गिदोन सार का ईरान पर पलटवार: 'प्रदर्शनकारियों को फाँसी देने वाले दे रहे पेरिस को आज़ादी का पाठ'
सारांश
मुख्य बातें
इजरायल के विदेश मंत्री गिदोन सार ने 19 अक्टूबर 2026 को ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के उस बयान पर तीखा पलटवार किया, जिसमें अराघची ने फ्रांस में जारी विरोध-प्रदर्शनों का समर्थन करते हुए राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को निशाना बनाया था। सार ने कहा कि जो सरकार अपने ही नागरिकों को प्रदर्शन के लिए फाँसी देती है और विदेशों में आतंकवाद फैलाने के आरोप झेलती है, वह पेरिस को 'सभा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का पाठ पढ़ाने के किसी भी नैतिक अधिकार की दावेदार नहीं है।
सार का एक्स पर सीधा हमला
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए गिदोन सार ने लिखा: 'ईरान के विदेश मंत्री फ्रांस में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों का खुलकर समर्थन कर रहे हैं। जो सरकार अपने ही देश में प्रदर्शन करने वालों को फाँसी देती है और विदेशों में आतंकवाद फैलाने के आरोप झेलती है, वही अब पेरिस को 'सभा और प्रदर्शन की आज़ादी' पर भाषण दे रही है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि जनवरी में ईरानी सरकार द्वारा हज़ारों अपने ही नागरिकों के खिलाफ की गई सख्त कार्रवाई को लोग अभी तक नहीं भूले हैं, और दमन, हिंसा व फाँसी जैसी घटनाएँ आज भी जारी हैं।
अराघची का फ्रांस पर बयान और मैक्रों पर निशाना
इससे पहले ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने एक्स पर पोस्ट करते हुए फ्रांस की मौजूदा स्थिति के लिए राष्ट्रपति मैक्रों को सीधे ज़िम्मेदार ठहराया। अराघची ने लिखा: 'मैक्रों ने खुद ही यह स्थिति पैदा की थी, जब उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति को भरोसा दिलाया कि उन्हें ईरानियों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों पर कोई आपत्ति नहीं है। फ्रांस की जनता बड़े स्तर पर बदलाव चाहती है, जिसमें शांतिपूर्वक इकट्ठा होने और अपनी बात रखने की आज़ादी भी शामिल है।' उन्होंने मैक्रों से आग्रह किया कि वे 'फ्रांस के भविष्य की आवाज़' को सुनें।
ईरान के विदेश मंत्रालय का दोहरे मानदंड पर सवाल
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने भी मैक्रों को उनके अपने पुराने बयान याद दिलाए। बाघेई ने कहा कि जनवरी में जब ईरान में विरोध-प्रदर्शन हो रहे थे, तब फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने 'बिना किसी डर और सजा के शांतिपूर्ण प्रदर्शन' का खुलकर समर्थन किया था। बाघेई ने पूछा कि ईरान और फ्रांस के प्रदर्शनों को लेकर इतना अलग-अलग रवैया क्यों? उन्होंने यह भी जोड़ा कि अब जब अमेरिका में भी 'नो किंग्स' जैसे नारे गूँज रहे हैं और संकट फ्रांस के अपने दरवाज़े तक पहुँच गया है, तो मैक्रों को इतिहास से सबक लेना चाहिए।
कूटनीतिक परिप्रेक्ष्य: ईरान-इजरायल-फ्रांस त्रिकोण
यह ऐसे समय में आया है जब ईरान और इजरायल के बीच तनाव पहले से ही चरम पर है, और फ्रांस घरेलू राजनीतिक उथल-पुथल से जूझ रहा है। गौरतलब है कि ईरान पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लंबे समय से मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि ईरान का यह कदम कूटनीतिक दबाव बनाने की एक रणनीतिक कोशिश है, जबकि इजरायल इसे अपनी जवाबी छवि मजबूत करने के अवसर के रूप में भुना रहा है। इस पूरी वाकयुद्ध में मैक्रों की सरकार की घरेलू कमज़ोरी एक भू-राजनीतिक उपकरण बन गई है।
आगे क्या
फ्रांस की सरकार ने अभी तक ईरान या इजरायल के इन बयानों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। यह विवाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भी उठाए जाने की संभावना है, जहाँ ईरान पर पहले से ही कई जाँच लंबित हैं। कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह शब्दयुद्ध आने वाले हफ्तों में और तीखा हो सकता है।