बड़ा फैसला: हिमाचल भर्ती एवं सेवा शर्त अधिनियम 2024 असंवैधानिक, हाईकोर्ट ने किया रद्द
सारांश
Key Takeaways
- हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भर्ती एवं सेवा शर्त अधिनियम, 2024 को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर निरस्त किया।
- न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने 445 याचिकाओं पर एकसाथ सुनवाई की।
- अधिनियम की धारा 3, 5 और 9 को संविधान के विरुद्ध पाया गया, जिससे पूरा कानून निरस्त हुआ।
- राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर कर्मचारियों को सभी बकाया वित्तीय लाभ देने का आदेश दिया गया।
- इस अधिनियम के तहत जारी सभी आदेश, निर्देश और वसूली प्रस्ताव स्वतः रद्द घोषित किए गए।
- यह फैसला विधायिका और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र की संवैधानिक सीमाओं को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
शिमला, 25 अप्रैल। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में हिमाचल प्रदेश भर्ती एवं सरकारी कर्मचारियों की सेवा शर्त अधिनियम, 2024 को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त कर दिया है। इस फैसले से प्रदेश के हजारों सरकारी कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है और उनके वर्षों से लंबित वित्तीय लाभ प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
खंडपीठ का ऐतिहासिक फैसला
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने एक साथ 445 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 3, 5 और 9 भारतीय संविधान के प्रावधानों के सीधे विरुद्ध हैं।
कोर्ट ने कहा कि जब इन तीन मूलभूत धाराओं को हटा दिया जाता है, तो शेष अधिनियम में कोई सार्थक या क्रियाशील प्रावधान नहीं बचता। इसी आधार पर पूरे कानून को निरस्त करना न्यायसंगत और अनिवार्य ठहराया गया।
सभी आदेश और वसूली प्रस्ताव भी रद्द
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि इस अधिनियम के आधार पर राज्य सरकार या उसके किसी अधिकारी द्वारा की गई समस्त कार्रवाइयां असंवैधानिक एवं अमान्य मानी जाएंगी। इसके अंतर्गत जारी सभी आदेश, निर्देश और कर्मचारियों से वित्तीय लाभों की वापसी या वसूली से संबंधित सभी प्रस्ताव भी स्वतः रद्द हो गए हैं।
अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे सक्षम न्यायालयों के आदेशों के अनुरूप कर्मचारियों को तीन महीने के भीतर सभी देय वित्तीय लाभ सुनिश्चित करें।
मामले की पृष्ठभूमि — अनुबंध से नियमितीकरण तक का संघर्ष
यह विवाद उन हजारों कर्मचारियों से जुड़ा है जिन्हें प्रारंभ में अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) आधार पर नियुक्त किया गया था। वर्ष 2003 के बाद इन्हें चरणबद्ध ढंग से नियमित किया गया, परंतु उनकी अनुबंध सेवा अवधि को नियमित सेवा में नहीं जोड़ा गया और वित्तीय लाभों से वंचित रखा गया।
कर्मचारियों ने इस अन्याय को अदालत में चुनौती दी और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक अपना पक्ष जीता। इसके बावजूद राज्य सरकार ने वर्ष 2024 में यह विवादास्पद अधिनियम लागू कर पहले दिए गए वित्तीय लाभों को वापस लेने की कोशिश की।
विधायिका बनाम न्यायपालिका — संवैधानिक सीमाओं का प्रश्न
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था कि सरकार ने इस अधिनियम के माध्यम से न्यायपालिका के फैसलों को पलटने का प्रयास किया, जो उसके संवैधानिक अधिकार क्षेत्र से बाहर है। उनका कहना था कि किसी न्यायिक निर्णय को केवल न्यायपालिका ही बदल सकती है, विधायिका नहीं।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि 17 जुलाई 2025 को इस अधिनियम के तहत लाभ वापसी के आदेश जारी किए गए थे, जो पूर्णतः असंवैधानिक थे। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए अधिनियम को निरस्त किया।
व्यापक प्रभाव और आगे की राह
यह निर्णय केवल कर्मचारियों की राहत तक सीमित नहीं है — यह प्रशासनिक और संवैधानिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करता है। इससे सरकार और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र की सीमाएं पुनः रेखांकित हुई हैं।
गौरतलब है कि देश के कई राज्यों में इस तरह के अनुबंध कर्मचारियों के नियमितीकरण और वित्तीय लाभों को लेकर विवाद चलते रहे हैं। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला उन राज्यों के लिए भी एक संदर्भ बिंदु बन सकता है जहां सरकारें न्यायिक आदेशों को विधायी रास्ते से निष्प्रभावी करने की कोशिश करती हैं।
अब सभी की निगाहें इस बात पर होंगी कि राज्य सरकार इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देती है या नहीं, और तीन महीने की समय सीमा के भीतर कर्मचारियों को उनके बकाया वित्तीय लाभ मिल पाते हैं या नहीं।