल स्वरूप धीरे-धीरे क्षीण होता गया। उन्होंने बताया था कि अनेक कलाकारों का ध्यान सुरों की गहराई और भाव से हटकर ताल की जटिलताओं की ओर केंद्रित होने लगा, जिससे इस शैली की आत्मा कमज़ोर पड़ती गई। ध्रुपद का एक पक्ष नृत्य से भी जुड़ा रहा है — जहाँ इसके पदों पर नृत्य-प्रस्तुति दी जाती थी — परंतु शास्त्रीय गायन के रूप में इसकी मूल पहचान लगातार धुंधली होती चली गई।
गौरतलब है कि यह वह दौर था जब खयाल गायकी का प्रभाव तेज़ी से बढ़ रहा था और ध्रुपद श्रोताओं व संरक्षकों, दोनों के बीच हाशिये पर सिमटता जा रहा था। ऐसे में डागर परिवार की साधना इस परंपरा की एकमात्र जीवन-रेखा बन गई।
ध्रुपद की वाणियाँ और डागर वाणी की विशेषता
उस्ताद ने ध्रुपद की विभिन्न परंपराओं का भी उल्लेख किया था। उनके अनुसार ध्रुपद में कई वाणियाँ मानी जाती हैं — शुद्धा, भिन्ना, गौड़ी, व्यंगसुरा और साधारणी — जिनमें से प्रत्येक की अपनी गायन-शैली और भाव-भूमि है। डागर परिवार जिस शैली को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाता रहा, उसे साधारणी वाणी अथवा डागर वाणी के नाम से जाना जाता है। विलंबित लय, गहरी स्वर-साधना और न्यूनतम अलंकरण — यही इस वाणी की पहचान है, और यही जिया फरीदुद्दीन की गायकी का केंद्र-बिंदु भी रहा।
जन्म, परिवार और संगीत-दीक्षा
15 जून 1932 को राजस्थान के उदयपुर में जन्मे जिया फरीदुद्दीन डागर एक ऐसे घराने में पले-बढ़े जहाँ संगीत श्वास की तरह था। उनके पिता उस्ताद जियाउद्दीन डागर प्रतिष्ठित संगीतज्ञ थे, जिन्होंने बचपन से ही अपने पुत्र को ध्रुपद गायन की बारीकियाँ सिखाना शुरू कर दिया। पिता के निधन के बाद उनके बड़े भाई उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर — जो रुद्र वीणा के सुविख्यात वादक थे — ने उनकी संगीत-शिक्षा की बागडोर संभाली।
दोनों भाइयों ने मिलकर ध्रुपद को नए सिरे से स्थापित करने का संकल्प लिया। जब यह शैली सीमित दायरों में सिमटती जा रही थी, तब उन्होंने देश और विदेश — दोनों में — इसके प्रचार-प्रसार का बीड़ा उठाया।
अंतरराष्ट्रीय पहचान और शिक्षण-यात्रा
जिया फरीदुद्दीन डागर ने ऑस्ट्रिया, फ्रांस सहित यूरोप के अनेक देशों में जाकर ध्रुपद की शिक्षा दी। उनकी गायकी और शिक्षण-पद्धति ने विदेशी विद्यार्थियों को भी भारतीय शास्त्रीय संगीत की गहराई से जोड़ा। कई छात्र विशेष रूप से उनसे सीखने के लिए भारत आते थे — यह इस बात का प्रमाण है कि उनकी कला में एक सार्वभौमिक आकर्षण था।
आगे चलकर उनका जुड़ाव भोपाल से हुआ, जहाँ ध्रुपद के संरक्षण और संवर्धन के लिए स्थापित ध्रुपद केंद्र की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई। लगभग ढाई दशक तक उन्होंने वहाँ विद्यार्थियों को प्रशिक्षित किया। उनके शिष्यों में कई ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने आगे चलकर ध्रुपद को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाया।
विरासत और निधन
संगीत के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। किंतु उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने एक ऐसी कला-परंपरा को नई साँसें दीं, जिसे कभी विलुप्ति के कगार पर माना जा रहा था। 8 मई 2013 को उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर का निधन हो गया, परंतु उनके शिष्य और डागर वाणी की जीवंत परंपरा आज भी उनकी साधना को आगे बढ़ा रही है।