यूएई का ओपेक से अलग होने का ऐलान: 1 मई से बदलेगा वैश्विक तेल बाज़ार का समीकरण
सारांश
Key Takeaways
- यूएई ने 1 मई 2026 से ओपेक से अलग होने का आधिकारिक ऐलान किया।
- ओपेक की स्थापना 14 सितंबर 1960 को बगदाद में हुई थी; अभी इसके 12 सदस्य हैं जो वैश्विक कच्चे तेल उत्पादन का 36.17%25 और भंडार का 79.22%25 नियंत्रित करते हैं।
- यूएई, ओपेक का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक सदस्य था; वह उत्पादन बढ़ाना चाहता था जबकि सऊदी अरब कटौती पर अड़ा था।
- यूएई ने हाल ही में पाकिस्तान से 3.45 अरब डॉलर का कर्ज वापस माँगा था — यह भी इसी कूटनीतिक तनाव की कड़ी मानी जा रही है।
- मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वैश्विक बाज़ार में तेल आपूर्ति बढ़ने और कीमत घटने से भारत को सस्ते आयात का फायदा मिल सकता है।
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने 29 अप्रैल 2026 को ऐलान किया कि वह 1 मई से ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपेक) से अलग हो जाएगा। होर्मुज संकट और ईरान के साथ पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच यह फैसला वैश्विक तेल बाज़ार में बड़ी उथल-पुथल का संकेत है। यूएई ओपेक का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक सदस्य है, इसलिए इस कदम के दूरगामी परिणाम अपेक्षित हैं।
ओपेक क्या है और इसकी स्थापना कैसे हुई
ओपेक की स्थापना 14 सितंबर 1960 को इराक की राजधानी बगदाद में हुई थी। यह तेल उत्पादक देशों का एक स्थायी और अंतर-सरकारी संगठन है, जिसका प्रमुख उद्देश्य वैश्विक तेल बाज़ार में स्थिरता बनाए रखने के लिए उत्पादन और कीमतों में समन्वय करना है। इसकी स्थापना पेट्रोलियम की किफायती और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए की गई थी।
शुरुआत में ओपेक के केवल पाँच संस्थापक सदस्य थे: ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला। बाद में इसकी सदस्य संख्या बढ़कर 12 हो गई। संयुक्त अरब अमीरात 1967 में इस संगठन में शामिल हुआ था। आँकड़ों के अनुसार, ओपेक सदस्य मिलकर दुनिया के कच्चे तेल उत्पादन का लगभग 36.17 फीसदी और वैश्विक सिद्ध कच्चे तेल के भंडार का लगभग 79.22 फीसदी नियंत्रित करते हैं।
यूएई के अलग होने की वजह
विश्लेषकों के अनुसार, यूएई की नाराजगी की कई परतें हैं। पहली वजह यह है कि ईरान की तरफ से खाड़ी देशों पर किए गए हमले का ओपेक सदस्यों ने मिलकर कोई ठोस जवाब नहीं दिया। दूसरी वजह यह है कि पाकिस्तान ने ईरान के खिलाफ स्पष्ट रुख नहीं अपनाया, जिससे यूएई असंतुष्ट है। गौरतलब है कि हाल ही में यूएई ने पाकिस्तान से अपना 3.45 अरब डॉलर का कर्ज वापस माँगा था, जो इसी कूटनीतिक तनाव का हिस्सा माना जा रहा है।
तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक वजह यह है कि यूएई अपना तेल उत्पादन बढ़ाना चाहता है, जबकि सऊदी अरब कम उत्पादन की नीति पर अड़ा है। ओपेक में उत्पादन बढ़ाने या घटाने के लिए सभी सदस्यों की एकमत वोटिंग ज़रूरी है, और सऊदी अरब के पास उत्पादन कोटा का नियंत्रण होने के कारण यूएई अपनी पूरी क्षमता के अनुसार तेल निर्यात नहीं कर पा रहा था।
यूएई को क्या फायदा होगा
ओपेक से बाहर निकलने के बाद यूएई को अपने हिसाब से तेल उत्पादन और निर्यात के फैसले लेने की स्वतंत्रता मिल जाएगी। वह अपनी पूरी उत्पादन क्षमता का उपयोग कर अधिक तेल निर्यात कर सकेगा और आर्थिक लाभ उठा सकेगा। हालाँकि, इससे सऊदी अरब की तेल बाज़ार पर पकड़ कमज़ोर पड़ सकती है।
भारत और वैश्विक तेल बाज़ार पर असर
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुमान के अनुसार, यूएई के ओपेक से बाहर होने के बाद वैश्विक बाज़ार में तेल की आपूर्ति बढ़ेगी और कीमतों में गिरावट देखने को मिल सकती है। यह भारत के लिए सीधे तौर पर फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि भारत भारी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है। तेल की कीमतें घटने से देश में महंगाई पर भी सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद है।
दूसरी तरफ, आलोचकों का कहना है कि इस कदम से ओपेक के भीतर निर्णय-प्रक्रिया में मतभेद बढ़ेंगे और वैश्विक तेल बाज़ार में कीमतों की अस्थिरता बढ़ सकती है। यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया पहले से ही भू-राजनीतिक तनाव से जूझ रहा है।
ओपेक प्लस का भविष्य
ओपेक के 12 सदस्य देशों और 10 गैर-ओपेक देशों को मिलाकर 'ओपेक प्लस' समूह बनाया गया है। इसमें रूस, कजाकिस्तान, अजरबैजान, बहरीन, ब्रुनेई, मलेशिया, मैक्सिको, ओमान, दक्षिण सूडान और सूडान जैसे देश शामिल हैं। यूएई के बाहर होने के बाद ओपेक प्लस की एकजुटता और प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आने वाले हफ्तों में यह देखना अहम होगा कि शेष सदस्य इस नई वास्तविकता के साथ कैसे तालमेल बिठाते हैं।