क्या ममता बनर्जी के रेल मंत्री कार्यकाल के दौरान कैटरिंग आरक्षण की होगी जांच?
सारांश
Key Takeaways
- रेलवे कैटरिंग नीति में आरक्षण के प्रावधान पर सवाल उठाए गए हैं।
- एनएचआरसी ने रेलवे बोर्ड को जांच का आदेश दिया है।
- आरोप है कि यह निर्णय संविधान की भावना के खिलाफ है।
- एक दशक बाद यह मुद्दा राजनीतिक बहस का कारण बना है।
नई दिल्ली, 6 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। वर्ष 2010 में तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी के कार्यकाल में लागू की गई रेलवे कैटरिंग नीति एक बार फिर चर्चा में आ गई है। यह आरोप लगाया गया है कि उस समय रेलवे के खान-पान स्टॉल और कैंटीन के संचालन से जुड़ी आईआरसीटीसी की टेंडर प्रक्रिया में नीति स्तर पर बदलाव कर अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों, को 9.5 प्रतिशत तक आरक्षण दिया गया था।
इस मुद्दे को लेकर लीगल राइट्स ऑब्जर्वेटरी नामक एक कार्यकर्ता समूह ने शिकायत दर्ज की है। शिकायत में कहा गया है कि यह आरक्षण तुष्टिकरण की नीति के तहत किया गया प्रतीत होता है और यह संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है। इसके साथ ही आरोप है कि इस निर्णय के कारण एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के अधिकारों में कमी आई है, जो उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
इस शिकायत को गंभीरता से लेते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने रेलवे बोर्ड को नोटिस जारी किया है। आयोग ने रेलवे बोर्ड से इस पूरे मामले की जांच करने और उचित विधिक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
वास्तव में, वर्ष 2009-10 के रेल बजट भाषण में ममता बनर्जी ने रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में उच्च गुणवत्ता का भोजन, साफ पीने का पानी, स्वच्छ शौचालय और सफाई सुनिश्चित करने का आश्वासन दिया था।
उन्होंने यह भी कहा था कि जन आहार की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी और राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय व्यंजनों को रेलवे कैटरिंग में शामिल किया जाएगा।
इसी आश्वासन के आधार पर रेलवे बोर्ड द्वारा 21 जुलाई 2010 को नई कैटरिंग नीति लागू की गई। रेलवे बोर्ड के कार्यकारी निदेशक (टूरिज्म एंड कैटरिंग) मणि आनंद द्वारा जारी पत्र में कहा गया था कि यह नीति वित्त और विधि निदेशालय की सहमति से बनाई गई है तथा इसे तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है।
अब, एक दशक से अधिक समय बाद, इस नीति में उठे सवालों ने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।