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भारत का ग्रीन हाइड्रोजन मिशन वैश्विक मंच पर, जापान-जर्मनी साझेदारी पर नीदरलैंड की TNO संस्था का बड़ा बयान

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भारत का ग्रीन हाइड्रोजन मिशन वैश्विक मंच पर, जापान-जर्मनी साझेदारी पर नीदरलैंड की TNO संस्था का बड़ा बयान

सारांश

नीदरलैंड की रिसर्च संस्था TNO का कहना है कि भारत का नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन नीतिगत स्पष्टता और औद्योगिक एक्शन दोनों के मामले में असाधारण है। जापान-जर्मनी के साथ साझेदारी और PEM तकनीक के स्केल-अप से भारत हाइड्रोजन डेरिवेटिव्स का वैश्विक निर्यात केंद्र बन सकता है।

मुख्य बातें

TNO (नीदरलैंड) के वरिष्ठ सलाहकार राजेश मेहता ने 25 सितंबर 2026 को भारत के नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन की नीतिगत संरचना की सराहना की।
भारत में PEM, अल्कलाइन और सॉलिड ऑक्साइड तकनीकों का तेज़ स्केल-अप जारी है।
भारत जापान और जर्मनी सहित यूरोपीय देशों के साथ हाइड्रोजन निर्यात साझेदारी बना रहा है।
TNO भारत में इंडस्ट्रियल प्लेयर्स और टियर-वन रिसर्च संस्थाओं के साथ सहयोग के अवसर तलाश रही है।
मेहता के अनुसार भारत हाइड्रोजन डेरिवेटिव्स का ग्लोबल हब बनने की पूरी क्षमता रखता है।

भारत का नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन अब वैश्विक स्तर पर अनुसंधान समुदाय और उद्योग जगत का ध्यान आकर्षित कर रहा है। नीदरलैंड की प्रतिष्ठित एप्लाइड रिसर्च संस्था TNO के वरिष्ठ सलाहकार एवं भारत प्रतिनिधि राजेश मेहता ने 25 सितंबर 2026 को कहा कि भारत न केवल ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन, बल्कि हाइड्रोजन डेरिवेटिव्स के वैश्विक केंद्र के रूप में उभरने की भरपूर क्षमता रखता है। जापान और जर्मनी सहित यूरोपीय देशों के साथ भारत की बढ़ती साझेदारी को उन्होंने एक रिसर्च संस्था के नज़रिए से 'अत्यंत रोमांचक' बताया।

मिशन की नीतिगत मज़बूती

राजेश मेहता ने कहा कि नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के अंतर्गत जिस तरह से नीति, वैल्यू चेन और रिफाइनरी टेंडर्स को समन्वित ढंग से तैयार किया गया है, वह उनके लिए 'आँखें खोलने वाला' अनुभव रहा है। उन्होंने कहा, 'पॉलिसी ने पूरी वैल्यू चेन और इंडस्ट्रियल सेक्टर्स को ड्राइव किया और रिफाइनरी टेंडर्स लॉन्च किए गए — इन विषयों पर भारत में न सिर्फ उत्साह है, बल्कि इंडस्ट्रियल प्लेयर्स की तरफ से असल एक्शन भी दिख रहा है।'

यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर कई देश ऊर्जा सुरक्षा के लिए हाइड्रोजन को भविष्य के ईंधन के रूप में देख रहे हैं और भारत इस दौड़ में नीतिगत स्पष्टता के साथ आगे बढ़ रहा है।

प्रौद्योगिकी स्केल-अप का अवसर

मेहता ने बताया कि PEM (प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन) टेक्नोलॉजी, अल्कलाइन इलेक्ट्रोलाइज़र और सॉलिड ऑक्साइड जैसी उन्नत तकनीकों का भारत में तेज़ी से स्केल-अप हो रहा है। उनके अनुसार यह भारत के लिए एक बड़ा औद्योगिक अवसर है — न सिर्फ घरेलू ज़रूरतों के लिए, बल्कि हाइड्रोजन डेरिवेटिव्स के निर्यात के लिए भी। पावर-टू-एक्स (Power-to-X) डोमेन में भारत में सीखने और नवाचार की गति उल्लेखनीय रूप से तेज़ बताई जा रही है।

जापान-जर्मनी के साथ वैश्विक साझेदारी

मेहता ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि जापान और जर्मनी सहित यूरोपीय देशों के साथ भारत सक्रिय रूप से हाइड्रोजन साझेदारी स्थापित कर रहा है। निर्यात अवसरों पर भारत की बढ़ती प्राथमिकता को उन्होंने वैश्विक ऊर्जा संक्रमण में भारत की रणनीतिक स्थिति के रूप में देखा। गौरतलब है कि जापान 2050 तक कार्बन-तटस्थता का लक्ष्य रखता है और जर्मनी यूरोपीय हाइड्रोजन आयात के सबसे बड़े संभावित बाज़ारों में से एक है।

TNO की भारत में साझेदारी की योजना

TNO ने संकेत दिया है कि वह भारत में समान विचारधारा वाले भागीदारों — चाहे वे औद्योगिक कंपनियाँ हों, टियर-वन अनुसंधान संस्थाएँ हों या उभरती हाइड्रोजन वैल्यू चेन हों — के साथ सहयोग के अवसर तलाश रही है। मेहता ने कहा कि एक यूरोपीय रिसर्च इंस्टीट्यूट के रूप में TNO के लिए भारत का बाज़ार और अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र दोनों ही महत्त्वपूर्ण हैं।

आने वाले समय में भारत-यूरोप हाइड्रोजन सहयोग और औद्योगिक साझेदारियाँ और गहरी होने की उम्मीद है, क्योंकि भारत अपने ग्रीन एनर्जी लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी अभी बाकी है। रिफाइनरी टेंडर्स और नीतिगत ढाँचे की प्रशंसा करना एक बात है, और वास्तविक निवेश तथा निर्यात अनुबंधों का मूर्त रूप लेना बिल्कुल अलग। भारत की ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन लागत अभी भी वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिहाज़ से ऊँची है, जो जापान और जर्मनी को दीर्घकालिक आपूर्तिकर्ता बनाने की राह में सबसे बड़ी बाधा है। साझेदारी की घोषणाएँ अच्छी सुर्खियाँ बनाती हैं, पर जब तक लागत-समता और बुनियादी ढाँचे पर ठोस प्रगति नहीं होती, 'ग्लोबल हब' का दर्जा एक महत्त्वाकांक्षा ही रहेगा।
RashtraPress
26 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत का नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन क्या है?
नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन भारत सरकार की एक प्रमुख योजना है जिसका उद्देश्य भारत को ग्रीन हाइड्रोजन और हाइड्रोजन डेरिवेटिव्स के उत्पादन व निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है। इसके तहत नीति निर्माण, वैल्यू चेन विकास और रिफाइनरी टेंडर्स जारी किए गए हैं।
TNO कौन सी संस्था है और भारत से उसका क्या संबंध है?
TNO (टीएनओ) नीदरलैंड की एक प्रमुख एप्लाइड रिसर्च ऑर्गनाइजेशन है जो पावर-टू-एक्स डोमेन और ग्रीन हाइड्रोजन पर शोध करती है। यह यूरोप की अग्रणी रिसर्च संस्थाओं में से एक है और भारत में इंडस्ट्रियल व रिसर्च साझेदारियाँ तलाश रही है।
भारत जापान और जर्मनी के साथ हाइड्रोजन साझेदारी क्यों कर रहा है?
जापान और जर्मनी दोनों ही देश 2050 तक कार्बन-तटस्थता के लक्ष्य के साथ बड़े पैमाने पर ग्रीन हाइड्रोजन आयात करना चाहते हैं। भारत अपनी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का लाभ उठाकर इन देशों को हाइड्रोजन और हाइड्रोजन डेरिवेटिव्स का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बनना चाहता है।
PEM और अल्कलाइन टेक्नोलॉजी का भारत में क्या महत्त्व है?
PEM (प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन), अल्कलाइन और सॉलिड ऑक्साइड इलेक्ट्रोलाइज़र वे प्रमुख तकनीकें हैं जिनसे ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन होता है। इनका तेज़ स्केल-अप भारत की उत्पादन लागत घटाने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए ज़रूरी है।
भारत के ग्रीन हाइड्रोजन मिशन से किसे फायदा होगा?
भारतीय रिफाइनरी उद्योग, नवीकरणीय ऊर्जा कंपनियाँ, इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माता और हाइड्रोजन डेरिवेटिव्स (जैसे अमोनिया, मेथनॉल) निर्यातक सबसे अधिक लाभान्वित होंगे। साथ ही TNO जैसी विदेशी रिसर्च संस्थाओं और जापान-जर्मनी जैसे आयातक देशों को भी दीर्घकालिक लाभ मिलेगा।
राष्ट्र प्रेस
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