वित्त मंत्रालय की इको रिव्यू: भारत की घरेलू मांग और मजबूत वित्तीय प्रणाली वैश्विक संकट में बनी ढाल
सारांश
Key Takeaways
- वित्त मंत्रालय ने 29 अप्रैल को मासिक आर्थिक समीक्षा जारी की, जिसमें भारत को वैश्विक संकट से आंशिक सुरक्षा मिलने की बात कही गई।
- पश्चिम एशिया संघर्ष 28 फरवरी से जारी है; 60 दिन बाद भी समाधान के कोई संकेत नहीं।
- भारत में कच्चे तेल की कीमत मार्च में 113 डॉलर/बैरल और अप्रैल में 115 डॉलर/बैरल के करीब रही।
- आईएमएफ ने पूरे वर्ष के लिए तेल की कीमत 82 डॉलर/बैरल मानकर अनुमान लगाए — मौजूदा स्तर से काफी कम।
- एल नीनो (ईएनएसओ) के कारण इस बार मानसून सामान्य से कम रहने की आशंका, जिससे महंगाई और वित्तीय घाटे का जोखिम बढ़ सकता है।
- रिपोर्ट में ऊर्जा सुरक्षा, कृषि सुधार, नियामकीय सरलीकरण और एआई-प्रतिरोधी कौशल विकास पर जोर दिया गया।
वित्त मंत्रालय ने बुधवार, 29 अप्रैल को अपनी मासिक आर्थिक समीक्षा (इको रिव्यू) जारी की, जिसमें कहा गया है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है और महंगाई, व्यापार तथा वित्तीय प्रवाह के लिए जोखिम बढ़ते जा रहे हैं। हालाँकि, रिपोर्ट के अनुसार भारत की मजबूत घरेलू मांग, नीतिगत सुरक्षा उपाय, सुदृढ़ वित्तीय प्रणाली और निरंतर सार्वजनिक निवेश देश को इस वैश्विक उथल-पुथल से कुछ हद तक सुरक्षित रखे हुए हैं।
पश्चिम एशिया संघर्ष और वैश्विक असर
28 फरवरी से शुरू हुआ पश्चिम एशिया का संघर्ष समीक्षा जारी होने तक 60 दिन से अधिक समय बीत जाने के बावजूद समाप्त होता नहीं दिख रहा। आर्थिक समीक्षा के अनुसार, संघर्ष में शामिल देशों के बीच मतभेद गहरे बने हुए हैं और आपसी विश्वास की कमी के चलते वार्ता में कोई ठोस प्रगति नहीं हो पाई है। कुछ देशों ने बढ़ती ऊर्जा कीमतों का बोझ सीधे आम जनता और व्यवसायों पर डालना शुरू कर दिया है, जबकि अन्य देश अभी यह कदम उठाने से बच रहे हैं — लेकिन रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि यह स्थिति लंबे समय तक नहीं टिक सकती।
कच्चे तेल की कीमतें और आईएमएफ का अनुमान
भारत में कच्चे तेल की औसत कीमत मार्च में 113 डॉलर प्रति बैरल और अप्रैल में 115 डॉलर प्रति बैरल के करीब रही। वहीं, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने अप्रैल के दूसरे सप्ताह में जारी अपनी विश्व आर्थिक रिपोर्ट में पूरे वर्ष के लिए तेल की कीमत 82 डॉलर प्रति बैरल मानकर अनुमान लगाए हैं, जो मौजूदा वास्तविक स्तर से काफी कम है। रिपोर्ट में यह भी चेताया गया है कि वैश्विक आर्थिक विकास के अनुमान नीचे जाने का खतरा अधिक है, जबकि महंगाई बढ़ने का जोखिम ऊपर की ओर बना हुआ है।
मानसून और घरेलू जोखिम
इको रिव्यू में एल नीनो दक्षिणी दोलन (ईएनएसओ) के प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, इस बार भारत में मानसून सामान्य से कम रह सकता है और अधिकांश क्षेत्रों में वर्षा की कमी की संभावना है। यह स्थिति महंगाई, वित्तीय घाटे और बाहरी घाटे के जोखिम को और बढ़ा सकती है, साथ ही आर्थिक विकास की गति पर भी प्रतिकूल असर डाल सकती है। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर पहले से ही दबाव बना हुआ है।
सरकार की नीतिगत प्राथमिकताएँ
रिपोर्ट में कई नीतिगत सिफारिशें की गई हैं। ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने पर जोर देते हुए कहा गया है कि एक आयात पर निर्भरता कम करते हुए किसी दूसरे आयात पर अत्यधिक निर्भर नहीं होना चाहिए और अचानक आपूर्ति बाधा के जोखिम को कम किया जाना चाहिए। सार्वजनिक परिवहन के विकास को ऊर्जा सुरक्षा और शहरी जीवन-स्तर सुधार से जोड़ते हुए राज्यों के साथ समन्वय की आवश्यकता बताई गई है। इसके अलावा, नियामकीय सुधार, अनावश्यक कानूनों को हटाने और आयात-निर्यात को सुगम बनाने की भी सिफारिश की गई है।
कृषि और कौशल विकास पर ज़ोर
कृषि क्षेत्र में फसलों के गलत चयन को कम करने और उत्पादन बढ़ाने की जरूरत बताई गई है। रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि युवाओं को ऐसे कौशल सिखाए जाएँ जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के प्रभाव से सुरक्षित रहें, जिससे देश में रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे और निर्यात के नए द्वार खुलेंगे। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब वैश्विक श्रम बाज़ार में स्वचालन का दबाव तेज़ी से बढ़ रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना होगा कि भारत की ये नीतिगत ढालें वैश्विक दबावों के सामने कितनी टिकाऊ साबित होती हैं।