वर्मा मलिक: जब गाने हिट होने के बावजूद नहीं मिल रहा था काम, मनोज कुमार की पेशकश ने बदली किस्मत
सारांश
Key Takeaways
- वर्मा मलिक का जन्म 13 अप्रैल 1925 को हुआ था।
- उन्होंने कई हिट गाने लिखे, लेकिन शुरू में काम नहीं मिल रहा था।
- मनोज कुमार ने उनकी किस्मत बदली।
- उनके गीत आज भी लोगों के दिलों में हैं।
- उन्होंने देशभक्ति और भजन के लिए भी प्रसिद्धि प्राप्त की।
मुंबई, 14 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। हिंदी सिनेमा के इतिहास में कई अद्वितीय गीतकार हुए हैं, जिन्होंने अपनी विशेष और समृद्ध रचनाओं से फिल्मों को अमर बना दिया। इन सभी में वर्मा मलिक का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जीवन के हर रंग और भावनाओं को अपने शब्दों में पिरोने वाले इस महान गीतकार की 15 मार्च को पुण्यतिथि है। उनके द्वारा लिखे गए गीत आज भी ताजगी से भरे हुए हैं।
वर्मा मलिक के गीत, खासकर 'यादगार' फिल्म का लोकप्रिय गाना “एक तारा बोले तुम तुम...” उनकी जिंदगी का बदलाव लाने वाला पल रहा। शुरुआती दिनों में कई हिट गाने लिखने के बावजूद उन्हें लगातार काम नहीं मिल रहा था। लेकिन मनोज कुमार की एक पेशकश ने उनकी किस्मत को बदल दिया और उन्हें सिनेमा की दुनिया में स्थापित कर दिया।
वर्मा मलिक का जन्म 13 अप्रैल 1925 को पंजाब के फिरोजपुर में हुआ। उनके बचपन में आजादी की लड़ाई के गूंजते नारे उनके कानों में सुनाई देते थे। उन्होंने देशभक्ति के गीत लिखकर अपनी पहचान बनाई और भजन गायक के रूप में भी ख्याति प्राप्त की। हर कार्यक्रम की शुरुआत वे भजन से करते थे।
साल 1947 में विभाजन के बाद जब वे भारत आए, तो धीरे-धीरे उनका जीवन पटरी पर आया। साल 1954 में कुलदीप सैगल की फिल्म 'दोस्त' में उन्हें पहला महत्वपूर्ण अवसर मिला। इस फिल्म में कुल सात गाने थे और पांच गीतकारों को आमंत्रित किया गया। जीवन दर्शन और दोस्ती पर आधारित एक गाना वर्मा मलिक को सौंपा गया। उन्होंने लिखा – “आए भी अकेला, जाए भी अकेला, दो दिन की जिंदगी है, दो दिन का मेला”। तलत महमूद की मधुर आवाज में यह गाना सुपरहिट हुआ, फिर भी उन्हें कोई बड़ा ब्रेक नहीं मिला। निराशा के समय में उन्होंने भजन गाकर गुजारा करने का निर्णय लिया। कहते हैं न, किस्मत आने से पहले दस्तक नहीं देती, और यही उनके साथ भी हुआ। फिल्म 'यादगार' 1970 में आई, जिसके निर्माता-निर्देशक एस. राम शर्मा थे और मुख्य अभिनेता मनोज कुमार थे।
वास्तव में, वर्मा मलिक की किस्मत मनोज कुमार के कारण ही चमकी। एक मुलाकात के दौरान, मनोज कुमार ने उनके अंदर के कलाकार को पहचाना और वर्मा को फिल्म के सभी गीत लिखने का प्रस्ताव दिया। फिल्म के गाने शानदार हिट हुए और वर्मा मलिक की पहचान बन गई। 'यादगार' न केवल उनके करियर के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ बनी बल्कि उनके लिए भी विशेष रही।
इसके बाद, वर्मा मलिक ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसी साल आई फिल्म 'पहचान' में उनका गाना “सबसे बड़ा नादान वही है जो समझे नादान मुझे” ने इतिहास रच दिया। इस गाने को फिल्मफेयर अवार्ड मिला सर्वश्रेष्ठ गीत के लिए वर्मा मलिक, सर्वश्रेष्ठ गायक के लिए मुकेश को और सर्वश्रेष्ठ संगीत के लिए शंकर-जयकिशन को पुरस्कार मिला।
वर्मा मलिक ने देशभक्ति, भजन और फिल्मी गीतों में अद्वितीयता हासिल की। उन्होंने हिंदी के साथ पंजाबी में भी गीत लिखे। साल 1969 में दारा सिंह की फिल्म 'नानक नाम जहाज है' के गीत भी उनके द्वारा लिखे गए थे। उनकी जोड़ी प्रसिद्ध संगीतकारों जैसे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, शंकर-जयकिशन, कल्याणजी-आनंदजी, रवि के साथ रही।
कुछ यादगार गानों पर नजर डालें तो सावन भादो का “सुन सुन सुन ओ गुलाबी कली...दिल लेकर मेरा दूर दूर जाओ ना”, 'विक्टोरिया नंबर 203' का “दो बेचारे बिना सहारे”, 'नागिन' का “हफ्ते, महीने, बरसों नहीं, सदियों से है ये पुराने तेरे मेरे याराने हो” आदि हैं।
वर्मा मलिक ने लीक से हटकर लिखा। उन्होंने 'पत्थर और पायल', 'वारिस', 'कौन कितने पानी में' जैसी फिल्मों में भी गीत दिए। इसके अतिरिक्त, “आज मेरे यार की शादी है”, “महंगाई मार गई” जैसे गानों को भी रचा। 15 मार्च 2009 को वर्मा मलिक इस दुनिया से चले गए। ठीक उसी तरह जैसे उन्होंने लिखा था – आए भी अकेला, गए भी अकेला लेकिन पीछे छोड़ गए अमर गीत जो आज भी जीवन के मेले की याद दिलाते हैं।