वर्मा मलिक: 'दोस्त' से बड़ा ब्रेक 'यादगार' बना, मनोज कुमार बने करियर के सारथी
सारांश
मुख्य बातें
मुंबई, 12 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। हिंदी सिनेमा के महान गीतकारों में वर्मा मलिक का नाम सदैव लिया जाएगा, जिन्होंने अपनी अद्भुत लेखनी से फिल्मों को अमर बना दिया। इस प्रतिभाशाली गीतकार की जयंती 13 अप्रैल को मनाई जाती है। उनके द्वारा लिखे गए गाने आज भी उतने ही ताजगी भरे और दिल को छूने वाले हैं।
वर्मा मलिक का जन्म 13 अप्रैल 1925 को पंजाब के फिरोजपुर में हुआ था। उनके मन में स्वतंत्रता संग्राम की भावना बचपन से ही थी, जो उनके करियर में भी नजर आई। उन्होंने कई देशभक्ति के गीत लिखे और भजन गाकर भी प्रसिद्धि हासिल की। हर आयोजन की शुरुआत वह भजन गाकर करते थे।
जब 1947 में विभाजन के बाद वह भारत आए, तो जीवन धीरे-धीरे सामान्य हो रहा था। 1954 में उन्हें फिल्म ‘दोस्त’ से पहला बड़ा अवसर मिला, जिसमें कुल सात गाने थे और पांच गीतकारों को काम सौंपा गया। वर्मा मलिक को जीवन दर्शन पर आधारित एक गीत लिखने का मौका मिला। उन्होंने लिखा, “आए भी अकेले, जाएंगे भी अकेले, दो दिन की जिंदगी है, दो दिन का मेला।” तलत महमूद की मधुर आवाज में यह गाना सुपरहिट हो गया, फिर भी उन्हें काम की कमी का सामना करना पड़ा। निराशा के दिनों में उन्होंने भजन गाकर जीवन यापन करने का निर्णय लिया।
इसी बीच, उनका करियर मनोज कुमार के साथ एक टर्निंग पॉइंट पर पहुंचा। 1970 में फिल्म ‘यादगार’ ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। मनोज कुमार ने वर्मा मलिक की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें फिल्म के सभी गीत लिखने की जिम्मेदारी दी। फिल्म का गाना “एक तारा बोले तुम तुम, एक तारा बोले तुम तुम…” बेहद लोकप्रिय हुआ। ‘यादगार’ वर्मा मलिक के करियर में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुई।
उसी वर्ष आई फिल्म ‘पहचान’ में उनका गाना “सबसे बड़ा नादान वही है जो समझे नादान मुझे” ने इतिहास रच दिया। इस गाने को फिल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। वर्मा मलिक को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार मिला, जबकि मुकेश को सर्वश्रेष्ठ गायक का और शंकर-जयकिशन को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार मिला।
वर्मा मलिक ने देशभक्ति, भजन और फिल्मी गीतों में समान रूप से महारत हासिल की। उन्होंने ‘सावन भादो’ का गाना “सुन सुन सुन ओ गुलाबी कली… दिल लेकर मेरा दूर दूर जाओ ना,” ‘विक्टोरिया नंबर 203’ का “दो बेचारे बिना सहारे,” और ‘नागिन’ का “हफ्ते, महीने, बरसों नहीं, सदियों से है ये पुराने तेरे मेरे याराने हो” जैसे कई हिट गाने लिखे। इसके अलावा, उन्होंने ‘पत्थर और पायल’, ‘वारिस’, और ‘कौन कितने पानी में’ जैसी फिल्मों में भी गीत दिए। ‘आज मेरे यार की शादी है’ और ‘महंगाई मार गई’ जैसे गाने भी उनकी कलम से निकले।
उन्होंने हिंदी के साथ-साथ पंजाबी फिल्मों के लिए भी गाने लिखे। 1969 में दारा सिंह की फिल्म ‘नानक नाम जहाज है’ के गीत भी उन्होंने लिखे थे। वर्मा मलिक की जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, शंकर-जयकिशन, कल्याणजी-आनंदजी और रवि जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ रही। वे अपने गीतों में गहरी फिलॉसफी और भावनाओं को समेटते थे। 15 मार्च 2009 को वर्मा मलिक ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।