क्या कांग्रेस के शासनकाल में मनरेगा का नाम कई बार बदला गया था? मंत्री रणबीर सिंह गंगवा
सारांश
Key Takeaways
- कांग्रेस ने मनरेगा योजना में कई बार नाम बदला है।
- श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए बदलाव किए गए हैं।
- भ्रष्टाचार को रोकने के लिए नए उपाय किए गए हैं।
- भाजपा सरकार श्रमिकों को सभी प्रकार का लाभ पहुंचाने का प्रयास कर रही है।
- राजीव गांधी के अनुसार, श्रमिकों को मिलने वाले पैसे की कमी एक गंभीर समस्या है।
चंडीगढ़, 6 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। हरियाणा सरकार के मंत्री रणबीर सिंह गंगवा ने कांग्रेस द्वारा ‘मनरेगा बचाओ अभियान’ की शुरुआत पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि वर्तमान में कांग्रेस कुंठित हो चुकी है, जिसके चलते वे ऐसे कदम उठा रही हैं।
उन्होंने मंगलवार को समाचार एजेंसी राष्ट्र प्रेस से बातचीत में कहा कि कांग्रेस को सबसे पहले मनरेगा योजना में किए गए परिवर्तनों का गहन अध्ययन करना चाहिए। अध्ययन के बाद उन्हें यह स्पष्ट हो जाएगा कि इस योजना में श्रमिकों के हितों का विशेष ध्यान रखा गया है। साथ ही, इसमें जो खामियां थीं, उन्हें दूर करने का प्रयास किया गया है, ताकि श्रमिकों को मिलने वाले फायदों में कोई रुकावट न आए। यह दुर्भाग्य है कि आज की तारीख में कांग्रेस इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में भी कई बार मनरेगा योजना का नाम बदला गया था। अब जब हमारी सरकार ने इसका नाम बदला है, तो कई लोग इस पर सवाल उठा रहे हैं। उन्हें अतीत में जाकर यह देखना चाहिए कि कैसे कांग्रेस ने अपने शासनकाल में एक बार नहीं, बल्कि कई बार इस योजना का नाम बदला।
उन्होंने यह भी बताया कि इस योजना में भ्रष्टाचार को रोकने और श्रमिकों को व्यापक स्तर पर लाभ पहुंचाने के लिए बदलाव किए गए हैं। देश के विकास में श्रमिकों का महत्वपूर्ण योगदान है। वे हर स्थिति में काम करते हैं। भाजपा सरकार श्रमिकों को हर प्रकार का लाभ पहुंचाने के लिए काम कर रही है। अब ‘विकसित भारत-जी राम जी’ योजना के तहत श्रमिकों को आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित होगी। पहले श्रमिकों को रोजगार नहीं मिल पाता था, लेकिन अब उन्हें रोजगार मिल रहा है। हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि श्रमिकों के साथ कोई भी अन्याय न हो। हमारी सरकार ने इस योजना का बजट भी बढ़ाया है, जो पहले कम था। यही कारण था कि राजीव गांधी को यह कहना पड़ा था कि यदि हम केंद्र से 1 रुपया भेजते हैं, तो श्रमिकों को केवल 15 पैसे ही मिलते हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि ये सारे पैसे कहां चले जाते हैं। श्रमिकों के साथ किसी भी प्रकार का अन्याय न हो, इसी पर रोक लगाने के लिए हम ‘विकसित भारत-जी राम जी’ योजना लेकर आए हैं।