झारखंड हाईकोर्ट ने चपरासी को बहाल करने का आदेश दिया, चायपत्ती-बिस्किट चोरी में 17 साल बाद बर्खास्तगी को बताया अनुपातहीन
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड हाईकोर्ट ने 27 जून 2026 को एक अहम फैसले में बोकारो के जिला ग्रामीण विकास अभिकरण (डीआरडीए) में 17 वर्षों से कार्यरत संविदा चपरासी रणजीत कुमार हिमांशु की बर्खास्तगी को अवैध ठहराते हुए उनकी सेवा बहाल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कार्यालय से चायपत्ती और बिस्किट जैसी मामूली वस्तुएँ ले जाने के आरोप में दीर्घकालिक सेवा समाप्त करना अनुपातिकता के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है। राज्य सरकार को 1 जुलाई 2026 तक कर्मचारी को बहाल करने और 50 प्रतिशत बकाया वेतन का भुगतान करने का आदेश दिया गया है।
मामले की पृष्ठभूमि
रणजीत कुमार हिमांशु वर्ष 2008 से बोकारो डीआरडीए में संविदा चपरासी के रूप में कार्यरत थे। उन पर आरोप था कि वे कार्यालय से चायपत्ती और बिस्किट ले गए। इस आधार पर उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। हिमांशु ने इस आदेश को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहाँ सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि उन्हें जारी कारण बताओ नोटिस में यह तक स्पष्ट नहीं किया गया था कि उन पर किस वस्तु को ले जाने का आरोप है।
अदालत की मुख्य टिप्पणियाँ
मुख्य न्यायाधीश एस.एम. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि किसी भी अनुशासनात्मक कार्रवाई का आधार स्पष्ट और ठोस होना चाहिए। अस्पष्ट कारण बताओ नोटिस को वैध नोटिस नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि बिना समुचित कारणों के सेवा समाप्त करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। खंडपीठ ने रेखांकित किया कि अनुशासनात्मक दंड आरोप की गंभीरता के अनुपात में होना चाहिए — 17 वर्षों की सेवा समाप्त करना इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
प्रक्रियागत खामियाँ
हाईकोर्ट ने पाया कि सक्षम अधिकारियों ने कर्मचारी के जवाब, उसकी लंबी सेवा अवधि, सेवा रिकॉर्ड और पारिवारिक परिस्थितियों पर कोई समुचित विचार नहीं किया। अदालत के अनुसार यह प्रक्रियागत चूक बर्खास्तगी के आदेश को और अधिक अस्थिर बनाती है।
अनुपालन की जिम्मेदारी
हाईकोर्ट ने बोकारो के उपायुक्त और उप विकास आयुक्त को आदेश के अनुपालन की व्यक्तिगत जिम्मेदारी सौंपी है। उन्हें निर्धारित समय के भीतर कर्मचारी की बहाली सुनिश्चित करने और अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
व्यापक महत्व
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सरकारी विभागों में संविदा कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर देशभर में बहस जारी है। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी हाईकोर्ट ने मामूली आरोपों में दी गई अत्यधिक सजा को अनुपातहीन बताते हुए पलटा हो — ऐसे निर्णय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की व्यापक पुनर्स्थापना की दिशा में एक मिसाल बनते हैं। अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार अदालत के निर्देश का पालन समय पर करती है या नहीं।