आईएनएसवी कौण्डिन्य का सफर: भारत-ओमान ने संयुक्त राष्ट्र में उजागर की हिंद महासागर की साझा समुद्री विरासत

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आईएनएसवी कौण्डिन्य का सफर: भारत-ओमान ने संयुक्त राष्ट्र में उजागर की हिंद महासागर की साझा समुद्री विरासत

सारांश

आईएनएसवी कौण्डिन्य — 1,500 साल पुरानी सिले-तख्ते तकनीक से बना भारतीय नौसेना का जलयान — संयुक्त राष्ट्र के मंच पर पहुँचा। भारत और ओमान ने न्यूयॉर्क में मिलकर यह दिखाया कि हिंद महासागर की साझी समुद्री सभ्यता सिर्फ इतिहास नहीं, आज की कूटनीति की भी बुनियाद है।

मुख्य बातें

16 मई 2026 को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र में भारत और ओमान ने संयुक्त रूप से 'प्राचीन व्यापार मार्ग: आईएनएसवी कौण्डिन्य का सफर' कार्यक्रम आयोजित किया।
आईएनएसवी कौण्डिन्य भारतीय नौसेना का वह पोत है जो 1,500 वर्ष पुरानी 'सिले हुए तख्तों' की पारंपरिक तकनीक से निर्मित है — बिना आधुनिक कील या इंजन के।
इस जलयान ने हिंद महासागर के प्राचीन व्यापार मार्गों को पुनः रेखांकित किया, जो भारत को अरब प्रायद्वीप और पूर्वी अफ्रीका से जोड़ते थे।
ओमान के 'ज्वेल ऑफ मस्कट' ने 2010 में ओमान से सिंगापुर तक 9वीं शताब्दी की इंजीनियरिंग पर आधारित पोत से यात्रा पूरी की थी।
कार्यक्रम ने आधुनिक समुद्री शासन और वैश्विक सहयोग में भारत-ओमान की साझी प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।

भारत के स्थायी मिशन ने 16 मई 2026 को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में ओमान के साथ संयुक्त रूप से 'प्राचीन व्यापार मार्ग: आईएनएसवी कौण्डिन्य का सफर' शीर्षक से एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में दर्जनों देशों के स्थायी प्रतिनिधि और राजनयिक दल के सदस्य उपस्थित रहे, जिन्होंने हिंद महासागर में सदियों पुरानी भारत-ओमान समुद्री साझेदारी को करीब से जाना।

आईएनएसवी कौण्डिन्य: डेढ़ हजार साल पुरानी तकनीक का जीवंत प्रमाण

आईएनएसवी कौण्डिन्य भारतीय नौसेना का एक अनूठा जलयान है, जिसे आधुनिक धातु-कील या इंजन के बजाय लगभग 1,500 वर्ष पुरानी 'सिले हुए तख्तों' की पारंपरिक भारतीय जहाज-निर्माण तकनीक से तैयार किया गया है। इस पोत का उद्देश्य हिंद महासागर में भारत के उन प्राचीन समुद्री व्यापार मार्गों को पुनः रेखांकित करना है, जो भारतीय उपमहाद्वीप को पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व से ही दक्षिण-पूर्व एशिया, पूर्वी एशिया, अरब प्रायद्वीप और पूर्वी अफ्रीका से जोड़ते थे।

कार्यक्रम में आईएनएसवी कौण्डिन्य के नाविकों ने भी भाग लिया, जिन्होंने हाल ही में हिंद महासागर के उन्हीं प्राचीन व्यापार पथों पर अभियान पूरा किया है। नाविकों ने प्रतिनिधियों के समक्ष अपने समुद्री अनुभव और इस यात्रा के ऐतिहासिक महत्व को साझा किया।

संयुक्त राष्ट्र मंच पर भारत-ओमान की साझी कूटनीति

भारत और ओमान के स्थायी मिशनों ने संयुक्त रूप से आईएनएसवी कौण्डिन्य के नाविकों के साथ-साथ ओमान के समुद्री विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और इस क्षेत्र से जुड़े पेशेवरों का स्वागत किया। न्यूयॉर्क स्थित भारतीय दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस आयोजन की जानकारी साझा करते हुए लिखा कि यह कार्यक्रम आज के समुद्री शासन और वैश्विक सहयोग की दिशा में साझा प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।

दूतावास के अनुसार, 'ये प्राचीन व्यापार मार्ग भारत और ओमान की जिम्मेदार समुद्री सभ्यताओं के तौर पर लंबे समय से चली आ रही भूमिका को दर्शाते हैं।' इस आयोजन ने मानवता के परस्पर जुड़ाव, साझेदारी और सामूहिक प्रगति के मूल्यों को भी पुनः स्थापित किया।

ओमान का 'ज्वेल ऑफ मस्कट': समानांतर समुद्री परंपरा

इस संदर्भ में ओमान के ऐतिहासिक जलयान 'ज्वेल ऑफ मस्कट' का उल्लेख भी उल्लेखनीय है। 2010 में यह पोत ओमान से भारत, श्रीलंका और मलेशिया होते हुए सिंगापुर तक सफलतापूर्वक पहुँचा था। यह जलयान 9वीं शताब्दी की इंजीनियरिंग पर आधारित था और बिना किसी धातु-कील के निर्मित किया गया था — ठीक उसी तरह जैसे आईएनएसवी कौण्डिन्य।

दोनों पोत मिलकर यह सिद्ध करते हैं कि भारत और ओमान की समुद्री सभ्यताएँ न केवल तटीय जल में, बल्कि राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से परे के खुले समुद्र में भी सहजता से संचालन करने में सक्षम थीं।

समुद्री विरासत और वैश्विक कूटनीति का संगम

यह आयोजन महज एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं था — यह संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भारत और ओमान की उस रणनीतिक साझेदारी का प्रतिबिंब है, जो इतिहास की साझी जड़ों से ऊर्जा लेती है। गौरतलब है कि हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और नेविगेशन की स्वतंत्रता आज भी वैश्विक कूटनीति के केंद्र में है। ऐसे में यह कार्यक्रम भारत की 'सागर' (Security and Growth for All in the Region) नीति और ओमान के साथ द्विपक्षीय समुद्री सहयोग को नई ऊँचाई देता है।

आने वाले समय में आईएनएसवी कौण्डिन्य के अभियान से प्राप्त अनुभव और दस्तावेज़ीकरण को समुद्री इतिहास के शोध में महत्वपूर्ण योगदान के रूप में देखा जाएगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो हिंद महासागर में प्रभाव को इतिहास की साझी जड़ों से वैध बनाता है। ऐसे समय में जब हिंद महासागर क्षेत्र में नौसैनिक प्रतिस्पर्धा तीव्र हो रही है, भारत का यह कदम 'सॉफ्ट पावर' और रणनीतिक साझेदारी को एक साथ साधता है। ओमान के साथ यह संयुक्त आयोजन दर्शाता है कि दोनों देश इतिहास को केवल विरासत नहीं, बल्कि समकालीन भू-राजनीति के औज़ार के रूप में भी देखते हैं।
RashtraPress
16 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आईएनएसवी कौण्डिन्य क्या है और यह क्यों खास है?
आईएनएसवी कौण्डिन्य भारतीय नौसेना का एक विशेष जलयान है, जिसे लगभग 1,500 वर्ष पुरानी पारंपरिक भारतीय 'सिले हुए तख्तों' की तकनीक से बनाया गया है — इसमें न आधुनिक धातु-कील है, न इंजन। यह पोत हिंद महासागर के उन प्राचीन समुद्री व्यापार मार्गों को पुनः रेखांकित करने के लिए प्रस्तावित किया गया था जो भारत को अरब प्रायद्वीप और पूर्वी अफ्रीका से जोड़ते थे।
संयुक्त राष्ट्र में भारत-ओमान का यह कार्यक्रम कब और क्यों आयोजित हुआ?
यह कार्यक्रम 16 मई 2026 को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित हुआ। इसका उद्देश्य हिंद महासागर में भारत और ओमान की साझी समुद्री सभ्यता को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करना और आधुनिक समुद्री शासन में दोनों देशों की संयुक्त प्रतिबद्धता को रेखांकित करना था।
ओमान का 'ज्वेल ऑफ मस्कट' क्या है और इसका इस कार्यक्रम से क्या संबंध है?
'ज्वेल ऑफ मस्कट' ओमान का एक ऐतिहासिक सिला हुआ जलयान है, जो 9वीं शताब्दी की इंजीनियरिंग पर आधारित था। 2010 में यह ओमान से भारत, श्रीलंका और मलेशिया होते हुए सिंगापुर तक सफलतापूर्वक पहुँचा था। आईएनएसवी कौण्डिन्य के साथ मिलकर यह ओमान और भारत की उस साझी समुद्री परंपरा का प्रतीक है जो सदियों पुरानी है।
इस कार्यक्रम में कौन-कौन शामिल हुए?
कार्यक्रम में संयुक्त राष्ट्र में विभिन्न देशों के स्थायी प्रतिनिधि और राजनयिक दल के सदस्य उपस्थित रहे। इसके अलावा आईएनएसवी कौण्डिन्य के नाविक, ओमान के समुद्री विशेषज्ञ, शोधकर्ता और इस क्षेत्र से जुड़े पेशेवर भी इस आयोजन में सम्मिलित हुए।
यह कार्यक्रम भारत-ओमान संबंधों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
यह आयोजन दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और समुद्री कूटनीति को नई ऊँचाई देता है। यह संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भारत और ओमान की उस रणनीतिक साझेदारी का प्रतिबिंब है जो इतिहास की साझी जड़ों से ऊर्जा लेती है और हिंद महासागर क्षेत्र में वैश्विक समुद्री सहयोग को बढ़ावा देती है।
राष्ट्र प्रेस
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