अंतरिक्ष में हथियारों पर प्रतिबंध: भारत ने UN में कानूनी बाध्यकारी संधि की वकालत की
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र में राज्यसभा सदस्य सुधा मूर्ति ने 21 अक्टूबर 2026 को अंतरिक्ष के बढ़ते सैन्यीकरण पर गंभीर चिंता जताते हुए स्पष्ट किया कि भारत बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती रोकने के लिए एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि चाहता है। उन्होंने कहा कि यह संधि सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य, सत्यापन योग्य और बहुपक्षीय बातचीत से तय की जानी चाहिए।
भारत का स्पष्ट रुख
सुधा मूर्ति ने कहा, 'भारत एक कानूनी रूप से बाध्यकारी दस्तावेज को तरजीह देता है, जो सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य हो, सत्यापन योग्य हो और बहुपक्षीय बातचीत से तय किया गया हो।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गैर-बाध्यकारी मानदंड और पारदर्शिता उपाय इस संधि के पूरक हो सकते हैं, उसका विकल्प नहीं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि बाहरी अंतरिक्ष की सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए खतरों, गलतफहमियों और गलत आकलन के जोखिम — तथा अंतरिक्ष में बल प्रयोग की परिभाषा — इन सभी पहलुओं पर एक साथ विचार होना अनिवार्य है। उनके शब्दों में, 'कुछ खतरों पर चुनिंदा ध्यान देना और दूसरों को नज़रअंदाज़ करना उल्टा असर डालेगा।'
वार्ता का मंच और मसौदा संधि
भारत ने प्रस्ताव किया है कि इस संधि पर बातचीत के लिए उपयुक्त मंच जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण सम्मेलन (Conference on Disarmament) होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि चीन और रूस द्वारा 2008 में प्रस्तुत किए गए मसौदे — जिसे 'बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती रोकने की संधि' कहा जाता था — को आगे की चर्चा के लिए एक आधार दस्तावेज के रूप में देखा जा सकता है।
गौरतलब है कि उस 2008 के मसौदे का अमेरिका ने मुख्य रूप से यह कहते हुए विरोध किया था कि वह अस्पष्ट है, पृथ्वी-आधारित एंटी-सैटेलाइट प्रणालियों से उत्पन्न खतरों को संबोधित नहीं करता, और उसकी सत्यापन प्रणाली अपर्याप्त है।
अमेरिका का चौंकाने वाला खुलासा
इस पूरी बहस को और प्रासंगिक बनाता है अमेरिकी वायु सेना सचिव ट्रॉय मिंक का हालिया बयान। अक्टूबर की शुरुआत में मिंक ने स्वीकार किया कि अमेरिका ने कक्षा में अंतरिक्ष नियंत्रण हथियार (space control weapons) तैनात किए हैं, हालांकि उन्होंने उनकी प्रकृति के बारे में कोई विवरण नहीं दिया। यह स्वीकारोक्ति अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ की आशंकाओं को हकीकत का आधार देती है।
यह ऐसे समय में आया है जब 2024 में अमेरिका और जापान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अंतरिक्ष में परमाणु हथियारों को रोकने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन रूस ने उसे वीटो कर दिया था।
दोहरे उपयोग वाली तकनीक की चुनौती
सुधा मूर्ति ने स्वीकार किया कि दोहरे उपयोग वाली अंतरिक्ष तकनीकें और संपत्तियाँ अब एक 'वास्तविकता' हैं। यह वह जटिलता है जो किसी भी संधि की परिभाषा और सत्यापन को कठिन बनाती है — एक ही उपग्रह नागरिक और सैन्य, दोनों उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल हो सकता है।
उन्होंने रेखांकित किया कि अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकने के तरीकों और प्राथमिकताओं को लेकर वैश्विक स्तर पर मतभेद बना हुआ है, और इसी वजह से एक व्यापक बाध्यकारी ढाँचे की ज़रूरत और तीव्र हो जाती है।
आगे की राह
भारत की यह स्थिति वैश्विक अंतरिक्ष शासन पर चल रही व्यापक बहस में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। यदि जिनेवा निरस्त्रीकरण सम्मेलन में बातचीत आगे बढ़ती है, तो यह अंतरिक्ष में स्थिरता के लिए पहला ठोस बहुपक्षीय कदम हो सकता है।