क्या कभी ऐशो-आराम के बाद कृश्न चंदर को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा?
सारांश
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नई दिल्ली, 22 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। उर्दू कथा-साहित्य में अपनी विशिष्ट लेखनी के लिए मशहूर कहानीकार कृश्न चंदर को आज उनकी श्रेष्ठ कहानियों और मानवता के प्रति उनकी गहरी सोच के लिए याद किया जाता है। लेकिन उनकी ज़िंदगी में एक ऐसा समय भी आया था जब आर्थिक संकट ने उन्हें अपनी कारें बेचना पड़ा, नौकरों को हटाना पड़ा और बंबई जैसे बड़े शहर में फिर से शून्य से शुरुआत करनी पड़ी।
23 नवंबर 1914 को राजस्थान के भरतपुर में जन्मे कृश्न चंदर बचपन से ही संसारिक और साहसी थे। उनके पिता गौरी शंकर चोपड़ा एक मेडिकल अफसर थे और नौकरी के चलते परिवार पुंछ चला गया, जहां उनका बचपन बीता। पढ़ाई के दौरान ही उन्हें साहित्य में रुचि हुई और उन्होंने उर्दू में पांचवीं जमात से पढ़ाई की और फारसी आठवीं में ले ली। इसके बाद लाहौर के फारमन क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ाई करते हुए उनकी पहचान भगत सिंह के साथियों से हुई और वे क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गए।
उनकी साहित्यिक प्रेम ने 1943 में उनके पहले उपन्यास 'शिकस्त' का जन्म दिया। इसी समय उन्होंने प्रगतिशील लेखक आंदोलन से जुड़ने का निर्णय लिया और सज्जाद जहीर तथा अहमद अली जैसे साहित्यकारों से संपर्क किया। 1939 में वे ऑल इंडिया रेडियो में शामिल हुए, जहां तीन वर्षों तक कार्य किया।
लेकिन रेडियो की नौकरी ने उन्हें संतुष्ट नहीं किया। उसी समय शालीमार फिल्म कंपनी के जेड अहमद ने उनकी एक कहानी पढ़ी और उन्हें फिल्मों में संवाद लेखन का प्रस्ताव दिया।
इस प्रकार, उनकी ज़िंदगी ने एक नया मोड़ लिया। वे पुणे पहुंचे, जहां उन्हें फिल्मों की दुनिया में एक नई शुरुआत का अनुभव हुआ। अन्नदाता जैसी यादगार कहानियां इसी दौरान लिखी गईं।
1946 में बंबई पहुँचने पर उनके करियर ने एक नई दिशा ली। बंबई टॉकीज में नौकरी, बढ़ती पहचान और फिर अचानक निर्माता-निर्देशक बनने की चाह। उनकी पहली फिल्म 'सराय के बाहर' असफल रही, जबकि दूसरी फिल्म 'राख' डब्बे में ही बंद रह गई।
फिल्मों में निरंतर असफलता ने उन्हें आर्थिक रूप से प्रभावित किया। कर्ज बढ़ता गया और बंबई, जो कभी चमक देती थी, अब उनके लिए संकट बन गई।
इस कठिन समय में वे हार मानने वालों में से नहीं थे। उन्होंने अपनी कलम को फिर से उठाया और दो दर्जन से अधिक फिल्मों के लिए कहानी, संवाद और स्क्रिप्ट लिखीं।
उनकी साहित्यिक पहचान भी बनी रही, और उन्होंने रूमानी यथार्थवाद को नई ऊंचाइयां दीं। 'कालू भंगी' जैसी कहानियों में उन्होंने समाज के हाशिए पर खड़े लोगों को आवाज दी।
हालांकि, 8 मार्च 1977 को कृश्न चंदर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।