DRDO-नौसेना ने NASAM-SR का सफल साल्वो टेस्ट किया, हेलिकॉप्टर से दागी दो एंटी-शिप मिसाइलें
सारांश
Key Takeaways
- DRDO और भारतीय नौसेना ने 29 अप्रैल 2026 को बंगाल की खाड़ी में NASM-SR का सफल साल्वो परीक्षण किया।
- पहली बार एक ही नौसैनिक हेलिकॉप्टर से अत्यंत कम समय के अंतराल में दो मिसाइलें दागी गईं।
- दोनों मिसाइलों ने वॉटरलाइन हिट क्षमता सहित सभी निर्धारित उद्देश्य पूरे किए।
- मिसाइल में फाइबर-ऑप्टिक जायरोस्कोप नेविगेशन, हाई-बैंडविड्थ डेटा लिंक और जेट-वेन कंट्रोल सहित पूर्णतः स्वदेशी तकनीक है।
- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और DRDO अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने टीमों को बधाई दी।
- उत्पादन DCPP साझेदारों द्वारा भारतीय उद्योगों और स्टार्टअप्स की मदद से किया जा रहा है।
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और भारतीय नौसेना ने 29 अप्रैल 2026 को बंगाल की खाड़ी में ओडिशा के तट के निकट नेवल एंटी-शिप मिसाइल शॉर्ट रेंज (NASM-SR) का सफल साल्वो परीक्षण किया। पहली बार एक ही नौसैनिक हेलिकॉप्टर प्लेटफॉर्म से अत्यंत कम समय के अंतराल में दो मिसाइलें दागी गईं और दोनों ने अपने सभी निर्धारित उद्देश्य पूरी तरह हासिल किए। रक्षा मंत्रालय ने इसे समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है।
परीक्षण का विवरण और निगरानी प्रणाली
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, परीक्षण की निगरानी विशेष रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम और टेलीमेट्री उपकरणों के ज़रिए की गई, जिन्हें चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (ITR) ने तैनात किया था। परीक्षण के दौरान दोनों मिसाइलों ने अपनी वॉटरलाइन हिट क्षमता भी सफलतापूर्वक प्रदर्शित की, जिसका अर्थ है कि ये दुश्मन के जहाज को पानी की सतह के ठीक पास निशाना बनाकर अधिकतम क्षति पहुँचाने में सक्षम हैं।
परीक्षण के अवसर पर DRDO के वरिष्ठ वैज्ञानिक, भारतीय नौसेना और भारतीय वायुसेना के प्रतिनिधि तथा विकास-सह-उत्पादन साझेदार (DCPP) उपस्थित रहे।
मिसाइल की स्वदेशी तकनीक
NASM-SR में सॉलिड प्रोपल्शन बूस्टर और लॉन्ग-बर्न सस्टेनर का उपयोग किया गया है, जो इसे बेहतर रेंज और उड़ान स्थिरता प्रदान करते हैं। इस मिसाइल में निम्नलिखित अत्याधुनिक स्वदेशी तकनीकें शामिल हैं — उन्नत सीकर, इंटीग्रेटेड एवियोनिक्स मॉड्यूल, फाइबर-ऑप्टिक जायरोस्कोप आधारित इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम, रेडियो-एल्टीमीटर, आधुनिक कंट्रोल और गाइडेंस एल्गोरिद्म, हाई-बैंडविड्थ टू-वे डेटा लिंक और जेट-वेन कंट्रोल।
ये सभी तकनीकें DRDO की विभिन्न प्रयोगशालाओं और भारतीय उद्योगों द्वारा विकसित की गई हैं। इस मिसाइल सिस्टम को DRDO की हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत ने विकसित किया है।
सहयोगी संस्थाएँ और उत्पादन भागीदारी
इस परियोजना में DRDO की अन्य प्रयोगशालाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा — डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (हैदराबाद), हाई एनर्जी मटेरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी (पुणे), टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (चंडीगढ़) और इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (चांदीपुर) ने सहयोग दिया। वर्तमान में इन मिसाइलों का उत्पादन DCPP साझेदारों द्वारा भारतीय उद्योगों और स्टार्टअप्स की सहायता से किया जा रहा है, जो 'आत्मनिर्भर भारत' पहल के अनुरूप है।
सरकार और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफलता पर DRDO, भारतीय नौसेना, भारतीय वायुसेना और उद्योग से जुड़े सभी साझेदारों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि इस मिसाइल का विकास देश की रक्षा क्षमताओं को काफी मज़बूत करेगा। रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव और DRDO के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने भी सभी टीमों को शुभकामनाएँ दीं।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह उपलब्धि आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की दिशा में एक बड़ा कदम है और इससे भारतीय सशस्त्र सेनाओं की समुद्री युद्ध क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। गौरतलब है कि हेलिकॉप्टर प्लेटफॉर्म से मिसाइल दागने की यह क्षमता भारतीय नौसेना को हवा से दुश्मन के जहाजों को निशाना बनाने में और अधिक सक्षम बनाती है।
यह परीक्षण ऐसे समय में हुआ है जब भारत अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा को लेकर अत्यधिक सतर्क है और स्वदेशी रक्षा तकनीक को प्राथमिकता दे रहा है। भविष्य में इस मिसाइल प्रणाली के नौसेना में पूर्ण एकीकरण से भारत की समुद्री मारक क्षमता में बड़ा इज़ाफा होने की संभावना है।