क्या कल्याण सिंह: सत्ता, संघर्ष और सियासत की नैतिकता का प्रतीक हैं?
सारांश
Key Takeaways
- कल्याण सिंह का जन्म 5 जनवरी 1932 को हुआ।
- उन्होंने 6 दिसंबर 1992 को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया।
- राजनीति में उनकी शुरुआत 1967 में हुई।
- उन्हें 2022 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
- उनका निधन 21 अगस्त 2021 को हुआ।
नई दिल्ली, 4 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। 5 जनवरी 1932, यह वह महत्वपूर्ण तिथि है जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाले, 'बाबूजी' के नाम से प्रसिद्ध कल्याण सिंह का जन्म हुआ। अलीगढ़ जिले के मढ़ौली गांव में तेजपाल सिंह लोधी और सीता देवी के घर जन्मे कल्याण सिंह ने राजनीति में जो यात्रा की, वह केवल सत्ता की नहीं, बल्कि सिद्धांत, टकराव और निर्णयों की जिम्मेदारी उठाने की भी गाथा है।
लगभग तीन दशक पहले अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद कल्याण सिंह एक प्रमुख हिंदू नेता के रूप में उभरे। यह वह समय था जब उनका नाम देश की राजनीति के केंद्र में आ गया। 6 दिसंबर 1992 की उस ऐतिहासिक घटना के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया।
राजनीति में कदम रखने से पहले उनका करियर एक अध्यापक के रूप में शुरू हुआ था। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ समाज सेवा में कदम रखा, जो उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत बनी। जनसंघ के मंच से सक्रिय राजनीति में प्रवेश करने वाले कल्याण सिंह ने 1967 में पहली बार अलीगढ़ की अतरौली सीट से विधायक चुने जाने का गौरव प्राप्त किया। इसके बाद 2002 तक वह दस बार विधानसभा सदस्य रहे।
आपातकाल के दौरान वह 20 महीने जेल में रहे। 1977 में मुख्यमंत्री राम नरेश यादव के नेतृत्व में बनी जनता पार्टी सरकार में उन्हें स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया, जिससे उनकी प्रशासनिक और राजनीतिक समझ और मजबूत हुई। 1990 के दशक में कल्याण सिंह राम मंदिर आंदोलन के नायक के रूप में उभरे। 1991 का विधानसभा चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा गया और भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ जीत हासिल की। जून 1991 में वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
हालांकि, 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद उन्होंने उसी दिन मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उस दिन देश में हड़कंप मच गया था। लखनऊ से दिल्ली तक फोन की घंटियाँ बज रही थीं और हर कोई जानना चाहता था कि अयोध्या में यह सब अचानक कैसे हुआ। कहा जाता है कि जब अयोध्या में घटनाएँ घट रही थीं, तब मुख्यमंत्री कल्याण सिंह लखनऊ में अपने सरकारी आवास पर थे। उन्होंने इस घटना की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ली।
लेखक हेमंत शर्मा अपनी किताब 'अयोध्या के चश्मदीद' में बताते हैं कि कल्याण सिंह ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि किसी भी कीमत पर कारसेवकों पर गोली न चलाई जाए। उनके अनुसार, कल्याण सिंह ने कहा, "मैं इसकी जिम्मेदारी खुद लेता हूँ।" विवादित ढांचे पर मौजूद कारसेवकों पर गोली नहीं चलाई गई, तो इसके लिए किसी अधिकारी की जिम्मेदारी नहीं है। मैंने लिखित आदेश दिया था कि किसी पर भी गोली नहीं चलाई जाए।
हेमंत शर्मा की दूसरी किताब 'युद्ध में अयोध्या' के अनुसार, 6 दिसंबर 1992 की सुबह से ही कारसेवा स्थल के पास विहिप और भाजपा नेताओं के भाषण चल रहे थे। उसी सुबह मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने दो बार फैजाबाद कमिश्नर को फोन कर स्थिति की जानकारी ली। जब उन्हें ढांचा गिरने की खबर मिली, तो उन्होंने विनय कटियार के घर फोन किया और आडवाणी से इस्तीफे की बात कही, हालांकि आडवाणी ने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी। अयोध्या के बाद कल्याण सिंह की छवि एक हिंदुत्ववादी नेता के रूप में बन गई।
कल्याण सिंह 1997 में दोबारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, लेकिन यह कार्यकाल महज दो साल तक चला। इसके बाद वह राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल भी रहे। समय के साथ उनका भाजपा से मोहभंग भी हुआ। मतभेदों के चलते उन्होंने भाजपा छोड़कर अपनी पार्टी बनाई। जनवरी 2004 में वह भाजपा में लौटे, लेकिन 2009 में उपेक्षा और अपमान का आरोप लगाते हुए पार्टी की सदस्यता से फिर इस्तीफा दे दिया। लोग उन्हें प्यार से 'बाबूजी' कहते थे।
सितंबर 2019 में उन पर विवादित ढांचे को ध्वस्त करने की आपराधिक साजिश के आरोप में मुकदमा चला। 2020 में सीबीआई की विशेष अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। 21 अगस्त 2021 को लखनऊ में उनका निधन हो गया। उनके निधन के एक साल बाद, 2022 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।