18 अगस्त 2026
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हरिशंकर शर्मा और हजारी प्रसाद द्विवेदी: 19 अगस्त को जन्मे हिंदी के दो युगपुरुष

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हरिशंकर शर्मा और हजारी प्रसाद द्विवेदी: 19 अगस्त को जन्मे हिंदी के दो युगपुरुष

सारांश

19 अगस्त केवल एक तारीख नहीं — यह हिंदी साहित्य का दोहरा उत्सव है। एक तरफ हरिशंकर शर्मा का व्यंग्य जो सत्ता और रूढ़ि पर चोट करता था, दूसरी तरफ हजारी प्रसाद द्विवेदी का दर्शन जो कुटज के पौधे में स्वाभिमान खोज लेता था — दोनों ने मिलकर हिंदी को मानवता की भाषा बनाया।

मुख्य बातें

हरिशंकर शर्मा का जन्म 19 अगस्त 1891 को अलीगढ़ के हरदुआगंज में हुआ; बिना औपचारिक शिक्षा के उर्दू, फारसी, गुजराती व मराठी पर अधिकार प्राप्त किया।
उनकी व्यंग्य कृतियाँ ' घास-पात ', ' पिंजरा पोल ' और ' चिड़ियाघर ' सामाजिक-राजनीतिक कुरीतियों पर तीखा प्रहार करती हैं; ' घास-पात ' को ' देव पुरस्कार ' मिला।
शर्मा जी को 1966 में ' पद्म श्री ' से सम्मानित किया गया; उनके पत्रकारिता कार्य को राहुल सांकृत्यायन ने 'स्वर्णिम अध्याय' कहा।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म 19 अगस्त 1907 को बलिया के ओझवलिया गाँव में हुआ; शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ टैगोर के सान्निध्य में साहित्यिक दृष्टि परिपक्व हुई।
उनके ललित निबंध ' कुटज ' में 'जिजीविषा' का दर्शन और ' बाणभट्ट की आत्मकथा ' में स्त्री चेतना का जीवंत चित्रण मिलता है।
द्विवेदी जी को 1957 में ' पद्म भूषण ' और 1973 में ' साहित्य अकादमी पुरस्कार ' (' आलोक पर्व ' के लिए) प्राप्त हुआ।

हिंदी साहित्य के इतिहास में 19 अगस्त की तिथि एक विशेष स्थान रखती है — इसी दिन दो ऐसे साहित्यकारों ने जन्म लिया जिन्होंने अपनी-अपनी विधाओं में भाषा और समाज को नई दृष्टि दी। हरिशंकर शर्मा ने व्यंग्य को सामाजिक और राजनीतिक प्रतिरोध का हथियार बनाया, जबकि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ललित निबंध और आलोचना के माध्यम से भारतीय परंपरा में निहित मानवतावाद को आधुनिक पाठक तक पहुँचाया।

हरिशंकर शर्मा: व्यंग्य की धारदार लेखनी

19 अगस्त 1891 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद के हरदुआगंज में जन्मे हरिशंकर शर्मा को साहित्यिक संस्कार विरासत में मिले थे। उनके पिता पंडित नाथूराम शंकर शर्मा स्वयं हिंदी के प्रतिष्ठित कवि थे। उल्लेखनीय है कि बिना किसी औपचारिक विद्यालयी शिक्षा के, केवल स्वाध्याय के बल पर उन्होंने उर्दू, फारसी, गुजराती और मराठी भाषाओं पर असाधारण अधिकार प्राप्त किया।

उनके व्यक्तित्व को लेकर समकालीन साहित्यकारों की राय एकमत थी। प्रसिद्ध निबंधकार बाबू गुलाबराय ने लिखा कि उनका व्यक्तित्व अहं और दंभ से पूर्णतः मुक्त था। साहित्यकार विष्णु प्रभाकर उन्हें 'सरलता की प्रतिमूर्ति' कहते थे, और राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा कि हरिशंकर शर्मा के समान साधुमना और सौम्य साहित्यकार विरले ही होते हैं।

'घास-पात', 'पिंजरा पोल', 'चिड़ियाघर' और 'मटकाराम मिश्र' जैसी उनकी व्यंग्य रचनाओं ने सामाजिक रूढ़ियों, कुरीतियों और राजनीतिक विद्रूपताओं पर तीखा प्रहार किया। 'घास-पात' के लिए उन्हें प्रतिष्ठित 'देव पुरस्कार' से नवाज़ा गया। पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने 'आर्यमित्र', 'ज्ञानगंगा' और 'दैनिक दिग्विजय' जैसी पत्रिकाओं का कुशल संपादन किया — जिसे महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी पत्रकारिता का स्वर्णिम अध्याय माना। साहित्य और शिक्षा में उनके योगदान को 1966 में 'पद्म श्री' से मान्यता मिली।

हजारी प्रसाद द्विवेदी: परंपरा में मानवता की खोज

इसी तिथि — 19 अगस्त 1907 — को बलिया जिले के ओझवलिया (आरत दुबे का छपरा) गाँव में जन्मे डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी आलोचना और निबंध-साहित्य को स्थायी रूप से समृद्ध किया। संस्कृत और ज्योतिष के प्रकांड विद्वान पिता अनमोल द्विवेदी से प्राप्त ज्ञान की नींव पर खड़े होकर उन्होंने शांतिनिकेतन (1930–1950) में रवींद्रनाथ टैगोर और क्षितिमोहन सेन के सान्निध्य में अपनी साहित्यिक दृष्टि को परिपक्व किया।

द्विवेदी जी की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने भारतीय परंपरा को रूढ़ियों का बोझ नहीं बनने दिया — उन्होंने उसे एक प्रवाहमान नदी के रूप में देखा। उन्होंने कबीर के अक्खड़पन और फक्कड़पन का ऐतिहासिक एवं समाजशास्त्रीय विश्लेषण करते हुए उन्हें 'वाणी का डिक्टेटर' घोषित किया।

कुटज का दर्शन: विषमता में स्वाभिमान

उनके ललित निबंध 'कुटज' में अदम्य 'जिजीविषा' — अर्थात जीने की इच्छा — का जो दर्शन मिलता है, वह मानव जीवन की प्रेरणा का अनूठा स्रोत है। हिमालय की सूखी और नीरस चट्टानों पर उगने वाले कुटज के पौधे को उन्होंने स्वाभिमान और अपराजित जीवन-शक्ति का प्रतीक माना — यह संदेश देते हुए कि विषम परिस्थितियों में भी बिना किसी की चापलूसी किए गरिमा के साथ जिया जा सकता है।

'बाणभट्ट की आत्मकथा' जैसे ऐतिहासिक उपन्यास के माध्यम से उन्होंने स्त्री चेतना, मानवीय प्रेम और तत्कालीन समाज का जीवंत दस्तावेज़ प्रस्तुत किया। उनका मानना था कि साहित्य का परम लक्ष्य लोकमंगल और मनुष्य को संवेदनशीलता के उच्च शिखर पर ले जाना है।

सम्मान और विरासत

द्विवेदी जी को 1957 में 'पद्म भूषण' और 1973 में निबंध संग्रह 'आलोक पर्व' के लिए 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। उनका साहित्य आज भी मानवीय मूल्यों का सबसे सशक्त पैरोकार बना हुआ है। 19 अगस्त की यह तिथि हिंदी साहित्य को याद दिलाती है कि महान लेखक केवल शब्द नहीं गढ़ते — वे समाज की आत्मा को आकार देते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

दोनों को एक साथ साधती रही। आज जब सार्वजनिक विमर्श में भाषा का स्तर गिर रहा है, शर्मा जी का व्यंग्य-बोध और द्विवेदी जी का मानवतावादी दृष्टिकोण पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। विडंबना यह है कि इन दोनों रचनाकारों को पाठ्यक्रमों में जो स्थान मिलना चाहिए, वह आज भी अधूरा है — 'कुटज' जैसे निबंध परीक्षाओं तक सिमट गए हैं, जबकि उनका जीवन-दर्शन समकालीन भारत के लिए एक ज़रूरी आईना है।
RashtraPress
18 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हरिशंकर शर्मा कौन थे और उनकी प्रमुख रचनाएँ कौन-सी हैं?
हरिशंकर शर्मा हिंदी के प्रमुख व्यंग्यकार और पत्रकार थे, जिनका जन्म 19 अगस्त 1891 को अलीगढ़ के हरदुआगंज में हुआ था। उनकी प्रमुख व्यंग्य कृतियों में 'घास-पात', 'पिंजरा पोल', 'चिड़ियाघर' और 'मटकाराम मिश्र' शामिल हैं, जिनके लिए उन्हें 1966 में 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्य में क्या योगदान है?
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी आलोचना और ललित निबंध को नई ऊँचाई दी। उन्होंने 'बाणभट्ट की आत्मकथा' जैसे ऐतिहासिक उपन्यास और 'कुटज' जैसे दार्शनिक निबंध लिखे, जो भारतीय परंपरा में मानवतावादी मूल्यों की खोज करते हैं। 1957 में 'पद्म भूषण' और 1973 में 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' उनके योगदान की आधिकारिक स्वीकृति है।
'कुटज' निबंध का मुख्य संदेश क्या है?
द्विवेदी जी का 'कुटज' निबंध हिमालय की सूखी चट्टानों पर उगने वाले कुटज पौधे को स्वाभिमान और अदम्य जीवन-शक्ति का प्रतीक मानता है। इसका मूल संदेश है कि विषम परिस्थितियों में भी बिना किसी की चापलूसी किए गरिमा के साथ जीना ही सच्ची 'जिजीविषा' है।
हरिशंकर शर्मा को कौन-से पुरस्कार मिले?
'घास-पात' के लिए उन्हें 'देव पुरस्कार' प्रदान किया गया और साहित्य व शिक्षा में समग्र योगदान के लिए 1966 में भारत सरकार ने उन्हें 'पद्म श्री' से सम्मानित किया। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने उनके पत्रकारिता कार्य को हिंदी पत्रकारिता का स्वर्णिम अध्याय बताया था।
हजारी प्रसाद द्विवेदी का शांतिनिकेतन से क्या संबंध था?
द्विवेदी जी ने 1930 से 1950 तक शांतिनिकेतन में अध्यापन किया, जहाँ रवींद्रनाथ टैगोर और क्षितिमोहन सेन के सान्निध्य में उनका साहित्यिक दृष्टिकोण परिपक्व हुआ। इस कालखंड ने उनकी भारतीय परंपरा और मानवतावाद की समझ को गहरा आधार दिया।
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