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बिष्णुराम मेधी को हिमंत सरमा की श्रद्धांजलि, पलाशबारी-सुअलकुची पुल का नाम होगा उनके नाम पर

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बिष्णुराम मेधी को हिमंत सरमा की श्रद्धांजलि, पलाशबारी-सुअलकुची पुल का नाम होगा उनके नाम पर

सारांश

असम के CM हिमंत बिस्वा सरमा ने पूर्व CM व स्वतंत्रता सेनानी बिष्णुराम मेधी की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देते हुए पलाशबारी-सुअलकुची पुल का नाम उनके नाम पर रखने की घोषणा की। मेधी ने 1950-57 तक असम की बागडोर संभाली थी।

मुख्य बातें

असम के CM हिमंत बिस्वा सरमा ने 24 अप्रैल को पूर्व CM बिष्णुराम मेधी की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित की।
सरमा ने एक्स (X) पर मेधी को 'महान राजनेता' बताते हुए असम की राजनीतिक यात्रा में उनके योगदान को याद किया।
आगामी पलाशबारी-सुअलकुची पुल का नामकरण बिष्णुराम मेधी के सम्मान में किया जाएगा।
बिष्णुराम मेधी ने 1950 से 1957 तक असम के मुख्यमंत्री पद पर कार्य किया और स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं और नागरिकों ने भी दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि दी।
सरकार ने मेधी के आदर्शों को बनाए रखते हुए असम की प्रगति के लिए काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई।

गुवाहाटी, 24 अप्रैल: असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने शुक्रवार को राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एवं स्वतंत्रता सेनानी बिष्णुराम मेधी की पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके साथ ही उन्होंने एक ऐतिहासिक घोषणा करते हुए कहा कि आगामी पलाशबारी-सुअलकुची पुल का नामकरण मेधी के सम्मान में किया जाएगा।

सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री का संदेश

सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया मंच एक्स (X) पर लिखा कि बिष्णुराम मेधी एक महान राजनेता थे, जिनकी दूरदर्शिता और नेतृत्व क्षमता ने असम की राजनीतिक यात्रा को एक निर्णायक मोड़ पर मजबूती दी। उन्होंने कहा कि मेधी की जनसेवा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत है।

सरमा ने अपने संदेश में यह भी स्पष्ट किया कि पलाशबारी-सुअलकुची पुल का नाम मेधी के नाम पर रखकर सरकार उनकी अमर विरासत को चिरस्थायी श्रद्धांजलि देना चाहती है, ताकि उनके आदर्श और मूल्य जनमानस में जीवंत बने रहें।

बिष्णुराम मेधी: असम के निर्माताओं में एक अग्रणी नाम

बिष्णुराम मेधी ने 1950 से 1957 तक असम के मुख्यमंत्री पद पर रहकर राज्य की शासन व्यवस्था को सुदृढ़ करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। स्वतंत्रता के पश्चात के उन कठिन वर्षों में जब नवस्वतंत्र भारत अपनी प्रशासनिक नींव खड़ी कर रहा था, मेधी ने असम में विकास और स्थिरता की बुनियाद रखी।

वे अपनी प्रशासनिक दक्षता, राष्ट्रवादी सोच और जनकल्याण के प्रति समर्पण के लिए विशेष रूप से जाने जाते थे। उन्होंने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी निभाई और बाद में असम के राजनीतिक परिदृश्य को आकार देने में केंद्रीय भूमिका अदा की।

पुल नामकरण की घोषणा का महत्व

पलाशबारी-सुअलकुची पुल असम के लिए एक महत्वपूर्ण अवसंरचना परियोजना है जो ब्रह्मपुत्र नदी के दोनों किनारों को जोड़ेगी। इस पुल के नाम पर मेधी की स्मृति को अंकित करना न केवल एक प्रतीकात्मक कदम है, बल्कि यह असम सरकार की उस नीति का भी हिस्सा है जिसके तहत राज्य के महान सपूतों को सार्वजनिक संरचनाओं के नाम से अमर किया जाता है।

गौरतलब है कि यह घोषणा ऐसे समय में आई है जब असम सरकार राज्य के ऐतिहासिक नायकों की विरासत को पुनर्जीवित करने के लिए कई कदम उठा रही है। इससे पहले भी राज्य में कई सार्वजनिक परियोजनाओं का नामकरण स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर किया गया है।

विभिन्न दलों ने दी श्रद्धांजलि

मुख्यमंत्री के अलावा विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं और आम नागरिकों ने भी बिष्णुराम मेधी को श्रद्धासुमन अर्पित किए। सभी ने एकमत से उनके जनकल्याण के प्रति समर्पण और राज्य के लिए एक सुदृढ़ नींव बनाने के उनके अथक प्रयासों को याद किया।

सीएम सरमा ने अंत में यह भी रेखांकित किया कि मेधी का जीवन और कार्य आज भी नीति-निर्माताओं और आम नागरिकों दोनों को समान रूप से प्रेरित करता है। उन्होंने असम की प्रगति और समृद्धि की दिशा में काम करते हुए मेधी के आदर्शों को बनाए रखने के प्रति सरकार की दृढ़ प्रतिबद्धता दोहराई।

आने वाले महीनों में पलाशबारी-सुअलकुची पुल के उद्घाटन के साथ यह देखना रोचक होगा कि असम सरकार अपने ऐतिहासिक नायकों की विरासत को किस प्रकार आधुनिक विकास परियोजनाओं के साथ जोड़ती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि असम की सत्तारूढ़ भाजपा सरकार की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसमें ऐतिहासिक कांग्रेसी नेताओं की विरासत को भी अपनाकर एक समावेशी राष्ट्रवादी छवि बनाई जाती है। मेधी कांग्रेस के नेता थे, फिर भी भाजपा सरकार द्वारा उनका सम्मान यह दर्शाता है कि असम में राजनीतिक विमर्श अब दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर 'असमिया अस्मिता' के इर्द-गिर्द केंद्रित हो रहा है। पुल जैसी बड़ी अवसंरचना परियोजना पर किसी ऐतिहासिक नेता का नाम जोड़ना सरकार को दीर्घकालिक राजनीतिक लाभ भी देता है — यह विकास और विरासत दोनों को एक साथ भुनाने की कुशल रणनीति है।
RashtraPress
27 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बिष्णुराम मेधी कौन थे और असम में उनका क्या योगदान था?
बिष्णुराम मेधी भारत के स्वतंत्रता सेनानी और असम के पूर्व मुख्यमंत्री थे जिन्होंने 1950 से 1957 तक राज्य की बागडोर संभाली। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद असम में शासन व्यवस्था को स्थिर करने और विकास की नींव रखने में अहम भूमिका निभाई।
हिमंत बिस्वा सरमा ने बिष्णुराम मेधी को श्रद्धांजलि क्यों दी?
24 अप्रैल को बिष्णुराम मेधी की पुण्यतिथि थी, जिस अवसर पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने उन्हें सोशल मीडिया के जरिए श्रद्धांजलि दी। सरमा ने उन्हें 'महान राजनेता' बताते हुए उनके योगदान को याद किया।
पलाशबारी-सुअलकुची पुल का नाम किसके नाम पर रखा जाएगा?
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने घोषणा की है कि आगामी पलाशबारी-सुअलकुची पुल का नाम पूर्व मुख्यमंत्री बिष्णुराम मेधी के नाम पर रखा जाएगा। यह पुल ब्रह्मपुत्र नदी के दोनों किनारों को जोड़ेगा।
बिष्णुराम मेधी ने असम के मुख्यमंत्री के रूप में कितने वर्ष कार्य किया?
बिष्णुराम मेधी ने 1950 से 1957 तक कुल सात वर्षों तक असम के मुख्यमंत्री पद पर कार्य किया। यह भारत की स्वतंत्रता के बाद का वह महत्वपूर्ण दौर था जब राज्यों की प्रशासनिक नींव रखी जा रही थी।
असम सरकार ऐतिहासिक नेताओं की विरासत को कैसे संरक्षित कर रही है?
असम सरकार सार्वजनिक अवसंरचना परियोजनाओं का नामकरण ऐतिहासिक नायकों के नाम पर करके उनकी विरासत को जीवित रख रही है। पलाशबारी-सुअलकुची पुल का नाम बिष्णुराम मेधी के नाम पर रखना इसी नीति का हिस्सा है।
राष्ट्र प्रेस
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