कारगिल के दो अमर शहीद: 'शेरशाह' कैप्टन विक्रम बत्रा और 'द्रास के शेर' कैप्टन अनुज नैयर की शौर्यगाथा
सारांश
मुख्य बातें
कारगिल युद्ध (1999) में कैप्टन विक्रम बत्रा और कैप्टन अनुज नैयर ने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत माँ के माथे पर गर्व का तिलक लगाया। एक को देश ने 'शेरशाह' कहा, दूसरे को 'द्रास का शेर' — दोनों की वीरता आज भी हर भारतीय के दिल में जीवित है। 6 जुलाई को कारगिल विजय दिवस की पूर्व संध्या पर इन दोनों अमर सपूतों की शौर्यगाथा हर पीढ़ी को प्रेरणा देती है।
कारगिल संकट की पृष्ठभूमि
मई 1999 में जब पाकिस्तानी घुसपैठियों ने सर्दियों के दौरान भारतीय सैनिकों द्वारा खाली की गई ऊँचाई वाली चौकियों पर कब्जा कर लिया, तब स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा धीरे-धीरे हुआ। रणनीतिक ऊँचाइयों पर दुश्मन के कब्जे ने भारतीय सेना के लिए खुफिया जानकारी जुटाना और पलटवार करना दोनों ही कठिन बना दिया था। इसी संकट की घड़ी में भारत के युवा अफसरों ने इतिहास रच दिया।
कैप्टन विक्रम बत्रा: 'शेरशाह' की अदम्य वीरता
9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में जन्मे कैप्टन विक्रम बत्रा ने मोर्चे पर जाने से पहले कहा था — 'मैं या तो तिरंगे को लहराकर आऊंगा या फिर तिरंगे में लिपटा हुआ आऊंगा, पर मैं आऊंगा जरूर।' यह केवल एक उद्घोष नहीं था — यह उनके पूरे जीवन का सार था।
कारगिल युद्ध के दौरान कैप्टन बत्रा और उनकी कंपनी को दुर्गम पहाड़ी इलाके में दुश्मन की सुदृढ़ चौकियों को साफ करते हुए पॉइंट 4875 तक पहुँचने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। पहले से घायल होने के बावजूद उन्होंने आमने-सामने की मुठभेड़ में पाँच दुश्मन सैनिकों को मार गिराया। हैंड ग्रेनेड फेंककर अगले ठिकाने से भी दुश्मनों को खदेड़ा और अपनी टुकड़ी का नेतृत्व करते रहे।
भारतीय सेना ने पॉइंट 4875 पर तिरंगा फहरा दिया, किंतु इस ऑपरेशन में 7 जुलाई 1999 को कैप्टन विक्रम बत्रा वीरगति को प्राप्त हुए। उनके अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान 'परमवीर चक्र' से विभूषित किया। उनकी स्मृति में पॉइंट 4875 को आज 'बत्रा टॉप' के नाम से जाना जाता है।
कैप्टन अनुज नैयर: 'द्रास के शेर' की बेजोड़ बहादुरी
28 अगस्त 1975 को दिल्ली में जन्मे कैप्टन अनुज नैयर 17 जाट रेजिमेंट का हिस्सा थे। कारगिल की जंग में महज 23 वर्ष की आयु में उन्होंने वह कर दिखाया जिसे इतिहास कभी नहीं भूल सकता। जुलाई में दो रातों तक चली भीषण लड़ाई में उन्होंने उस रणनीतिक चोटी पर कब्जा किया जो 'ऑपरेशन विजय' की सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक थी।
भारी तोपखाने और मोर्टार की गोलाबारी के बीच कैप्टन नैयर ने दुश्मन के चार बंकर नष्ट किए और आमने-सामने की लड़ाई में कई घुसपैठियों को मार गिराया। चौथे बंकर पर हमले के दौरान वे दुश्मन के रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड (RPG) की चपेट में आए और मौके पर ही वीरगति को प्राप्त हुए।
एक माँ की आँखों से: मीना नैयर की यादें
शहीद अनुज की माँ मीना नैयर ने एक इंटरव्यू में बताया था, '6 जुलाई 1999 को ब्रिगेडियर गिल, जो 79 ब्रिगेड को मैनेज कर रहे थे, ने मुझे फोन किया और बताया कि अनुज एक बड़े ऑपरेशन के लिए जा रहा है। मुझे नहीं पता था कि वह किस बड़े ऑपरेशन के लिए जा रहा है। वह तीन बंकर ले चुका था और चौथे पर कब्जा लेना था।'
मीना नैयर आगे बताती हैं, 'बंकर के अंदर अनुज ने एक साथी जवान से पूछा कि भूख लगी है, कुछ खाने को है। जवान ने बिस्किट दिए, अनुज ने दो-तीन बिस्किट खाए, फिर सिगरेट पी और मोर्चा संभाल लिया। तभी एक RPG उसकी गर्दन पर लगी। हमें पौने 10 बजे फोन आया कि अनुज अब नहीं रहे।' एक माँ के ये शब्द उस अंतिम क्षण की मार्मिक तस्वीर खींचते हैं।
सम्मान और विरासत
अपनी टीम को स्वयं मिसाल बनकर प्रेरित करने और कर्तव्य से परे जाकर असाधारण वीरता दिखाने के लिए कैप्टन अनुज नैयर को वर्ष 2000 में भारत के दूसरे सबसे बड़े वीरता पुरस्कार 'महावीर चक्र' से सम्मानित किया गया। ये दोनों वीर आज भी भारतीय सेना की अदम्य परंपरा के प्रतीक हैं — एक ऐसी परंपरा जो बताती है कि तिरंगे की शान के लिए भारत के सपूत सदा तत्पर रहते हैं।