क्या हिन्दू पहचान हम सबको जोड़ती है? : मोहन भागवत
सारांश
Key Takeaways
- हिन्दू पहचान हमें एकजुट करती है।
- धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं है।
- संघ का उद्देश्य सम्पूर्ण हिन्दू समाज का संगठन करना है।
- संघ का कोई प्रतिस्पर्धी संगठन नहीं है।
- हमें अपने इतिहास और संस्कृति को समझना होगा।
भोपाल, 2 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि हमारे मत-पंथ, सम्प्रदाय, भाषा, और जाति भिन्न हो सकती हैं, लेकिन हिन्दू पहचान हमें सभी को जोड़ती है। हम सबकी एक संस्कृति और धर्म है। हमारे पूर्वज समान हैं।
भोपाल में आयोजित 'प्रमुख जन गोष्ठी' में, सरसंघचालक डॉ. भागवत ने कहा कि भारत में चार प्रकार के हिन्दू होते हैं: एक, जो गर्व से कहते हैं कि हम हिन्दू हैं; दो, जो कहते हैं कि गर्व की क्या बात है, हम हिन्दू हैं; तीन, जो कहते हैं कि जोर से मत बोलो, आप घर में आकर देखो, हम हिन्दू ही हैं; और चार, जो भूल गए हैं कि हम हिन्दू हैं।
उन्होंने आगे कहा कि जब हम यह भूल जाते हैं कि हम हिन्दू हैं, तो विपत्ति आती है। भारत के इतिहास ने इसे सिद्ध किया है। इसीलिए, हमें हिन्दू को जागरूक और संगठित करना आवश्यक है। हिन्दू पहचान केवल धार्मिक पहचान से बढ़कर, स्वभाव और प्रकृति है।
धर्म को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं है, बल्कि यह सभी को साथ लेकर चलने का माध्यम है। धर्म सबके उत्थान के लिए है और यह आनंददायक है। स्वभाव और कर्तव्य धर्म हैं। आपस में सद्भावना बनाए रखने के लिए जो संयम आवश्यक है, वही धर्म है।
सरसंघचालक ने कहा कि संघ के बारे में कई नैरेटिव चलते हैं। कभी-कभी किसी को जानने के लिए उसकी तुलना किसी अन्य से की जाती है, लेकिन जो अनूठा है, उसकी तुलना नहीं की जा सकती। संघ एक अनोखा संगठन है, जिसे किसी से भी तुलना करके नहीं समझा जा सकता।
उन्होंने कहा कि जब संघ गणवेश पहनकर पथ संचलन करता है, तो यह पैरा मिलिट्री फोर्स नहीं है। सेवा कार्य करता है, और इसे समाजसेवी संगठन मानना गलत है। संघ के पक्षधर और विरोधी दोनों ने समाज में कई बातें फैलाई हैं, जो संघ का असली रूप नहीं है। इसलिए शताब्दी वर्ष पर विचार किया गया कि समाज को संघ की सही जानकारी मिलनी चाहिए।
सरसंघचालक डॉ. भागवत ने यह भी स्पष्ट किया कि संघ किसी की प्रतिक्रिया में शुरू नहीं हुआ है और इसकी किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने समाज के हित में सभी कार्यों में सहभागिता की। स्वतंत्रता आंदोलन में भी उन्होंने भाग लिया।
डॉ. भागवत ने बताया कि संघ ने पहले ही तय कर लिया था कि समाज में 'प्रेशर ग्रुप' के तौर पर संगठन खड़ा नहीं करना है, बल्कि सम्पूर्ण हिन्दू समाज का संगठन करना है। समाज ही किसी देश का भाग्य निर्धारित करता है। नेता, नीति, और अवतार सहायक हो सकते हैं, लेकिन देश को बड़ा बनाने में गुणसम्पन्न समाज की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
उन्होंने कहा कि समाज को बदलने के लिए वातावरण बदलना आवश्यक है। संघ शाखा के माध्यम से ऐसे कार्यकर्ताओं का समूह खड़ा कर रहा है जो राष्ट्रीय वातावरण का निर्माण करें।
सरसंघचालक डॉ. भागवत ने कहा कि उपेक्षा के बावजूद संघ के कार्यकर्ता निराश नहीं हुए। उपेक्षा और विरोध के बावजूद, वे भारत माता के प्रति अपनी आस्था रखते हुए आगे बढ़ते रहे। दुनिया का कोई संगठन नहीं है, जिसने संघ जितना विरोध सहा हो।
कठिनाइयों में अपना सब कुछ दांव पर लगाकर कार्यकर्ताओं ने संघ को यह तक पहुंचाया है जहां अब सभी संघ पर विश्वास करते हैं।
राष्ट्र प्रेस
एसएनपी/एमएस