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क्या एस जयशंकर को कांग्रेस ने नजरअंदाज किया, जबकि मनमोहन सिंह ने उन्हें तवज्जो दी थी?

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क्या एस जयशंकर को कांग्रेस ने नजरअंदाज किया, जबकि मनमोहन सिंह ने उन्हें तवज्जो दी थी?

सारांश

क्या कांग्रेस ने एस. जयशंकर को नजरअंदाज किया, जबकि मनमोहन सिंह उनके पक्ष में थे? जानिए कैसे उनकी काबिलियत ने उन्हें विदेश मंत्री बनाया। यह कहानी भारत की विदेश नीति और राजनीति की जटिलताओं को उजागर करती है।

मुख्य बातें

जयशंकर की काबिलियत ने उन्हें विदेश मंत्री बनाया।
2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद उनके लिए नए अवसर खुले।
मनमोहन सिंह ने उनकी क्षमता को पहचाना, लेकिन संगठन के दखल ने बाधा डाली।
विदेश मंत्री के रूप में उनकी शपथ लेते समय मनमोहन सिंह भी उपस्थित थे।

नई दिल्ली, 8 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। न कोई चुनाव लड़ा और न ही राजनीति की विरासत मिली, फिर भी उन्होंने सत्ता के शिखर पर बैठकर दुनिया के साथ संबंधों को बनाने की जिम्मेदारी निभाई। यहाँ चर्चा हो रही है देश के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की, जिनकी रणनीति और दृष्टिकोण ने भारत की विदेश नीति को एक नई दिशा दी है, जिससे दुश्मन देश भी प्रभावित हुए हैं। इसी काबिलियत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्वास जताया, जब एस. जयशंकर को बिना चुनाव लड़े ही दुनिया के साथ रिश्तों को संभालने का कार्यभार सौंपा गया।

9 जनवरी 1955 को दिल्ली में जन्मे एस. जयशंकर की कुशाग्रता के लक्षण बचपन से ही स्पष्ट थे। बड़े होने पर उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर और इंटरनेशनल रिलेशंस तथा न्यूक्लियर डिप्लोमेसी में एमए, एम फिल और पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। 1977 में इंडियन फॉरेन सर्विस (IFS) में शामिल होकर उन्होंने अपने डिप्लोमेसी करियर की शुरुआत की और देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों को बढ़ावा दिया।

जयशंकर की विदेश में पहली पोस्टिंग 1979 से 1981 तक मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास में तृतीय और द्वितीय सचिव (राजनीतिक) के रूप में हुई। 1981 से 1985 तक उन्होंने विदेश मंत्रालय में अवर सचिव (अमेरिका) और नीति नियोजन के रूप में कार्य किया। इसके बाद 1985 से 1988 तक वाशिंगटन डीसी में भारतीय दूतावास में प्रथम सचिव का कार्यभार संभाला और फिर दो वर्ष श्रीलंका में भारतीय शांति सेना (IPKF) के प्रथम सचिव और राजनीतिक सलाहकार के रूप में कार्य किया।

1990 में, जयशंकर बुडापेस्ट में वाणिज्य सलाहकार बने। तीन वर्षों तक इस पद पर रहने के बाद, वे भारत लौट आए, जहाँ उन्होंने विदेश मंत्रालय के पूर्वी यूरोप प्रभाग के निदेशक और भारत के राष्ट्रपति के प्रेस सचिव के रूप में कार्य किया। 1996 में उप मिशन प्रमुख के रूप में टोक्यो चले गए और 2000 में चेक गणराज्य में भारत के राजदूत नियुक्त हुए।

प्राग में राजदूत के रूप में कार्यकाल पूरा करने के बाद, जयशंकर ने विदेश मंत्रालय में अमेरिका विभाग का नेतृत्व किया। 2007 में उन्हें सिंगापुर में उच्चायुक्त के रूप में भेजा गया। उन्होंने 2009 से 2013 तक चीन में भारत के राजदूत के रूप में कार्य किया।

2013 में यूपीए 2.0 सरकार में, मनमोहन सिंह की नज़र में एस. जयशंकर का नाम विदेश सचिव के लिए था, लेकिन वरिष्ठता के कारण उनका नाम नहीं बढ़ाया गया। उस समय चर्चाएँ थीं कि संगठन के दखल के कारण एस. जयशंकर को नजरअंदाज किया गया।

2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद एस. जयशंकर के लिए नए अवसर खुले। 2015 में उन्हें विदेश सचिव की जिम्मेदारी दी गई। 2019 में उन्हें सीधे विदेश मंत्री बना दिया गया। दिलचस्प यह था कि जब उन्होंने विदेश मंत्री के रूप में शपथ ली, उस समय मनमोहन सिंह भी वहाँ उपस्थित थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीसरे कार्यकाल में भी एस. जयशंकर को विदेश मंत्री की जिम्मेदारी दी, जो पिछले कार्यकाल की सफलताओं का एक प्रतीक है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह भी दिखाती है कि योग्यताओं को पहचानने में कभी-कभी राजनीतिक समीकरण बाधा बन सकते हैं।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एस. जयशंकर का विदेश मंत्री बनने का सफर कैसा रहा?
एस. जयशंकर ने बिना चुनाव लड़े विदेश मंत्री बनने की यात्रा की, जिससे उनकी काबिलियत और स्ट्रेटेजिक सोच का परिचय मिला।
क्यों मनमोहन सिंह ने उन्हें विदेश सचिव नहीं बनाया?
मनमोहन सिंह ने एस. जयशंकर को विदेश सचिव बनाने का समर्थन किया, लेकिन वरिष्ठता के कारण यह संभव नहीं हो सका।
राष्ट्र प्रेस
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