शहरीकरण से बनेगा विकसित भारत 2047: 16वें वित्त आयोग अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया
सारांश
मुख्य बातें
16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने 13 अगस्त 2025 को तिरुवनंतपुरम में स्पष्ट किया कि भारत के $30 ट्रिलियन की वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था बनने और 2047 तक विकसित राष्ट्र का दर्जा हासिल करने का सपना उत्पादक, सुदृढ़ और कुशल शहरों के बिना पूरा नहीं हो सकता। राजभवन द्वारा आयोजित 'लोक भवन कन्वर्सेशन' के छठे संस्करण में उन्होंने शहरीकरण को भारत के आर्थिक रूपांतरण का केंद्रीय स्तंभ बताया।
शहरीकरण क्यों है अनिवार्य
पनगढ़िया ने रेखांकित किया कि विश्व के लगभग हर विकसित देश में शहरीकरण का स्तर ऊँचा है। उन्होंने कहा कि भारत का शहरी विकास का समृद्ध इतिहास रहा है और देश को इस दिशा में आगे बढ़ने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए। उनके अनुसार, 'आर्थिक गतिविधियाँ शहरीकरण को गति देती हैं' — रोज़गार सृजन से ग्रामीण बस्तियाँ और बड़े शहरों के आसपास के क्षेत्र भी जीवंत शहरी केंद्रों में बदल सकते हैं।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शहरीकरण का उद्देश्य केवल मौजूदा शहरी निवासियों की जीवन-दशाएँ सुधारना नहीं है — शहरों को कारोबार और रोज़गार के अनुकूल बनाना होगा ताकि ग्रामीण क्षेत्रों से जनशक्ति का प्रवाह हो सके और नए अवसर पैदा हों।
भूमि अधिग्रहण: सबसे बड़ी बाधा
पनगढ़िया ने शहरी ज़मीन की कमी और उसकी ऊँची लागत को भारतीय शहरों में आर्थिक गतिविधियों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि औद्योगिक और व्यावसायिक परियोजनाओं के लिए बड़े भूखंड जुटाना अत्यंत कठिन है, क्योंकि ज़मीन का स्वामित्व बेहद बँटा हुआ है और स्पष्ट स्वामित्व दस्तावेज़ प्राय: उपलब्ध नहीं होते।
उन्होंने पश्चिम बंगाल के सिंगूर परियोजना का उदाहरण देते हुए बताया कि वहाँ हज़ारों अलग-अलग भूखंडों का अधिग्रहण करना पड़ा था। इसके विपरीत, अमेरिका जैसे देशों में बड़े प्रोजेक्ट के लिए भूमि स्वामित्व अपेक्षाकृत कम विखंडित है। उन्होंने उत्पादक आर्थिक गतिविधियों हेतु भूमि उपलब्धता सुगम बनाने और अधिग्रहण-संबंधी अड़चनें दूर करने के लिए ठोस सुधारों की ज़रूरत पर बल दिया।
शासन और समन्वय की दरकार
वित्त आयोग के अध्यक्ष ने मज़बूत नगरपालिका प्रशासन और शहरी विकास से जुड़ी विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता पर भी ज़ोर दिया। उनके अनुसार, शहरी शासन-व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो आर्थिक गतिविधियों, बुनियादी ढाँचे और रोज़गार सृजन को एक साथ समर्थन दे सके। शहरी नियोजन और भूमि-उपयोग नीतियों को नागरिकों की जीवन-दशाएँ सुधारने के साथ-साथ उद्यमिता को भी प्रोत्साहन देना चाहिए।
राज्यपाल की सांस्कृतिक दृष्टि
इस अवसर पर केरल के राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर ने कहा कि शहरीकरण को पश्चिमीकरण का पर्याय नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा, 'शहरीकरण की शुरुआत हमारी जड़ों से होनी चाहिए।' राज्यपाल ने ज़ोर दिया कि भारत का शहरी विकास पश्चिमी मॉडल की अंधी नकल के बजाय देश की अपनी संस्कृति, परंपराओं और विचार-प्रक्रियाओं से प्रेरित होना चाहिए और यह विकसित भारत के विज़न को साकार करने में निर्णायक योगदान देगा।
आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब भारत की शहरी जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही है और स्मार्ट सिटी मिशन जैसी योजनाओं के परिणामों पर बहस जारी है। गौरतलब है कि 16वाँ वित्त आयोग केंद्र और राज्यों के बीच संसाधन-वितरण की सिफारिशें करता है, इसलिए शहरी वित्त पोषण पर पनगढ़िया के विचार नीतिगत दिशा के संकेतक माने जा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भूमि सुधार और नगरपालिका वित्त को मज़बूत किए बिना शहरीकरण की संभावनाएँ सीमित रहेंगी।