30 सितंबर 2026
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आईआईटी कानपुर विकसित करेगा देश का पहला सीपीवी सन सिम्युलेटर, नेक्सपीवी एनर्जी से हुआ समझौता

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आईआईटी कानपुर विकसित करेगा देश का पहला सीपीवी सन सिम्युलेटर, नेक्सपीवी एनर्जी से हुआ समझौता

सारांश

भारत में पहली बार सीपीवी सौर मॉड्यूल का परीक्षण देश के भीतर ही हो सकेगा — आईआईटी कानपुर और नेक्सपीवी एनर्जी सिस्टम्स की साझेदारी से एक ऐसे सन सिम्युलेटर का निर्माण होगा जो अब तक भारत में उपलब्ध नहीं था। यह कदम सौर विनिर्माण में आत्मनिर्भरता की दिशा में अहम है।

मुख्य बातें

आईआईटी कानपुर और नेक्सपीवी एनर्जी सिस्टम्स मिलकर भारत का पहला कंसंट्रेटेड फोटोवोल्टिक (सीपीवी) सन सिम्युलेटर विकसित करेंगे।
परियोजना का नेतृत्व प्रोफेसर आशीष गर्ग , सस्टेनेबल एनर्जी इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी कानपुर कर रहे हैं।
टेक्नोपार्क@आईआईटीके की सदस्य कंपनी इनवेरिएंस ऑटोमेशन प्रोटोटाइप को उत्पादन-स्तरीय प्रणाली में बदलने की भूमिका निभाएगी।
सीपीवी सेल का क्षेत्रफल पैनल के मात्र 0.1 प्रतिशत तक होता है — पारंपरिक पैनलों की तुलना में भूमि उपयोग में ~99 प्रतिशत की कमी संभव।
अभी तक भारत में सीपीवी मॉड्यूल के लिए कोई स्वदेशी परीक्षण सुविधा उपलब्ध नहीं है; यह पहल उस अंतर को पाटेगी।
यह पहल भारत के 2070 नेट-जीरो लक्ष्य की दिशा में उन्नत सौर तकनीकों की घरेलू परीक्षण अवसंरचना बनाने का प्रयास है।

आईआईटी कानपुर ने 30 सितंबर 2026 को बेंगलुरु स्थित नेक्सपीवी एनर्जी सिस्टम्स के साथ एक महत्त्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत भारत का पहला कंसंट्रेटेड फोटोवोल्टिक (सीपीवी) सन सिम्युलेटर विकसित किया जाएगा। इस सुविधा के तैयार हो जाने पर सीपीवी सौर मॉड्यूल की उत्पादन-स्तरीय जांच और क्षमता का आकलन पहली बार देश के भीतर ही संभव हो सकेगा। उल्लेखनीय है कि अभी तक भारत में इस तरह की विशेष परीक्षण सुविधा उपलब्ध नहीं है।

परियोजना का स्वरूप और भागीदार

इस परियोजना का नेतृत्व आईआईटी कानपुर के सस्टेनेबल एनर्जी इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर आशीष गर्ग और उनकी टीम कर रही है। संस्थान के रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी पार्क फाउंडेशन (टेक्नोपार्क@आईआईटीके) की सदस्य कंपनी इनवेरिएंस ऑटोमेशन इस पहल में प्रमुख निर्माण भागीदार की भूमिका निभाएगी। परियोजना के अगले चरण में इनवेरिएंस ऑटोमेशन प्रारंभिक प्रोटोटाइप को उत्पादन-स्तरीय प्रणाली में परिवर्तित करने का कार्य संभालेगी।

सीपीवी तकनीक क्या है और यह क्यों अलग है

सीपीवी तकनीक में लेंस के माध्यम से सूर्य की रोशनी को छोटे और उच्च दक्षता वाले सौर सेल पर केंद्रित किया जाता है। इन सेल में अर्धचालक की कई परतें होती हैं, जिनमें से प्रत्येक सूर्य के प्रकाश के अलग-अलग स्पेक्ट्रम को अवशोषित करती है। नेक्सपीवी एनर्जी सिस्टम्स के अनुसार, इन सेल का क्षेत्रफल पैनल के मात्र लगभग 0.1 प्रतिशत तक होता है, जिससे पारंपरिक सौर पैनलों की तुलना में सेल के लिए आवश्यक भौतिक स्थान में करीब 99 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।

सामान्य सन सिम्युलेटर पारंपरिक सौर पैनलों के परीक्षण के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं। इसके विपरीत सीपीवी मॉड्यूल केवल सीधी और समानांतर सूर्यरोशनी में प्रभावी रूप से कार्य करते हैं। इनके परीक्षण में प्रकाश के विभिन्न स्पेक्ट्रल संतुलन और सीमित कोणों से आने वाली रोशनी का विशेष ध्यान रखना आवश्यक होता है — यही कारण है कि एक विशेष सिम्युलेटर की ज़रूरत पड़ती है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

प्रोफेसर आशीष गर्ग ने कहा कि वर्ष 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य हासिल करने के लिए देश में सौर ऊर्जा का बड़े पैमाने पर विस्तार जरूरी है। उन्होंने जोर दिया कि उत्पादन के साथ-साथ ऐसी परीक्षण सुविधाओं का विकास भी अनिवार्य है, जो नई तकनीकों की सटीक जांच और क्षमता आकलन कर सकें, क्योंकि सीपीवी मॉड्यूल सामान्य सौर पैनलों से भिन्न तरीके से कार्य करते हैं।

नेक्सपीवी एनर्जी सिस्टम्स के निदेशक चिदानंद मूर्ति आर. ने कहा कि भारत में सौर ऊर्जा क्षमता लगातार बढ़ रही है, लेकिन सौर सेल उत्पादन और मॉड्यूल उत्पादन के बीच का अंतर अभी भी एक बड़ी चुनौती है। उनके अनुसार सीपीवी तकनीक उन क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है जहाँ प्रत्यक्ष सूर्यरोशनी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।

आम जनता और उद्योग पर असर

यह पहल भारत की स्वच्छ ऊर्जा महत्त्वाकांक्षाओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचागत कदम है। अभी तक सीपीवी मॉड्यूल के परीक्षण के लिए भारतीय निर्माताओं को विदेश पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ती थी। स्वदेशी परीक्षण सुविधा से उत्पाद की गुणवत्ता जांच तेज, सस्ती और अधिक विश्वसनीय हो सकेगी।

गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार सौर विनिर्माण को प्रोत्साहन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजनाओं के ज़रिए गति देने की कोशिश कर रही है और घरेलू परीक्षण अवसंरचना की कमी एक बाधा के रूप में पहचानी जा रही है।

क्या होगा आगे

आईआईटी कानपुर के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा तकनीक को प्रयोगशाला से व्यावसायिक उत्पादन तक पहुँचाना और देश में ही उन्नत सौर तकनीकों के परीक्षण का बुनियादी ढाँचा तैयार करना है। इनवेरिएंस ऑटोमेशन द्वारा प्रोटोटाइप को उत्पादन-स्तरीय प्रणाली में विकसित किए जाने के बाद यह सुविधा देश के अन्य सीपीवी निर्माताओं के लिए भी सुलभ हो सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह प्रयोगशाला से उद्योग तक की खाई पाटने में सफल होगी — जो भारतीय शैक्षणिक-उद्योग साझेदारियों की पुरानी चुनौती रही है। सीपीवी तकनीक उच्च प्रत्यक्ष सूर्यरोशनी वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है, पर भारत के विविध जलवायु भूगोल में इसकी व्यापक तैनाती अभी अनिश्चित है। आईआईटी कानपुर जैसी संस्थाओं का उद्योग के साथ जुड़ाव सही दिशा में है, मगर परीक्षण अवसंरचना उपलब्ध होने से ही उत्पादन और बाज़ार अपनाने की गारंटी नहीं मिलती। नीति-समर्थन और बाज़ार प्रोत्साहन के बिना यह पहल एक अच्छा शोध-स्तरीय कदम भर रह सकती है।
RashtraPress
30 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सीपीवी सन सिम्युलेटर क्या है और यह क्यों ज़रूरी है?
सीपीवी (कंसंट्रेटेड फोटोवोल्टिक) सन सिम्युलेटर एक विशेष परीक्षण उपकरण है जो सीपीवी मॉड्यूल के वास्तविक संचालन की परिस्थितियों — सीधी, समानांतर सूर्यरोशनी और सटीक स्पेक्ट्रल संतुलन — को प्रयोगशाला में पुनः निर्मित करता है। सामान्य सन सिम्युलेटर इस काम के लिए उपयुक्त नहीं होते, इसलिए एक अलग प्रणाली की ज़रूरत है।
इस परियोजना में कौन-कौन सी संस्थाएँ शामिल हैं?
इस परियोजना में आईआईटी कानपुर के सस्टेनेबल एनर्जी इंजीनियरिंग विभाग के नेतृत्व में बेंगलुरु स्थित नेक्सपीवी एनर्जी सिस्टम्स और टेक्नोपार्क@आईआईटीके की सदस्य कंपनी इनवेरिएंस ऑटोमेशन शामिल हैं। प्रोफेसर आशीष गर्ग परियोजना के मुख्य अनुसंधान प्रमुख हैं।
सीपीवी तकनीक पारंपरिक सौर पैनलों से कैसे अलग है?
सीपीवी तकनीक में लेंस के ज़रिए सूर्यरोशनी को एक छोटे, बहु-परती अर्धचालक सेल पर केंद्रित किया जाता है। कंपनी के अनुसार इन सेल का क्षेत्रफल पैनल के मात्र लगभग 0.1 प्रतिशत होता है, जिससे भूमि उपयोग में करीब 99 प्रतिशत तक की बचत संभव है। यह तकनीक विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है जहाँ प्रत्यक्ष सूर्यरोशनी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो।
इस पहल से भारत के सौर ऊर्जा क्षेत्र को क्या फायदा होगा?
स्वदेशी सीपीवी परीक्षण सुविधा उपलब्ध होने से भारतीय निर्माताओं को मॉड्यूल जांच के लिए विदेश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा, जिससे समय और लागत दोनों में कमी आएगी। यह भारत के 2070 नेट-जीरो लक्ष्य की दिशा में उन्नत सौर तकनीकों की घरेलू परीक्षण अवसंरचना को मज़बूत करेगी।
इस परियोजना का अगला चरण क्या होगा?
परियोजना के अगले चरण में इनवेरिएंस ऑटोमेशन प्रारंभिक प्रोटोटाइप मॉडल को उत्पादन-स्तरीय प्रणाली में विकसित करने का कार्य संभालेगी। आईआईटी कानपुर का उद्देश्य इस तकनीक को प्रयोगशाला से व्यावसायिक उत्पादन के स्तर तक पहुँचाना है।
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