21 अक्टूबर 2026
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अंतरिक्ष में हथियारों पर प्रतिबंध: भारत ने UN में कानूनी बाध्यकारी संधि की वकालत की

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अंतरिक्ष में हथियारों पर प्रतिबंध: भारत ने UN में कानूनी बाध्यकारी संधि की वकालत की

सारांश

अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ अब कल्पना नहीं — अमेरिका ने कक्षा में हथियार तैनात करना स्वीकार किया है। इस पृष्ठभूमि में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कानूनी बाध्यकारी संधि की दृढ़ माँग रखी है। राज्यसभा सदस्य सुधा मूर्ति ने स्पष्ट किया — गैर-बाध्यकारी उपाय विकल्प नहीं, सिर्फ पूरक हो सकते हैं।

मुख्य बातें

राज्यसभा सदस्य सुधा मूर्ति ने 21 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र में अंतरिक्ष हथियारों पर कानूनी बाध्यकारी संधि की माँग रखी।
भारत ने जिनेवा निरस्त्रीकरण सम्मेलन को वार्ता का उचित मंच बताया।
अमेरिकी वायु सेना सचिव ट्रॉय मिंक ने स्वीकार किया कि अमेरिका ने कक्षा में अंतरिक्ष नियंत्रण हथियार तैनात किए हैं।
चीन-रूस के 2008 के मसौदे को भारत ने आगे की चर्चा का आधार दस्तावेज माना।
2024 में रूस ने सुरक्षा परिषद में अंतरिक्ष परमाणु हथियार प्रतिबंध प्रस्ताव को वीटो किया था।
भारत ने गैर-बाध्यकारी मानदंडों को संधि का विकल्प नहीं, पूरक बताया।

संयुक्त राष्ट्र में राज्यसभा सदस्य सुधा मूर्ति ने 21 अक्टूबर 2026 को अंतरिक्ष के बढ़ते सैन्यीकरण पर गंभीर चिंता जताते हुए स्पष्ट किया कि भारत बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती रोकने के लिए एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि चाहता है। उन्होंने कहा कि यह संधि सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य, सत्यापन योग्य और बहुपक्षीय बातचीत से तय की जानी चाहिए।

भारत का स्पष्ट रुख

सुधा मूर्ति ने कहा, 'भारत एक कानूनी रूप से बाध्यकारी दस्तावेज को तरजीह देता है, जो सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य हो, सत्यापन योग्य हो और बहुपक्षीय बातचीत से तय किया गया हो।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गैर-बाध्यकारी मानदंड और पारदर्शिता उपाय इस संधि के पूरक हो सकते हैं, उसका विकल्प नहीं।

उन्होंने जोर देकर कहा कि बाहरी अंतरिक्ष की सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए खतरों, गलतफहमियों और गलत आकलन के जोखिम — तथा अंतरिक्ष में बल प्रयोग की परिभाषा — इन सभी पहलुओं पर एक साथ विचार होना अनिवार्य है। उनके शब्दों में, 'कुछ खतरों पर चुनिंदा ध्यान देना और दूसरों को नज़रअंदाज़ करना उल्टा असर डालेगा।'

वार्ता का मंच और मसौदा संधि

भारत ने प्रस्ताव किया है कि इस संधि पर बातचीत के लिए उपयुक्त मंच जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण सम्मेलन (Conference on Disarmament) होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि चीन और रूस द्वारा 2008 में प्रस्तुत किए गए मसौदे — जिसे 'बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती रोकने की संधि' कहा जाता था — को आगे की चर्चा के लिए एक आधार दस्तावेज के रूप में देखा जा सकता है।

गौरतलब है कि उस 2008 के मसौदे का अमेरिका ने मुख्य रूप से यह कहते हुए विरोध किया था कि वह अस्पष्ट है, पृथ्वी-आधारित एंटी-सैटेलाइट प्रणालियों से उत्पन्न खतरों को संबोधित नहीं करता, और उसकी सत्यापन प्रणाली अपर्याप्त है।

अमेरिका का चौंकाने वाला खुलासा

इस पूरी बहस को और प्रासंगिक बनाता है अमेरिकी वायु सेना सचिव ट्रॉय मिंक का हालिया बयान। अक्टूबर की शुरुआत में मिंक ने स्वीकार किया कि अमेरिका ने कक्षा में अंतरिक्ष नियंत्रण हथियार (space control weapons) तैनात किए हैं, हालांकि उन्होंने उनकी प्रकृति के बारे में कोई विवरण नहीं दिया। यह स्वीकारोक्ति अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ की आशंकाओं को हकीकत का आधार देती है।

यह ऐसे समय में आया है जब 2024 में अमेरिका और जापान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अंतरिक्ष में परमाणु हथियारों को रोकने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन रूस ने उसे वीटो कर दिया था।

दोहरे उपयोग वाली तकनीक की चुनौती

सुधा मूर्ति ने स्वीकार किया कि दोहरे उपयोग वाली अंतरिक्ष तकनीकें और संपत्तियाँ अब एक 'वास्तविकता' हैं। यह वह जटिलता है जो किसी भी संधि की परिभाषा और सत्यापन को कठिन बनाती है — एक ही उपग्रह नागरिक और सैन्य, दोनों उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल हो सकता है।

उन्होंने रेखांकित किया कि अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकने के तरीकों और प्राथमिकताओं को लेकर वैश्विक स्तर पर मतभेद बना हुआ है, और इसी वजह से एक व्यापक बाध्यकारी ढाँचे की ज़रूरत और तीव्र हो जाती है।

आगे की राह

भारत की यह स्थिति वैश्विक अंतरिक्ष शासन पर चल रही व्यापक बहस में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। यदि जिनेवा निरस्त्रीकरण सम्मेलन में बातचीत आगे बढ़ती है, तो यह अंतरिक्ष में स्थिरता के लिए पहला ठोस बहुपक्षीय कदम हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

न चीन-रूस के पुराने मसौदे को आँख मूँदकर स्वीकार करता है। लेकिन असली सवाल यह है कि जब अमेरिका कक्षा में हथियार तैनात कर चुका है और रूस सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव वीटो कर चुका है, तो जिनेवा मंच पर बाध्यकारी संधि की राह कितनी व्यावहारिक है? दोहरे उपयोग वाली तकनीक की अस्पष्टता किसी भी सत्यापन तंत्र को कमज़ोर कर सकती है। भारत की वकालत सराहनीय है, पर बिना बड़ी शक्तियों की सहमति के यह एक नैतिक स्थिति बनकर रह जाने का जोखिम उठाती है।
RashtraPress
21 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत अंतरिक्ष हथियारों पर क्या संधि चाहता है?
भारत एक कानूनी रूप से बाध्यकारी, सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य और सत्यापन योग्य अंतरराष्ट्रीय संधि चाहता है जो बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती पर रोक लगाए। राज्यसभा सदस्य सुधा मूर्ति ने 21 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र में यह माँग रखी।
सुधा मूर्ति ने UN में यह बयान क्यों दिया?
अंतरिक्ष के बढ़ते सैन्यीकरण और अमेरिका द्वारा कक्षा में हथियार तैनात करने की स्वीकारोक्ति की पृष्ठभूमि में भारत ने यह स्थिति स्पष्ट की। सुधा मूर्ति ने कहा कि दोहरे उपयोग वाली अंतरिक्ष तकनीकें अब एक वास्तविकता हैं और इस पर तत्काल कार्रवाई ज़रूरी है।
2008 की अंतरिक्ष हथियार संधि का मसौदा क्या था और उसका क्या हुआ?
चीन और रूस ने 2008 में 'बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती रोकने की संधि' का मसौदा प्रस्तुत किया था। अमेरिका ने इसे यह कहते हुए अस्वीकार किया कि यह अस्पष्ट है, पृथ्वी-आधारित एंटी-सैटेलाइट प्रणालियों को संबोधित नहीं करता और इसकी सत्यापन प्रणाली कमज़ोर है।
अमेरिका ने अंतरिक्ष में हथियार तैनात करने की बात कब मानी?
अमेरिकी वायु सेना सचिव ट्रॉय मिंक ने अक्टूबर 2026 की शुरुआत में स्वीकार किया कि अमेरिका ने कक्षा में अंतरिक्ष नियंत्रण हथियार तैनात किए हैं, हालांकि उन्होंने हथियारों की प्रकृति के बारे में कोई विवरण नहीं दिया।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अंतरिक्ष परमाणु हथियार प्रस्ताव का क्या हुआ?
अमेरिका और जापान ने 2024 में सुरक्षा परिषद में अंतरिक्ष में परमाणु हथियारों को रोकने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन रूस ने इसे वीटो कर दिया। यह घटना दर्शाती है कि वैश्विक स्तर पर इस मुद्दे पर आम सहमति बनाना कितना कठिन है।
राष्ट्र प्रेस
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