25 सितंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

ईश्वर चंद्र विद्यासागर जयंती: स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ने वाले सुधारक जिन्होंने विधवा पुनर्विवाह कानून बदला

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
ईश्वर चंद्र विद्यासागर जयंती: स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ने वाले सुधारक जिन्होंने विधवा पुनर्विवाह कानून बदला

सारांश

स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ाई से लेकर हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 तक — ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जीवन प्रतिरोध और करुणा की अद्वितीय गाथा है। 204वीं जयंती पर जानिए कैसे उन्होंने शिक्षा, भाषा और कानून तीनों मोर्चों पर एक साथ भारत को बदला।

मुख्य बातें

ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जन्म 26 सितंबर 1820 को बंगाल के मेदिनीपुर में हुआ था।
घर में दीया न होने के कारण वे स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ाई करते थे; बाद में कई छात्रवृत्तियाँ प्राप्त कीं।
हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 उनकी याचिका के परिणामस्वरूप लॉर्ड डलहौजी ने पारित किया।
बाल विवाह विरोधी अभियान ने सहमति आयु अधिनियम, 1891 का मार्ग प्रशस्त किया — विवाह की न्यूनतम आयु 12 वर्ष तय हुई।
अंतिम 18 वर्ष उन्होंने झारखंड के जामताड़ा में संथाल आदिवासियों की सेवा में बिताए और देश का पहला संथाल बालिका विद्यालय स्थापित किया।
29 जुलाई 1881 को उनका निधन हुआ; उनकी 52 रचनाओं में 17 संस्कृत और 5 अंग्रेजी में हैं।

ईश्वर चंद्र विद्यासागर — जिनका मूल नाम ईश्वर चंद्र बंदोपाध्याय था — का जन्म 26 सितंबर 1820 को बंगाल के मेदिनीपुर में हुआ था। वे केवल एक विद्वान नहीं, बल्कि 19वीं सदी के भारत में सामाजिक परिवर्तन के सबसे साहसी वाहक थे, जिन्होंने शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अपनी पूरी ऊर्जा झोंक दी। उनकी 204वीं जयंती के अवसर पर उनके जीवन और संघर्ष को याद करना आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

गरीबी में पला, ज्ञान से निखरा

विद्यासागर का बचपन घोर आर्थिक तंगी में बीता। पिता ठाकुरदास बंदोपाध्याय और माता भगवती देवी धार्मिक स्वभाव के थे, लेकिन परिवार के पास घर में दीया जलाने तक के साधन नहीं थे। इसके बावजूद ईश्वर चंद्र की ज्ञान-पिपासा इतनी तीव्र थी कि वे सड़क किनारे की स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ाई करते थे। इस असाधारण जिजीविषा ने उन्हें उत्कृष्ट छात्र बनाया और उन्हें कई छात्रवृत्तियाँ प्राप्त हुईं।

परिवार की आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने जोराशंको में अंशकालिक अध्यापन भी किया। 14 वर्ष की आयु में उनका विवाह दिनामयी देवी से हुआ और उनके एकमात्र पुत्र का नाम नारायण चंद्र बंदोपाध्याय था।

शैक्षणिक जीवन और संस्थागत सुधार

सन् 1839 में विद्यासागर ने संस्कृत विधि की परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की। 1841 में वे फोर्ट विलियम कॉलेज में संस्कृत विभाग के प्रमुख नियुक्त हुए। 1846 में उन्होंने फोर्ट विलियम कॉलेज छोड़कर संस्कृत कॉलेज में 'सहायक सचिव' का पद ग्रहण किया।

यहाँ उन्होंने मौजूदा शिक्षा प्रणाली में बदलावों की सिफारिश की, जिसने कॉलेज सचिव रसोमय दत्ता के साथ गंभीर मतभेद उत्पन्न किए। परिणामस्वरूप उन्होंने 1849 में संस्कृत कॉलेज से इस्तीफा दे दिया और फोर्ट विलियम कॉलेज में प्रधान क्लर्क के रूप में कार्य करने लगे। बाद में संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य बनने पर उन्होंने गैर-ब्राह्मण छात्रों के लिए शिक्षा के द्वार खोले — एक ऐसा साहसिक निर्णय जो उस दौर में क्रांतिकारी माना गया।

विधवा पुनर्विवाह और सामाजिक सुधार की लड़ाई

विद्यासागर बंगाल पुनर्जागरण के सबसे प्रमुख समर्थकों में से एक थे। हिंदू विधवा पुनर्विवाह को उस युग में धर्म का घोर उल्लंघन समझा जाता था। इसके बावजूद उन्होंने विधान परिषद में याचिका दायर की — जबकि राधाकांत देब और धर्म सभा ने प्रति-याचिका दाखिल कर कड़ा विरोध किया।

लॉर्ड डलहौजी ने व्यक्तिगत रूप से इस विधेयक को अंतिम रूप दिया और हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 पारित हुआ। विद्यासागर ने अपने विश्वास का प्रमाण स्वयं देते हुए अपने पुत्र नारायण चंद्र का विवाह एक विधवा से करवाया। इसके अतिरिक्त, बाल विवाह के विरुद्ध उनके अथक प्रयासों ने सहमति आयु अधिनियम, 1891 के मार्ग को प्रशस्त किया, जिसमें विवाह की न्यूनतम आयु 12 वर्ष निर्धारित की गई।

बंगाली भाषा और साहित्य को नई दिशा

विद्यासागर ने बंगाली गद्य को सरल और सुलभ रूप दिया, जिससे आम जनता भी साहित्य से जुड़ सकी। उनकी पुस्तक 'वर्ण परिचय' ने बंगाली भाषा शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव लाया। उन्होंने कोलकाता में मेट्रोपॉलिटन कॉलेज सहित अनेक स्कूलों की स्थापना की और बालिका शिक्षा को विशेष प्रोत्साहन दिया। उनकी कुल 52 रचनाओं में से 17 संस्कृत में और 5 अंग्रेजी में थीं।

जीवन के अंतिम वर्ष और आदिवासी सेवा

स्वजनों के क्षुद्र व स्वार्थी व्यवहार से व्यथित होकर विद्यासागर ने परिवार से नाता तोड़ लिया। अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष उन्होंने झारखंड के जामताड़ा में संथाल आदिवासियों के बीच बिताए। वहाँ उन्होंने संथाल लड़कियों के लिए देश का पहला औपचारिक बालिका विद्यालय और एक निःशुल्क होम्योपैथी क्लीनिक स्थापित किया। 29 जुलाई 1881 को उनका निधन हो गया, परंतु सादगी, साहस और सेवा का उनका संदेश आज भी अमर है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन उनकी असली विरासत उससे कहीं अधिक असुविधाजनक और साहसी है — उन्होंने न केवल कानून बदला, बल्कि अपने ही बेटे का विवाह विधवा से करवाकर समाज को चुनौती दी। यह ऐसे समय में हुआ जब धर्म सभा जैसी संस्थाएँ सक्रिय प्रति-याचिकाएँ दायर कर रही थीं। आज जब बालिका शिक्षा और महिला अधिकारों की बात होती है, तो विद्यासागर का जामताड़ा प्रयोग — एक अभिजात बंगाली का आदिवासी लड़कियों के लिए स्कूल खोलना — मुख्यधारा की चर्चा में प्रायः गायब रहता है। यह चूक हमें बताती है कि हम अपने सुधारकों को भी कितना चुनिंदा तरीके से याद करते हैं।
RashtraPress
25 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ईश्वर चंद्र विद्यासागर कौन थे?
ईश्वर चंद्र विद्यासागर 19वीं सदी के महान बंगाली समाज-सुधारक, शिक्षाविद और लेखक थे, जिनका जन्म 26 सितंबर 1820 को बंगाल के मेदिनीपुर में हुआ था। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह, बालिका शिक्षा और बंगाली भाषा के सरलीकरण के लिए अभूतपूर्व कार्य किया।
हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 में विद्यासागर की क्या भूमिका थी?
विद्यासागर ने विधान परिषद में विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में याचिका दायर की, जिसका राधाकांत देब और धर्म सभा ने कड़ा विरोध किया। लॉर्ड डलहौजी ने व्यक्तिगत रुचि लेते हुए विधेयक को अंतिम रूप दिया और हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 पारित हुआ। विद्यासागर ने स्वयं अपने पुत्र नारायण चंद्र का विवाह एक विधवा से करवाकर अपनी प्रतिबद्धता प्रमाणित की।
विद्यासागर ने बंगाली भाषा के लिए क्या किया?
विद्यासागर ने बंगाली गद्य को सरल और आधुनिक रूप प्रदान किया, जिससे यह आम जनता के लिए सुलभ हो सका। उनकी पुस्तक 'वर्ण परिचय' ने बंगाली भाषा शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव लाया और आज भी प्राथमिक शिक्षा का आधार मानी जाती है।
विद्यासागर ने जीवन के अंतिम वर्ष कहाँ बिताए?
विद्यासागर ने अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष झारखंड के जामताड़ा में संथाल आदिवासियों के बीच बिताए। वहाँ उन्होंने संथाल लड़कियों के लिए देश का पहला औपचारिक बालिका विद्यालय और एक निःशुल्क होम्योपैथी क्लीनिक स्थापित किया।
ईश्वर चंद्र विद्यासागर का निधन कब हुआ?
ईश्वर चंद्र विद्यासागर का निधन 29 जुलाई 1881 को हुआ। उनकी कुल 52 रचनाएँ हैं, जिनमें 17 संस्कृत में और 5 अंग्रेजी में हैं।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 महीना पहले
  2. 5 महीने पहले
  3. 1 साल पहले
  4. 1 साल पहले
  5. 1 साल पहले
  6. 1 साल पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले