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भारत की मदद से कंबोडिया के काओ पाओ गांव को मिली 1,97,810 वर्ग मीटर बारूदी सुरंग-मुक्त जमीन

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भारत की मदद से कंबोडिया के काओ पाओ गांव को मिली 1,97,810 वर्ग मीटर बारूदी सुरंग-मुक्त जमीन

सारांश

भारत की मेकांग-गंगा सहयोग QIP योजना के तहत कंबोडिया के काओ पाओ गांव को 1,97,810 वर्ग मीटर बारूदी सुरंग-मुक्त जमीन लौटाई गई। दशकों के खतरे के बाद 134 परिवारों को खेती और आवास के लिए सुरक्षित ज़मीन मिली — यह भारत की 'एक्ट ईस्ट' कूटनीति का एक ठोस मानवीय उदाहरण है।

मुख्य बातें

भारत सरकार की मेकांग-गंगा सहयोग QIP योजना के तहत कंबोडिया के काओ पाओ गांव को 1,97,810 वर्ग मीटर बारूदी सुरंग-मुक्त जमीन सौंपी गई।
इस जमीन से 134 परिवारों को खेती, आवास और रोज़गार का लाभ मिलेगा।
कार्यक्रम में भारतीय दूतावास की डीसीएम डॉ.
तनु प्रिया , CMAA के टेप कल्याण और कोह कोंग के डिप्टी गवर्नर वाई.
भारत 1990 के दशक से कंबोडिया को माइन क्लियरेंस, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता दे रहा है।
दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2025-26 में 36% से अधिक बढ़कर 40.678 करोड़ डॉलर पहुँचा।

भारत सरकार की मेकांग-गंगा सहयोग क्विक इम्पैक्ट प्रोजेक्ट (QIP) योजना के तहत बारूदी सुरंगों और बिना फटे गोला-बारूद से साफ की गई 1,97,810 वर्ग मीटर जमीन 4 अक्टूबर 2026 को कंबोडिया के कोह कोंग प्रांत के काओ पाओ गांव के लोगों को आधिकारिक रूप से सौंप दी गई। इस जमीन से करीब 134 परिवारों को सीधा फायदा मिलेगा, जो अब इसका उपयोग खेती, आवास निर्माण और रोज़गार के लिए कर सकेंगे।

भूमि हस्तांतरण कार्यक्रम

इस ऐतिहासिक अवसर पर एक विशेष समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें कंबोडिया में भारतीय दूतावास की डिप्टी चीफ ऑफ मिशन डॉ. तनु प्रिया, कोह कोंग प्रांत के डिप्टी गवर्नर वाई. नियरिनेट और कंबोडिया माइन एक्शन एंड विक्टिम असिस्टेंस अथॉरिटी (CMAA) के डिप्टी सेक्रेटरी जनरल टेप कल्याण उपस्थित रहे।

भारतीय दूतावास ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी पोस्ट में लिखा कि डीसीएम डॉ. तनु प्रिया, CMAA के डीएसजी टेप कल्याण और कोह कोंग प्रांत के डिप्टी गवर्नर की उपस्थिति में मेकांग-गंगा सहयोग क्विक इम्पैक्ट प्रोजेक्ट के तहत साफ की गई जमीन को समुदाय को वापस सौंपा गया।

आम जनता पर असर

दूतावास के बयान के अनुसार, इस भूमि हस्तांतरण से काओ पाओ गांव के 134 परिवारों को आजीविका, खेती, आवास और अन्य सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों के लिए सुरक्षित ज़मीन मिलेगी। दशकों से बारूदी सुरंगों के खतरे के कारण यह जमीन बेकार पड़ी थी और ग्रामीण इसका उपयोग करने से डरते थे।

द नोम पेन्ह पोस्ट के अनुसार, साफ की गई जमीन का कुल क्षेत्रफल 1,97,810 वर्ग मीटर है — जो इस क्षेत्र में अब तक की सबसे बड़ी एकल भूमि-निष्क्रियीकरण परियोजनाओं में से एक मानी जा रही है।

भारत-कंबोडिया बारूदी सुरंग सहयोग की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि भारत ने 1990 के दशक की शुरुआत से ही कंबोडिया के साथ बारूदी सुरंग निष्क्रियीकरण के मानवीय प्रयासों में सक्रिय भागीदारी निभाई है। इस सहयोग में क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता, बारूदी सुरंग हटाने के उपकरण, माइन डिटेक्शन डॉग और सुरंग पीड़ितों को सहायता प्रदान करना शामिल रहा है।

यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' के तहत दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ संबंध और गहरे कर रहा है। बारूदी सुरंग निष्क्रियीकरण जैसे मानवीय कार्यक्रम इस कूटनीतिक रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

भारत-कंबोडिया व्यापार में भी उल्लेखनीय वृद्धि

इससे पहले 24 अगस्त को भारत और कंबोडिया ने नोम पेन्ह में आयोजित व्यापार एवं निवेश पर संयुक्त कार्य समूह की तीसरी बैठक में पारंपरिक चिकित्सा, ई-गवर्नेंस, भारतीय फार्माकोपिया को मान्यता और डिजिटल भुगतान प्रणाली को मज़बूत बनाने पर विस्तृत चर्चा की थी।

आँकड़ों के अनुसार, दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार में 36 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है और यह 2025-26 में 40.678 करोड़ डॉलर तक पहुँच गया है।

क्या होगा आगे

मेकांग-गंगा सहयोग ढाँचे के तहत भारत के और भी QIP प्रोजेक्ट कंबोडिया सहित अन्य मेकांग क्षेत्र के देशों में चल रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की ज़मीनी स्तर की मानवीय परियोजनाएँ भारत की 'सॉफ्ट पावर' कूटनीति को दीर्घकालिक रूप से मज़बूत करती हैं और क्षेत्रीय विश्वास निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसे केवल परोपकार के रूप में देखना अधूरा होगा — यह भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' की उस रणनीतिक परत को दर्शाता है जहाँ सॉफ्ट पावर को ज़मीनी असर से मापा जाता है। 1990 के दशक से चले आ रहे इस सहयोग की तुलना में चीन के बेल्ट एंड रोड निवेश से कंबोडिया में भारत की स्थिति कमज़ोर मानी जाती रही है, इसलिए QIP जैसी छोटी परंतु दृश्यमान परियोजनाएँ उस अंतर को पाटने की कोशिश करती हैं। असली कसौटी यह है कि क्या ये प्रयास निरंतर, व्यापक और दीर्घकालिक कूटनीतिक विश्वास में तब्दील होते हैं — या फिर ये प्रतीकात्मक मील के पत्थर बनकर रह जाते हैं।
RashtraPress
4 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत की QIP योजना के तहत कंबोडिया को क्या मिला?
भारत सरकार की मेकांग-गंगा सहयोग क्विक इम्पैक्ट प्रोजेक्ट (QIP) के तहत कंबोडिया के कोह कोंग प्रांत के काओ पाओ गांव को 1,97,810 वर्ग मीटर बारूदी सुरंग और बिना फटे गोला-बारूद से साफ की गई जमीन सौंपी गई। इससे करीब 134 परिवारों को खेती, आवास और आजीविका के लिए सुरक्षित भूमि उपलब्ध होगी।
इस भूमि हस्तांतरण से काओ पाओ गांव के लोगों को क्या फायदा होगा?
दशकों से बारूदी सुरंगों के खतरे के कारण बेकार पड़ी इस जमीन पर अब 134 परिवार खेती कर सकेंगे, घर बना सकेंगे और रोज़गार के अवसर तलाश सकेंगे। भारतीय दूतावास के अनुसार, यह समुदाय को सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों के लिए सुरक्षित पहुँच देगा।
कंबोडिया के माइन क्लियरेंस में भारत कब से मदद कर रहा है?
भारत 1990 के दशक की शुरुआत से ही कंबोडिया को बारूदी सुरंग निष्क्रियीकरण में सहायता दे रहा है। इस सहयोग में प्रशिक्षण, तकनीकी मदद, उपकरण, माइन डिटेक्शन डॉग और सुरंग पीड़ितों को सहायता शामिल है।
मेकांग-गंगा सहयोग QIP योजना क्या है?
मेकांग-गंगा सहयोग (MGC) भारत और पाँच दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों — कंबोडिया, लाओस, म्यांमार, थाईलैंड और वियतनाम — के बीच एक बहुपक्षीय पहल है। इसके तहत क्विक इम्पैक्ट प्रोजेक्ट (QIP) छोटे पर ठोस असर वाली मानवीय और विकास परियोजनाओं को वित्त पोषित करती है।
भारत और कंबोडिया के बीच व्यापार की स्थिति क्या है?
आँकड़ों के अनुसार, दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2025-26 में 36 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 40.678 करोड़ डॉलर तक पहुँच गया है। 24 अगस्त को नोम पेन्ह में हुई जॉइंट वर्किंग ग्रुप की तीसरी बैठक में ई-गवर्नेंस, डिजिटल भुगतान और पारंपरिक चिकित्सा सहयोग पर भी चर्चा हुई थी।
राष्ट्र प्रेस
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