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प्रसून जोशी का NBT सम्मान के बाद बयान: लोकतंत्र में मीडिया की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक

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प्रसून जोशी का NBT सम्मान के बाद बयान: लोकतंत्र में मीडिया की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक

सारांश

सूचना के लोकतंत्रीकरण ने जहाँ हर हाथ में कैमरा दे दिया, वहीं विश्वसनीयता का संकट भी गहरा दिया। NBT सम्मान के बाद प्रसून जोशी का यह बयान सिर्फ आभार नहीं — यह मीडिया जगत को एक सीधी चेतावनी भी है।

मुख्य बातें

प्रसार भारती के चेयरपर्सन प्रसून जोशी को 4 जुलाई को नवभारत टाइम्स (NBT) ने सम्मानित किया।
जोशी ने कहा — सूचना-बाढ़ के दौर में पत्रकारिता की विश्वसनीयता सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
उन्होंने रेखांकित किया कि आज हर व्यक्ति के हाथ में कैमरा है और समाचार-प्रसार पूरी तरह लोकतांत्रिक हो चुका है।
जोशी ने पत्रकारों से धैर्य, मूल्य और ईमानदारी बनाए रखने का आह्वान किया।
उन्होंने हिंदी भाषा के विकास को सामूहिक प्रयास बताया और NBT को हिंदी के सशक्त मंच के रूप में सराहा।

प्रसार भारती के चेयरपर्सन प्रसून जोशी ने 4 जुलाई को नवभारत टाइम्स (NBT) द्वारा सम्मानित किए जाने के बाद कहा कि सूचना-विस्फोट के इस दौर में पत्रकारिता की जिम्मेदारी पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गई है। नई दिल्ली में आयोजित इस समारोह में उन्होंने हिंदी भाषा, पत्रकारिता की विश्वसनीयता और लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका पर अपने विचार खुलकर रखे।

सम्मान और हिंदी के प्रति आभार

जोशी ने कहा कि यह पुरस्कार उनके लिए व्यक्तिगत उपलब्धि से बढ़कर है — वह इसे हिंदी भाषा के प्रति अपने 'छोटे से योगदान' की स्वीकृति मानते हैं। उन्होंने नवभारत टाइम्स के साथ अपने वर्षों पुराने संबंध का उल्लेख करते हुए कहा कि यह संस्थान लंबे समय से हिंदी के लेखकों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों को अपनी बात रखने का सशक्त मंच देता रहा है। उन्होंने कहा, 'हम सभी अपनी-अपनी तरह से हिंदी के योद्धा हैं।'

हिंदी सेवा: सामूहिक प्रयास का परिणाम

जोशी ने स्वीकार किया कि वह फिल्मों, गीतों और रचनात्मक माध्यमों से हिंदी की सेवा करने का प्रयास करते रहे हैं। उनके अनुसार भाषा का विकास किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयास का परिणाम होता है। उन्होंने उस रक्षा मंत्री के प्रति भी आभार व्यक्त किया जिनके हाथों उन्हें यह पुरस्कार प्राप्त हुआ।

पत्रकारिता का बदलता स्वरूप और विश्वसनीयता की चुनौती

जोशी ने कहा कि आज समाचारों का प्रसार पूरी तरह लोकतांत्रिक हो चुका है — अब सूचना केवल कुछ संस्थानों तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग हर व्यक्ति के हाथ में कैमरा है और हर कोई किसी भी घटना को समाचार के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि एक दौर ऐसा भी आया जब कुछ समाचार चैनलों ने स्वयं को मनोरंजन चैनलों की तरह प्रस्तुत करना शुरू कर दिया।

उनके अनुसार, 'सूचना और खबरों की बाढ़ के इस दौर में सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की है।' लोगों के सामने अनेक स्रोतों से खबरें पहुँच रही हैं, लेकिन यह तय करना कठिन होता जा रहा है कि किस सूचना पर भरोसा किया जाए। यह ऐसे समय में आया है जब फर्जी खबरों और भ्रामक सूचनाओं की समस्या पूरे विश्व में गहराती जा रही है।

पत्रकारों के लिए संदेश

जोशी ने कहा कि वह स्वयं मीडिया जगत का हिस्सा रहे हैं, इसलिए पत्रकारों के सामने मौजूद चुनौतियों और संघर्षों को अच्छी तरह समझते हैं। उन्होंने मीडिया से जुड़े लोगों का हौसला बढ़ाते हुए कहा कि 'धैर्य बनाए रखना, अपने मूल्यों और विश्वास को कायम रखना तथा ईमानदारी के साथ अपने दायित्व का निर्वहन करते रहना ही सबसे महत्वपूर्ण है।'

आगे की राह

प्रसून जोशी की यह टिप्पणियाँ ऐसे समय में आई हैं जब डिजिटल मीडिया के विस्तार और सोशल मीडिया की बढ़ती पहुँच ने पारंपरिक पत्रकारिता के समक्ष अस्तित्व और विश्वसनीयता दोनों की चुनौती खड़ी कर दी है। प्रसार भारती के प्रमुख के रूप में उनकी यह राय नीतिगत दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन एक बड़ा विरोधाभास भी है — वह स्वयं उस प्रसार भारती के प्रमुख हैं जो सरकारी प्रसारण संस्था है, और सार्वजनिक प्रसारण में संपादकीय स्वायत्तता का प्रश्न वर्षों से अनुत्तरित है। मीडिया की 'विश्वसनीयता' की बात करते हुए यह नहीं बताया गया कि सरकारी मीडिया संस्थाएँ इस कसौटी पर खुद कहाँ खड़ी हैं। डिजिटल युग में सूचना-लोकतंत्र की बात सही है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या नीतिगत ढाँचा — नियामक, तकनीकी और संस्थागत — इस चुनौती से निपटने के लिए तैयार है।
RashtraPress
5 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रसून जोशी को नवभारत टाइम्स ने किस उपलब्धि के लिए सम्मानित किया?
नवभारत टाइम्स ने प्रसून जोशी को हिंदी भाषा के प्रति उनके योगदान के लिए सम्मानित किया। जोशी ने इसे हिंदी के प्रति अपने 'छोटे से योगदान' की स्वीकृति बताया।
प्रसून जोशी ने पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती क्या बताई?
जोशी के अनुसार सूचना-बाढ़ के इस दौर में सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की है। लोगों के सामने अनेक स्रोतों से खबरें पहुँच रही हैं, लेकिन यह तय करना कठिन होता जा रहा है कि किस सूचना पर भरोसा किया जाए।
प्रसून जोशी ने मीडिया के लोकतंत्रीकरण के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि आज समाचारों का प्रसार पूरी तरह लोकतांत्रिक हो चुका है — अब सूचना केवल कुछ संस्थानों तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग हर व्यक्ति के हाथ में कैमरा है और हर कोई किसी भी घटना को समाचार के रूप में प्रस्तुत कर सकता है।
प्रसून जोशी ने पत्रकारों को क्या संदेश दिया?
जोशी ने पत्रकारों का हौसला बढ़ाते हुए कहा कि धैर्य बनाए रखना, अपने मूल्यों और विश्वास को कायम रखना तथा ईमानदारी के साथ दायित्व का निर्वहन करते रहना ही सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने माना कि पत्रकारिता का दायित्व जितना कठिन हुआ है, उतनी ही उसकी जिम्मेदारी भी बढ़ी है।
प्रसून जोशी कौन हैं और हिंदी से उनका क्या संबंध है?
प्रसून जोशी प्रसार भारती के चेयरपर्सन हैं और एक प्रतिष्ठित गीतकार, लेखक व विज्ञापन जगत की हस्ती हैं। उन्होंने फिल्मों, गीतों और रचनात्मक माध्यमों से हिंदी की सेवा की है और नवभारत टाइम्स के साथ उनका वर्षों पुराना जुड़ाव रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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