मद्रास हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: सेंथिल बालाजी के कार्यकाल में ₹397 करोड़ के ट्रांसफार्मर टेंडर घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपी
सारांश
Key Takeaways
- मद्रास उच्च न्यायालय ने 29 अप्रैल 2026 को ₹397 करोड़ के ट्रांसफार्मर टेंडर घोटाले की जांच CBI को सौंपी।
- जांच पूर्व मंत्री सेंथिल बालाजी के 2021-2023 के कार्यकाल से जुड़ी है।
- DVAC को सभी संबंधित रिकॉर्ड CBI को सौंपने और दो सप्ताह में जांच अधिकारी नियुक्त करने का आदेश।
- TANGEDCO और राज्य सरकार को CBI के साथ पूर्ण सहयोग का निर्देश दिया गया।
- अदालत ने राज्य सरकार के 'याचिकाएं राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं' वाले तर्क को स्पष्ट रूप से खारिज किया।
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम धारा 17A के तहत मंजूरी में देरी का मुद्दा भी याचिकाकर्ताओं ने उठाया था।
मद्रास उच्च न्यायालय ने बुधवार, 29 अप्रैल 2026 को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को तमिलनाडु के पूर्व विद्युत एवं निषेध और उत्पाद शुल्क मंत्री सेंथिल बालाजी के 2021 से 2023 के कार्यकाल के दौरान ट्रांसफार्मर टेंडर खरीद में कथित ₹397 करोड़ की अनियमितताओं की जांच करने का आदेश दिया। यह निर्देश मुख्य न्यायाधीश एसए धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने जारी किया, जिसमें स्वतंत्र एवं व्यापक जांच की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया।
मुख्य न्यायिक आदेश
खंडपीठ ने तमिलनाडु सतर्कता एवं भ्रष्टाचार-विरोधी निदेशालय (DVAC) को मामले से जुड़े सभी रिकॉर्ड CBI को सौंपने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच का नेतृत्व करने के लिए दो सप्ताह के भीतर एक अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए। पीठ ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर CBI द्वारा नए सिरे से जांच का आदेश दिया।
सरकारी संस्थाओं को सहयोग का निर्देश
अदालत ने तमिलनाडु राज्य सरकार, तमिलनाडु जनरेशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन (TANGEDCO) और DVAC को केंद्रीय एजेंसी के साथ पूर्ण सहयोग करने और सभी प्रासंगिक दस्तावेज शीघ्रता से सौंपने का निर्देश दिया। CBI को प्रभावी जांच करने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए ठोस कदम उठाने को कहा गया है। मामले में विस्तृत आदेश का अभी इंतजार है।
याचिकाकर्ताओं के आरोप और पृष्ठभूमि
अरप्पोर इयक्कम और विभिन्न राजनीतिक दलों से संबद्ध सदस्यों ने याचिकाएं दायर की थीं, जिनमें आरोप लगाया गया कि राज्य सरकार कथित घोटाले में शामिल लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली शिकायतों पर कार्रवाई करने में विफल रही। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि सरकार को बार-बार शिकायतें प्रस्तुत की गईं, परंतु कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत पूर्व मंत्री पर मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी देने में देरी हुई थी।
राज्य सरकार का पक्ष और अदालत की टिप्पणी
राज्य सरकार ने दावा किया कि धारा 17A के तहत मंजूरी पहले ही दी जा चुकी है। सरकार ने याचिकाओं का विरोध करते हुए तर्क दिया कि ये राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं और चुनाव से पहले प्रतिद्वंद्वी दलों से जुड़े व्यक्तियों द्वारा दायर की गई हैं, इसलिए सुनवाई योग्य नहीं हैं। हालाँकि, अदालत ने इस तर्क को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं की राजनीतिक संबद्धताओं के आधार पर गंभीर आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आगे क्या होगा
CBI को अब दो सप्ताह के भीतर जांच अधिकारी नियुक्त करना होगा और DVAC से सभी प्रारंभिक जांच सामग्री प्राप्त करनी होगी। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब तमिलनाडु में सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) सरकार पर विपक्ष का दबाव लगातार बढ़ रहा है। अदालत का यह फैसला राज्य की जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर उठ रहे सवालों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।