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पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर: राजदरबार ठुकराकर आम जन तक पहुँचाया भारतीय शास्त्रीय संगीत

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पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर: राजदरबार ठुकराकर आम जन तक पहुँचाया भारतीय शास्त्रीय संगीत

सारांश

राजदरबार की सुविधा ठुकराकर पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने 1901 में गांधर्व महाविद्यालय की स्थापना की और भारतीय शास्त्रीय संगीत को अमीर-गरीब सभी के लिए सुलभ बनाया। उनका लक्ष्य 'तानसेन नहीं, कानसेन' तैयार करना था — एक ऐसी विरासत जो आज भी जीवित है।

मुख्य बातें

पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर का जन्म 18 अगस्त 1872 को महाराष्ट्र के कुरुंदवाड़ में हुआ था।
उन्होंने बड़ौदा की महारानी जामनाबाई का दरबारी गायक बनने का प्रस्ताव अस्वीकार किया और संगीत को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लिया।
5 मई 1901 को लाहौर में गांधर्व महाविद्यालय की स्थापना की — जहाँ सभी वर्गों के लिए संगीत शिक्षा के द्वार खोले गए।
उनके प्रमुख शिष्यों में ओंकारनाथ ठाकुर , विनायकराव पटवर्धन , नारायणराव व्यास और बी.आर.
तीन खंडों में 'संगीत बाल प्रकाश' सहित कई ग्रंथ लिखे जो संगीत शिक्षा के क्षेत्र में आज भी संदर्भ-ग्रंथ माने जाते हैं।
21 अगस्त 1931 को 59 वर्ष की आयु में निधन; उनके पुत्र दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर भी प्रख्यात शास्त्रीय गायक बने।

पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर वह संगीत-साधक थे जिन्होंने 19वीं सदी के अंत में भारतीय शास्त्रीय संगीत को राजदरबारों की बंद दीवारों से बाहर निकालकर आम जनमानस तक पहुँचाया। बड़ौदा की महारानी जामनाबाई के दरबारी गायक बनने का प्रस्ताव ठुकराकर उन्होंने एक ऐसी राह चुनी जिसने भारतीय संगीत शिक्षा की पूरी तस्वीर बदल दी। उनका जन्म 18 अगस्त 1872 को महाराष्ट्र के कुरुंदवाड़ में हुआ था और निधन 21 अगस्त 1931 को 59 वर्ष की आयु में।

बचपन और संगीत की नींव

पलुस्कर के पिता पंडित दिगंबर गोपाल पलुस्कर प्रसिद्ध कीर्तनकार थे, इसलिए घर में भजन-कीर्तन का वातावरण स्वाभाविक था। किंतु बचपन में दत्त जयंती के अवसर पर एक पटाखे से उनके चेहरे और आँखों को गंभीर चोट लगी। तत्काल चिकित्सा सुविधा न मिलने से उनकी दृष्टि चली गई, हालाँकि कुछ समय बाद वह आंशिक रूप से लौट आई। इस घटना ने उनकी जीवन-दिशा को संगीत की ओर और गहराई से मोड़ दिया।

उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए मिरज के राजा ने उन्हें प्रसिद्ध संगीतज्ञ बालकृष्णबुवा इचलकरंजीकर के पास प्रशिक्षण के लिए भेजा। वर्षों तक गुरु के सान्निध्य में रहकर उन्होंने शास्त्रीय संगीत की बारीकियाँ आत्मसात कीं।

राजदरबार का प्रस्ताव और बड़ा सपना

शिक्षा पूर्ण होने के बाद पलुस्कर ने देश के विभिन्न भागों की यात्रा की और अनेक रियासतों की संगीत परंपराओं को समझा। उस युग में किसी राजघराने का दरबारी गायक बनना संगीतकार के लिए सर्वोच्च सम्मान माना जाता था। कहा जाता है कि बड़ौदा की महारानी जामनाबाई ने उन्हें दरबारी गायक का प्रस्ताव दिया, किंतु पलुस्कर ने इसे विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया।

उनके मन में एक बड़ा संकल्प था — संगीत को राजाओं-महाराजाओं के दरबार की विलासिता से मुक्त कर उसे जन-जन की साधना बनाना। वह मानते थे कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मा को परिष्कृत करने वाली विद्या है।

गांधर्व महाविद्यालय: एक संगीत क्रांति

इसी संकल्प की परिणति थी 5 मई 1901 को लाहौर में गांधर्व महाविद्यालय की स्थापना। यह भारतीय संगीत शिक्षा के इतिहास में एक मील का पत्थर था। इस संस्थान में प्रवेश के लिए किसी विशेष वंश या वर्ग की अनिवार्यता नहीं थी — अमीर-गरीब, पुरुष-महिला, युवा-वृद्ध सभी के लिए द्वार खुले थे।

पलुस्कर ने सार्वजनिक मंचों पर संगीत प्रस्तुतियाँ दीं और मामूली शुल्क लेकर कार्यक्रम आयोजित किए — जो उस काल की परंपरा के सर्वथा विपरीत था, क्योंकि संगीत की महफ़िलें प्रायः मंदिरों या राजदरबारों तक सीमित रहती थीं। आर्थिक रूप से कमज़ोर विद्यार्थियों को न केवल संगीत सीखने का अवसर दिया गया, बल्कि उन्हें आगे चलकर संगीत शिक्षक बनने के लिए भी प्रशिक्षित किया गया।

संस्थान के संचालन के लिए उन्होंने स्वयं धन जुटाया, कर्ज लिया और लगातार सार्वजनिक कार्यक्रम किए। 1924 में उनकी संपत्ति और संस्थान नीलामी की कगार तक पहुँच गए, किंतु उनकी संगीत-साधना और विचारों की विरासत अक्षुण्ण रही। बाद में उन्होंने विद्यालय को लाहौर से मुंबई भी स्थानांतरित किया।

तानसेन नहीं, 'कानसेन' तैयार करने का लक्ष्य

पलुस्कर का उद्देश्य केवल प्रतिभाशाली गायक तैयार करना नहीं था। उनकी प्रसिद्ध उक्ति थी कि वह 'तानसेन नहीं, कानसेन' तैयार करना चाहते हैं — अर्थात ऐसे श्रोता जो अच्छे संगीत को पहचान और समझ सकें। यह सोच संगीत को एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप देती थी।

उन्होंने संगीत पर कई ग्रंथ भी रचे। तीन खंडों में लिखा 'संगीत बाल प्रकाश' और रागों पर उनके ग्रंथ आज भी संगीत शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण संदर्भ-ग्रंथ माने जाते हैं।

विरासत और शिष्य परंपरा

पलुस्कर की गुरु-शिष्य परंपरा ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को अमूल्य योगदान दिया। विनायकराव पटवर्धन, ओंकारनाथ ठाकुर, नारायणराव व्यास और बी.आर. देवधर जैसे उनके शिष्य आगे चलकर प्रख्यात संगीतज्ञ और शिक्षक बने। उनके पुत्र दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर भी जाने-माने शास्त्रीय गायक के रूप में स्थापित हुए।

21 अगस्त 1931 को 59 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, किंतु उनके द्वारा प्रज्वलित संगीत-शिक्षा की यह मशाल आज भी जल रही है। भारत में आज संगीत विद्यालयों का जो जाल बिछा है, उसकी नींव में पलुस्कर की उस दृष्टि का बड़ा योगदान है जिसने संगीत को विशेषाधिकार से सार्वजनिक संपदा बनाया।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक सामाजिक आंदोलन का दस्तावेज़ है — ऐसे दौर में जब कला विशेषाधिकार थी, उन्होंने उसे अधिकार बनाया। गौरतलब है कि उनके 'कानसेन' वाले दर्शन ने संगीत की माँग को जन-स्तर पर निर्मित किया, जो आज के संगीत-विद्यालयों और प्रतियोगिताओं की असली पूर्वपीठिका है। यह विडंबना ही है कि जिस व्यक्ति ने संगीत शिक्षा को लोकतांत्रिक बनाया, उसकी अपनी संपत्ति 1924 में नीलामी की कगार तक पहुँच गई — राज्य या समाज ने उन्हें वह संस्थागत समर्थन नहीं दिया जिसके वे हकदार थे। उनकी विरासत को याद करते हुए यह प्रश्न भी उठता है कि क्या आज की संगीत शिक्षा व्यवस्था उनके उस मूल संकल्प को — आर्थिक रूप से कमज़ोर प्रतिभाओं तक पहुँचने के संकल्प को — वास्तव में जीवित रख पाई है।
RashtraPress
17 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर कौन थे?
पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर 19वीं-20वीं सदी के प्रख्यात भारतीय शास्त्रीय संगीतज्ञ और शिक्षा-सुधारक थे, जिन्होंने शास्त्रीय संगीत को राजदरबारों से निकालकर आम जन तक पहुँचाया। उनका जन्म 18 अगस्त 1872 को महाराष्ट्र के कुरुंदवाड़ में हुआ और 21 अगस्त 1931 को 59 वर्ष की आयु में निधन हुआ।
गांधर्व महाविद्यालय की स्थापना कब और कहाँ हुई?
गांधर्व महाविद्यालय की स्थापना 5 मई 1901 को लाहौर में पंडित पलुस्कर ने की थी। यह भारत का पहला ऐसा संगीत संस्थान था जहाँ सभी वर्गों, जातियों और आर्थिक पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों के लिए प्रवेश के द्वार खुले थे। बाद में इसे मुंबई भी स्थानांतरित किया गया।
पलुस्कर ने 'तानसेन नहीं, कानसेन' क्यों कहा था?
पलुस्कर का लक्ष्य केवल बड़े गायक तैयार करना नहीं था, बल्कि ऐसे सुशिक्षित श्रोता तैयार करना था जो अच्छे संगीत को पहचान और समझ सकें। 'कानसेन' यानी संवेदनशील श्रोता — उनके अनुसार संगीत की असली शक्ति तब प्रकट होती है जब समाज में उसकी सच्ची समझ हो, न कि केवल प्रदर्शन।
पंडित पलुस्कर के प्रमुख शिष्य कौन थे?
पंडित पलुस्कर के प्रमुख शिष्यों में ओंकारनाथ ठाकुर, विनायकराव पटवर्धन, नारायणराव व्यास और बी.आर. देवधर शामिल हैं, जो आगे चलकर स्वयं प्रख्यात संगीतज्ञ और शिक्षक बने। उनके पुत्र दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर भी जाने-माने शास्त्रीय गायक के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
पलुस्कर ने संगीत शिक्षा के क्षेत्र में क्या लिखा?
पंडित पलुस्कर ने संगीत पर कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे, जिनमें तीन खंडों में 'संगीत बाल प्रकाश' सर्वाधिक प्रसिद्ध है। रागों पर उनके ग्रंथ भी संगीत शिक्षा के क्षेत्र में आज भी संदर्भ-ग्रंथ के रूप में उपयोग किए जाते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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